बुद्धि और ज्ञान के वचन-धन्यवाद दीजिये।भाग 4/4 | 125+ Quotes About Knowledge And Wisdom

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बुद्धि और ज्ञान के वचन-धन्यवाद दीजिये।भाग 4/4 | 125+ Quotes About Knowledge And Wisdom

बुद्धि और ज्ञान के वचन-धन्यवाद दीजिये। भाग- 4/4 | Quotes About Knowledge And Wisdom। सब को सही करने की कोशिश मत करो। लोगों से प्रेम करना है, उन्हें सुधारना नहीं है। लोगों के साथ दीनता और प्रेम से पेश आयें और अपने आप को बेहतर करते जाएँ, लोग आपको देख कर खुद सुधर जायेंगे।

सब से मेल मिलाप रखने, और उस पवित्रता के खोजी हो।

  1. जिस के बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा। इब्रानियों 12:14
  2.  ध्यान से देखते रहो, ऐसा न हो, कि कोई परमेश्वर के अनुग्रह से वंचित रह जाए, या कोई कड़वी जड़ फूट कर कष्ट दे, और उसके द्वारा बहुत से लोग अशुद्ध हो जाएं।इब्रानियों 12:15
  3.  जो कोई यह कहता है, कि मैं ज्योति में हूं; और अपने भाई से बैर रखता है, वह अब तक अन्धकार ही में है। 1 यूहन्ना 2:9
  4.  जो कोई अपने भाई से प्रेम रखता है, वह ज्योति में रहता है, और ठोकर नहीं खा सकता। 1 यूहन्ना 2:1
  5. पर जो कोई अपने भाई से बैर रखता है, वह अन्धकार में है, और अन्धकार में चलता है; और नहीं जानता, कि कहां जाता है, क्योंकि अन्धकार ने उस की आंखे अन्धी कर दी हैं॥ 1 यूहन्ना 2:11

“लक्ष्य ना ओझल होने पाये, कदम कदम बढ़ाए चल।

मंज़िल तुझको मिल जाएगी, आज नहीं तो कल”।

सच्चाई से अपने कामों को शांतिपूर्ण ढंग से करते जाओ, सफलता खुद शोर मचा देगी।

  1. अपनी बढ़ाई, अपनी तारीफ खुद मत बताते  फिरो, काम ऐसे करो कि लोग खुद आपकी तारीफ करते रहे।
  2.  आप अपने रास्ते पर, सच्चाई से, सत्य निष्ठा, समर्पण के साथ जाग्रत रहते हुए चलते रहो, आपकी निगाह  आपकी अपनी मंज़िल हो पर हो, उसके लिए अपने काम को और बेहतर से बेहतर बनाने के लिए उस पर पूरा  ध्यान दो, जिससे सफलता मिलती है। 
  3. आप बढ़ते रहो, प्रार्थना करते रहो, सच्चाई से जीवन बिताओ, भलाई करो, सीखो और सफलता प्राप्त करो ।
  4. अपने पहले उद्देश्य को मत भूलना।
  5. जब चुनोतियाँ हो सामने तो अपने हौसले को और बुलंद करो।

“कोई लक्ष्य मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं,

हारा वही जो कभी लड़ा नहीं”।

“मंज़िल मिल ही जायेगी, भटकते ही सही,

गुमराह तो वो हैं जो घर से निकले ही नहीं”।

“रख हौसला वो मंजर भी आयेगा; 

प्यासे के पास चल के समुन्दर भी आयेगा। 

थक कर न बैठ ऐ मंजिल के मुसाफिर;

मंजिल भी मिलेगी और मिलने का मज़ा भी आयेगा”।

“जिस दिन से चला हूँ मंज़िल की तरफ,

मैंने मील का पत्थर नहीं देखा”।

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बुद्धि और ज्ञान के वचन-धन्यवाद दीजिये।भाग 4/4 | Quotes About Knowledge And Wisdom

कृतज्ञ रहें, धन्यवाद दीजिये। 

  1. ईश्वर को और लोगों को , धन्यवाद प्रेम का अनोखा रूप है।
  2. जो आपकी जिंदगी में आये और आपको नया अनुभव दिया। 
  3. ईश्वर ने आपको इतना सब कुछ मुफ्त में दिया है, तो उनका धन्यवाद कीजिये।

1 थिस्सलुनीकियों

  1. और हे भाइयों, हम तुम्हें समझाते हैं, कि जो ठीक चाल नहीं चलते, उन को समझाओ, कायरों को ढाढ़स दो, निर्बलों को संभालो, सब की ओर सहनशीलता दिखाओ।  1 थिस्सलुनीकियों 5:14
  2.  सावधान! कोई किसी से बुराई के बदले बुराई न करे; पर सदा भलाई करने पर तत्पर रहो आपस में और सब से भी भलाई ही की चेष्टा करो।  1 थिस्सलुनीकियों 5:15
  3. सदा आनन्दित रहो।  1 थिस्सलुनीकियों 5:1

भजन संहिता

  1. मैं गीत गाकर तेरे नाम की स्तुति करूंगा, और धन्यवाद करता हुआ तेरी बड़ाई करूंगा। भजन संहिता 69:30
  2. हे मेरे परमेश्वर, मैं भी तेरी सच्चाई का धन्यवाद सारंगी बजाकर गाऊंगा; हे इस्राएल के पवित्र मैं वीणा बजा कर तेरा भजन गाऊंगा। भजन संहिता 71:22
  3. तब हम जो तेरी प्रजा और तेरी चराई की भेड़ें हैं, तेरा धन्यवाद सदा करते रहेंगे; और पीढ़ी से पीढ़ी तक तेरा गुणानुवाद करते रहेंगें॥ भजन संहिता 79:13
  4. हे परमेश्वर हम तेरा धन्यवाद करते, हम तेरा नाम का धन्यवाद करते हैं; क्योंकि तेरा नाम प्रगट हुआ है, तेरे आश्चर्यकर्मों का वर्णन हो रहा है॥ भजन संहिता 75:1
  5. हे प्रभु हे मेरे परमेश्वर मैं अपने सम्पूर्ण मन से तेरा धन्यवाद करूंगा, और तेरे नाम की महिमा सदा करता रहूंगा। भजन संहिता 86:12

क्या तू मुर्दों के लिये अदभुत काम करेगा?

  1. क्या मरे लोग उठ कर तेरा धन्यवाद करेंगे? भजन संहिता 88:10
  2. यहोवा का धन्यवाद करना भला है, हे परमप्रधान, तेरे नाम का भजन गाना; भजन संहिता 92:1
  3. हम धन्यवाद करते हुए उसके सम्मुख आएं, और भजन गाते हुए उसका जयजयकार करें! भजन संहिता 95:2
  4. हे धर्मियों यहोवा के कारण आनन्दित हो; और जिस पवित्र नाम से उसका स्मरण होता है, उसका धन्यवाद करो! भजन संहिता 97:12
  5. वे तेरे महान और भययोग्य नाम का धन्यवाद करें! वह तो पवित्र है। भजन संहिता 99:3

भजन संहिता 100

  1. उसके फाटकों से धन्यवाद, और उसके आंगनों में स्तुति करते हुए प्रवेश करो, उसका धन्यवाद करो, और उसके नाम को धन्य कहो! भजन संहिता 100:4
  2. यहोवा का धन्यवाद करो, उससे प्रार्थना करो, देश देश के लोगों में उसके कामों का प्रचार करो! भजन संहिता 105:1
  3. याह की स्तुति करो! यहोवा का धन्यवाद करो, क्योंकि वह भला है; और उसकी करूणा सदा की है! भजन संहिता 106:1
  4. हे हमारे परमेश्वर यहोवा, हमारा उद्धार कर, और हमें अन्यजातियों में से इकट्ठा कर ले, कि हम तेरे पवित्र नाम का धन्यवाद करें, और तेरी स्तुति करते हुए तेरे विषय में बड़ाई करें॥भजन संहिता 106:47

भजन संहिता 107

  1. यहोवा का धन्यवाद करो, क्योंकि वह भला है; और उसकी करूणा सदा की है! भजन संहिता 107:1
  2. लोग यहोवा की करूणा के कारण, और उन आश्चर्यकर्मों के कारण, जो वह मनुष्यों के लिये करता है, उसका धन्यवाद करें! भजन संहिता 107:8
  3. लोग यहोवा की करूणा के कारण, और उन आश्चर्यकर्मों के कारण जो वह मनुष्यों के लिये करता है, उसका धन्यवाद करें! भजन संहिता 107:15
  4. और लोग यहोवा की करूणा के कारण और उन आश्चर्यकर्मों के कारण जो वह मनुष्यों के लिये करता है, उसका धन्यवाद करें! भजन संहिता 107:21

भजन संहिता 107

  1. और वे धन्यवाद बलि चढ़ाएं, और जयजयकार करते हुए, उसके कामों का वर्णन करें॥ भजन संहिता 107:22
  2. लोग यहोवा की करूणा के कारण, और उन आश्चर्यकर्मों के कारण जो वह मनुष्यों के लिये करता है, उसका धन्यवाद करें।भजन संहिता 107:31
  3. हे यहोवा, मैं देश देश के लोगों के मध्य में तेरा धन्यवाद करूंगा, और राज्य राज्य के लोगों के मध्य में तेरा भजन गाऊंगा। भजन संहिता 108:3
  4. मैं यहोवा का बहुत धन्यवाद करूंगा, और बहुत लोगों के बीच में उसकी स्तुति करूंगा। भजन संहिता 109:30
  5. याह की स्तुति करो। मैं सीधे लोगों की गोष्ठी में और मण्डली में भी सम्पूर्ण मन से यहोवा का धन्यवाद करूंगा। भजन संहिता 111:1
  6. मैं तुझ को धन्यवाद बलि चढ़ाऊंगा, और यहोवा से प्रार्थना करूंगा। भजन संहिता 116:17

भजन संहिता

  1. हे जाति जाति के सब लोगों यहोवा की स्तुति करो! हे राज्य राज्य के सब लोगो, उसकी प्रशंसा करो!क्योंकि उसकी करूणा हमारे ऊपर प्रबल हुई है; और यहोवा की सच्चाई सदा की है याह की स्तुति करो! यहोवा का धन्यवाद करो, क्योंकि वह भला है; और उसकी करूणा सदा की है! भजन संहिता 118:1
  2. मेरे लिये धर्म के द्वार खोलो, मैं उन से प्रवेश करके याह का धन्यवाद करूंगा॥ भजन संहिता 118:19
  3. हे यहोवा मैं तेरा धन्यवाद करूंगा, क्योंकि तू ने मेरी सुन ली है और मेरा उद्धार ठहर गया है। भजन संहिता 118:21
  4. वहां याह के गोत्र गोत्र के लोग यहोवा के नाम का धन्यवाद करने को जाते हैं; यह इस्राएल के लिये साक्षी है। भजन संहिता 122:4
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भजन संहिता 136:2

  1. यहोवा का धन्यवाद करो, क्योंकि वह भला है, और उसकी करूणा सदा की है। भजन संहिता 136:1
  2. जो ईश्वरों का परमेश्वर है, उसका धन्यवाद करो, उसकी करूणा सदा की है। जो प्रभुओं का प्रभु है, उसका धन्यवाद करो, उसकी करूणा सदा की है॥ भजन संहिता 136:3
  3. स्वर्ग के परमेश्वर का धन्यवाद करो, उसकी करूणा सदा की है।भजन संहिता 136:26
  4. मैं पूरे मन से तेरा धन्यवाद करूँगा; देवताओं के सामने भी मैं तेरा भजन गाऊँगा। भजन संहिता 138:1
  5. मैं तेरे पवित्र मन्दिर की ओर दण्डवत करूँगा, और तेरी करुणा और सच्चाई के कारण तेरे नाम का धन्यवाद करूँगा, क्योंकि तू ने अपने वचन को अपने बड़े नाम से अधिक महत्त्व दिया है। भजन संहिता 138:2

दानिय्येल 2:23

  1. हे मेरे पूर्वजों के परमेश्वर, मैं तेरा धन्यवाद और स्तुति करता हूं, क्योंकि तू ने मुझे बुद्धि और शक्ति दी है, और जिस भेद का खुलना हम लोगों न तुझ से मांगे था, उसे तू ने मुझ पर प्रगट किया है, तू ने हम को राजा की बात बताई है। दानिय्येल 2:23

होशे 14:2

  1. बातें सीख कर और यहोवा की ओर फिर कर, उस से कह, सब अधर्म दूर कर; अनुग्रह से हम को ग्रहण कर; तब हम धन्यवाद रूपी बलि चढ़ाएंगे।

योना 2:9

  1. परन्तु मैं ऊंचे शब्द से धन्यवाद कर के तुझे बलिदान चढ़ाऊंगा; जो मन्नत मैं ने मानी, उसको पूरी करूंगा। उद्धार यहोवा ही से होता है।
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मत्ती

  1. उसी समय यीशु ने कहा, हे पिता, स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु; मैं तेरा धन्यवाद करता हूं, कि तू ने इन बातों को ज्ञानियों और समझदारों से छिपा रखा, और बालकों पर प्रगट किया है। मत्ती 11:25
  2. तब उस ने लोगों को घास पर बैठने को कहा, और उन पांच रोटियों और दो मछिलयों को लिया;स्वर्ग की ओर देखकर धन्यवाद किया और रोटियां तोड़ तोड़कर चेलों को दीं, और चेलों ने लोगों को। मत्ती 14:19
  3. उन सात रोटियों और मछिलयों को ले धन्यवाद करके तोड़ा और अपने चेलों को देता गया; और चेले लोगों को। मत्ती 15:36
  4. फरीसी खड़ा होकर अपने मन में यों प्रार्थना करने लगा, कि हे परमेश्वर, मैं तेरा धन्यवाद करता हूं,

लूका

  1. कि मैं और मनुष्यों की नाईं अन्धेर करने वाला, अन्यायी और व्यभिचारी नहीं, और न इस चुंगी लेने वाले के समान हूं। लूका 18:11

रोमियो

  1. मैं अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद करता हूं: निदान मैं आप बुद्धि से तो परमेश्वर की व्यवस्था का, परन्तु शरीर से पाप की व्यवस्था का सेवन करता हूं॥ रोमियो 7:25
  2. जो किसी दिन को मानता है, वह प्रभु के लिये मानता है: जो खाता है, वह प्रभु के लिये खाता है, क्योंकि वह परमेश्वर का धन्यवाद करता है, और जा नहीं खाता, वह प्रभु के लिये नहीं खाता और परमेश्वर का धन्यवाद करता है। रोमियो 14:6
  3. और अन्यजाति भी दया के कारण परमेश्वर की बड़ाई करें, जैसा लिखा है, कि इसलिये मैं जाति जाति में तेरा धन्यवाद करूंगा, और तेरे नाम के भजन गाऊंगा। रोमियो 15:9
  4. उन्होंने मेरे प्राण के लिये अपना ही सिर दे रखा था और केवल मैं ही नहीं, वरन अन्यजातियों की सारी कलीसियाएं भी उन का धन्यवाद करती हैं। रोमियो 16:4

1 कुरिन्थियों

  1. मैं तुम्हारे विषय में अपने परमेश्वर का धन्यवाद सदा करता हूं, इसलिये कि परमेश्वर का यह अनुग्रह तुम पर मसीह यीशु में हुआ। 1 कुरिन्थियों 1:4
  2. मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूं, कि क्रिस्पुस और गयुस को छोड़, मैं ने तुम में से किसी को भी बपतिस्मा नहीं दिया। 1 कुरिन्थियों 1:14
  3. वह धन्यवाद का कटोरा, जिस पर हम धन्यवाद करते हैं, क्या मसीह के लोहू की सहभागिता नहीं? वह रोटी जिसे हम तोड़ते हैं, क्या वह मसीह की देह की सहभागिता नहीं? 1 कुरिन्थियों 10:16

2 तीमुथियुस

  1. जिस परमेश्वर की सेवा मैं अपने बाप दादों की रीति पर शुद्ध विवेक से करता हूं, उसका धन्यवाद हो कि अपनी प्रार्थनाओं में तुझे लगातार स्मरण करता हूं। 2 तीमुथियुस 1:3
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गलत तरह से पैसा बनाने से बचें।

  1. जल्दी धनी बनने के लिए गलत तरीकों से धन इकट्ठा ना करें, जो जल्दी अमीर बनना चाहते हैं वो बहुत से प्रलोभन में आकर मन की शांति और मान सम्मान खो देते हैं 
  2. पर जो धनी होना चाहते हैं, वे ऐसी परीक्षा, और फंदे और बहुतेरे व्यर्थ और हानिकारक लालसाओं में फंसते हैं,
  3. जो मनुष्यों को बिगाड़ देती हैं और विनाश के समुद्र में डूबा देती हैं। 1 तीमुथियुस 6:9
  4. तो अब प्रसन्न हो कर अपने दास के घराने पर ऐसी आशीष दे, कि वह तेरे सम्मुख सदैव बना रहे; क्योंकि, हे प्रभु यहोवा, तू ने ऐसा ही कहा है, और तेरे दास का घराना तुझ से आशीष पाकर सदैव धन्य रहे। 2 शमूएल 7:29
  5. यहोवा जीवित है; मेरी चट्टान धन्य है, और परमेश्वर जो मेरे उद्धार की चट्टान है, उसकी महिमा हो। 2 शमूएल 22:47

भजन संहिता 37:16

  1. धर्मी का थोड़ा से माल दुष्टों के बहुत से धन से उत्तम है। भजन संहिता 37:16
  2. सचमुच मनुष्य छाया सा चलता फिरता है; सचमुच वे व्यर्थ घबराते हैं; वह धन का संचय तो करता है परन्तु नहीं जानता कि उसे कौन लेगा! भजन संहिता 39:6
  3. क्या ही धन्य है वह, जो कंगाल की सुधि रखता है! विपत्ति के दिन यहोवा उसको बचाएगा। भजन संहिता 41:1

नीतिवचन

  1. धन और प्रतिष्ठा मेरे पास है, वरन ठहरने वाला धन और धर्म भी हैं। नीतिवचन 8:18
  2. इसलिये अब हे मेरे पुत्रों, मेरी सुनो; क्या ही धन्य हैं वे जो मेरे मार्ग को पकड़े रहते हैं। नीतिवचन 8:32
  3. क्या ही धन्य है वह मनुष्य जो मेरी सुनता, वरन मेरी डेवढ़ी पर प्रति दिन खड़ा रहता, और मेरे द्वारों के खंभों के पास दृष्टि लगाए रहता है। नीतिवचन 8:34
  4. दुष्टों के रखे हुए धन से लाभ नही होता, परन्तु धर्म के कारण मृत्यु से बचाव होता है। नीतिवचन 10:2
  5. जो काम में ढिलाई करता है, वह निर्धन हो जाता है, परन्तु कामकाजी लोग अपने हाथों के द्वारा धनी होते हैं। नीतिवचन 10:4
  6. धनी का धन उसका दृढ़ नगर है, परन्तु कंगाल लोग निर्धन होने के कारण विनाश होते हैं। नीतिवचन 10:15
  7. धन यहोवा की आशीष ही से मिलता है, और वह उसके साथ दु:ख नहीं मिलाता। नीतिवचन 10:22
  8. कोप के दिन धन से तो कुछ लाभ नहीं होता, परन्तु धर्म मृत्यु से भी बचाता है। नीतिवचन 11:4
  9. जो अपने पड़ोसी को तुच्छ जानता, वह पाप करता है, परन्तु जो दीन लोगों पर अनुग्रह करता, वह धन्य होता है। नीतिवचन 14:21

नीतिवचन

  1. बुद्धिमानों का धन उन का मुकुट ठहरता है, परन्तु मूर्खों की मूढ़ता निरी मूढ़ता है। नीतिवचन 14:24
  2. बड़े धन से अच्छा नाम अधिक चाहने योग्य है, और सोने चान्दी से औरों की प्रसन्नता उत्तम है। नीतिवचन 22:1
  3. धनी और निर्धन दोनों एक दूसरे से मिलते हैं; यहोवा उन दोनों का कर्त्ता है। नीतिवचन 22:2
  4. नम्रता और यहोवा के भय मानने का फल धन, महिमा और जीवन होता है। नीतिवचन 22:4
  5. धनी, निर्धन लोगों पर प्रभुता करता है, और उधार लेने वाला उधार देने वाले का दास होता है। नीतिवचन 22:7
  6. जो अपने लाभ के निमित्त कंगाल पर अन्धेर करता है, और जो धनी को भेंट देता, वे दोनो केवल हानि ही उठाते हैं॥ नीतिवचन 22:16
  7. क्योंकि यहोवा उनका मुकद्दमा लड़ेगा, और जो लोग उनका धन हर लेते हैं, उनका प्राण भी वह हर लेगा।नीतिवचन 22:23
  8. निर्धन और अन्धेर करने वाला पुरूष एक समान है; और यहोवा दोनों की आंखों में ज्योति देता है। नीतिवचन 29:13

नीतिवचन 29:18

  1. जहां दर्शन की बात नहीं होती, वहां लोग निरंकुश हो जाते हैं, और जो व्यवस्था को मानता है वह धन्य होता है। नीतिवचन 29:18
  2. अर्थात व्यर्थ और झूठी बात मुझ से दूर रख; मुझे न तो निर्धन कर और न धनी बना; प्रतिदिन की रोटी मुझे खिलाया कर। नीतिवचन 30:8
  3. ऐसे लोग हैं, जो अपने पिता को शाप देते और अपनी माता को धन्य नहीं कहते। नीतिवचन 30:11
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सभोपदेशक 4:8

  1. कोई अकेला रहता और उसका कोई नहीं है; न उसके बेटा है, न भाई है, तौभी उसके परिश्रम का अन्त नहीं होता; न उसकी आंखें धन से सन्तुष्ट होती हैं, और न वह कहता है, मैं किस के लिये परिश्रम करता और अपने जीवन को सुखरहित रखता हूं? यह भी व्यर्थ और निरा दु:खभरा काम है। सभोपदेशक 4:8
  2. यदि तू किसी प्रान्त में निर्धनों पर अन्धेर और न्याय और धर्म को बिगड़ता देखे, तो इस से चकित न होना;
  3. क्योंकि एक अधिकारी से बड़ा दूसरा रहता है जिसे इन बातों की सुधि रहती है, और उन से भी ओर अधिक बड़े रहते हैं। सभोपदेशक 5:8

यहेजकेल 7:21

  1. और मैं उसे लूटने के लिये परदेशियों के हाथ, और धन छीनने के लिये पृथ्वी के दुष्ट लोगों के वश में कर दूंगा; और वे उसे अपवित्र कर डालेंगे। यहेजकेल 7:21
  2. देश के साधारण लोग भी अन्धेर करते और पराया धन छीनते हैं, वे दीन दरिद्र को पीसते और न्याय की चिन्ता छोड़ कर परदेशी पर अन्धेर करते हैं। यहेजकेल 22:29
  3. और लोग तेरा धन लूटेंगे और तेरे व्यापार की वस्तुएं छीन लेंगे; वे तेरी शहरपनाह ढा देंगे और तेरे मनभाऊ घर तोड़ डालेंगे; तेरे पत्थर और काठ, और तेरी धूलि वे जल में फेंक देंगे। यहेजकेल 26:12
  4. तू ने अपनी बुद्धि और समझ के द्वारा धन प्राप्त किया, और अपने भण्डारों में सोना-चान्दी रखा है; यहेजकेल 28:4

मत्ती 19:21

  1. यीशु ने उस से कहा, यदि तू सिद्ध होना चाहता है; तो जा, अपना माल बेचकर कंगालों को दे;
  2. और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा; और आकर मेरे पीछे हो ले। मत्ती 19:21
  3. परन्तु वह जवान यह बात सुन उदास होकर चला गया, क्योंकि वह बहुत धनी था॥ मत्ती 19:22
  4. तब यीशु ने अपने चेलों से कहा, मैं तुम से सच कहता हूं, कि धनवान का स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना कठिन है। मत्ती 19:23
  5. फिर तुम से कहता हूं, कि परमेश्वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊंट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है। मत्ती 19:24
  6. उसके स्वामी ने उससे कहा, धन्य हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास, तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा;
  7. मैं तुझे बहुत वस्तुओं का अधिकारी बनाऊंगा अपने स्वामी के आनन्द में सम्भागी हो। मत्ती 25:21
  8. उसके स्वामी ने उस से कहा, धन्य हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास, तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा, मैं तुझे बहुत वस्तुओं का अधिकारी बनाऊंगा अपने स्वामी के आनन्द में सम्भागी हो। मत्ती 25:23

मत्ती 25:27, 57

  1. तो तुझे चाहिए था, कि मेरा रुपया सर्राफों को दे देता, तब मैं आकर अपना धन ब्याज समेत ले लेता। मत्ती 25:27
  2. जब सांझ हुई तो यूसुफ नाम अरिमतियाह का एक धनी मनुष्य जो आप ही यीशु का चेला था आया:
  3. उस ने पीलातुस के पास जाकर यीशु की लोथ मांगी। मत्ती 27:57

मरकुस

  1. और संसार की चिन्ता, और धन का धोखा, और और वस्तुओं का लोभ उन में समाकर वचन को दबा देता है।
  2. और वह निष्फल रह जाता है। मरकुस 4:19
  3. यीशु ने उस पर दृष्टि करके उस से प्रेम किया, और उस से कहा, तुझ में एक बात की घटी है;
  4. जा, जो कुछ तेरा है, उसे बेच कर कंगालों को दे, और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा, और आकर मेरे पीछे हो ले।मरकुस 10:21
  5. इस बात से उसके चेहरे पर उदासी छा गई, और वह शोक करता हुआ चला गया, क्योंकि वह बहुत धनी था।मरकुस 10:22
  6. यीशु ने चारों ओर देखकर अपने चेलों से कहा, धनवानों को परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना कैसा कठिन है!मरकुस 10:23
  7. चेले उस की बातों से अचम्भित हुए, इस पर यीशु ने फिर उन को उत्तर दिया, हे बाल को, जो धन पर भरोसा रखते हैं, उन के लिये परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना कैसा कठिन है!मरकुस 10:24
  8. परमेश्वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊंट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है! मरकुस 10:25
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लूका

  1. जो झाड़ियों में गिरा, सो वे हैं, जो सुनते हैं, पर होते होते चिन्ता और धन और जीवन के सुख विलास में फंस जाते हैं, और उन का फल नहीं पकता। लूका 8:14
  2. ऐसा ही वह मनुष्य भी है जो अपने लिये धन बटोरता है, परन्तु परमेश्वर की दृष्टि में धनी नहीं॥ लूका 12:21
  3. अपनी संपत्ति बेचकर दान कर दो; और अपने लिये ऐसे बटुए बनाओ,
  4. जो पुराने नहीं होते, अर्थात स्वर्ग पर ऐसा धन इकट्ठा करो जो घटता नहीं और जिस के निकट चोर नहीं जाता, और कीड़ा नहीं बिगाड़ता। लूका 12:33

लूका: जहां तुम्हारा धन है, वहां तुम्हारा मन

  1. क्योंकि जहां तुम्हारा धन है, वहां तुम्हारा मन भी लगा रहेगा॥ लूका 12:34
  2. कोई दास दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता: क्योंकि वह तो एक से बैर और दूसरे से प्रेम रखेगा; या एक से मिल रहेगा और दूसरे को तुच्छ जानेगा: तुम परमेश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते॥ लूका 16:13
  3. एक धनवान मनुष्य था जो बैंजनी कपड़े और मलमल पहिनता और प्रति दिन सुख-विलास और धूम-धाम के साथ रहता था। लूका 16:19
  4. और वह चाहता था, कि धनवान की मेज पर की जूठन से अपना पेट भरे; वरन कुत्ते भी आकर उसके घावों को चाटते थे। लूका 16:21
  5. और ऐसा हुआ कि वह कंगाल मर गया, स्वर्गदूतों ने उसे लेकर इब्राहीम की गोद में पहुंचाया; वह धनवान भी मरा; और गाड़ा गया। लूका 16:22

लूका 19:2 देखो, ज़क्कई नाम एक मनुष्य था

  1. देखो, ज़क्कई नाम एक मनुष्य था जो चुंगी लेने वालों का सरदार और धनी था। लूका 19:2
  2. सो उस ने कहा, एक धनी मनुष्य दूर देश को चला ताकि राजपद पाकर फिर आए।लूका 19:12
  3. उस ने उस से कहा; धन्य हे उत्तम दास, तुझे धन्य है, तू बहुत ही थोड़े में विश्वासी निकला अब दस नगरों पर अधिकार रख। लूका 19:17

प्रेरितों के काम 19:25, रोमियो 11:33, 1 कुरिन्थियों 4:8, 2 कुरिन्थियों 12:14

  1. उस ने उन को, और, और ऐसी वस्तुओं के कारीगरों को इकट्ठे करके कहा; हे मनुष्यो, तुम जानते हो, कि इस काम में हमें कितना धन मिलता है। प्रेरितों के काम 19:25
  2. आहा! परमेश्वर का धन और बुद्धि और ज्ञान क्या ही गंभीर है! उसके विचार कैसे अथाह, और उसके मार्ग कैसे अगम हैं! रोमियो 11:33
  3. तुम तो तृप्त हो चुके; तुम धनी हो चुके, तुम ने हमारे बिना राज्य किया; परन्तु भला होता कि तुम राज्य करते कि हम भी तुम्हारे साथ राज्य करते। 1 कुरिन्थियों 4:8
  4. देखो, मैं तीसरी बार तुम्हारे पास आने को तैयार हूं, और मैं तुम पर कोई भार न रखूंगा; क्योंकि मैं तुम्हारी सम्पत्ति नहीं, वरन तुम ही को चाहता हूं: क्योंकि लड़के-बालों को माता-पिता के लिये धन बटोरना न चाहिए, पर माता-पिता को लड़के-बालों के लिये। 2 कुरिन्थियों 12:14

इफिसियों

  1. और तुम्हारे मन की आंखें ज्योतिर्मय हों कि तुम जान लो कि उसके बुलाने से कैसी आशा होती है,
  2. और पवित्र लोगों में उस की मीरास की महिमा का धन कैसा है। इफिसियों 1:18
  3. परन्तु परमेश्वर ने जो दया का धनी है; अपने उस बड़े प्रेम के कारण, जिस से उस ने हम से प्रेम किया। इफिसियों 2:4
  4. कि वह अपनी उस कृपा से जो मसीह यीशु में हम पर है, आने वाले समयों में अपने अनुग्रह का असीम धन दिखाए। इफिसियों 2:7
  5. मुझ पर जो सब पवित्र लोगों में से छोटे से भी छोटा हूं, यह अनुग्रह हुआ, कि मैं अन्यजातियों को मसीह के अगम्य धन का सुसमाचार सुनाऊं। इफिसियों 3:8
  6. कि वह अपनी महिमा के धन के अनुसार तुम्हें यह दान दे, कि तुम उसके आत्मा से अपने भीतरी मनुष्यत्व में सामर्थ पाकर बलवन्त होते जाओ। इफिसियों 3:16

फिलिप्पियों, कुलुस्सियों

  1. और मेरा परमेश्वर भी अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है तुम्हारी हर एक घटी को पूरी करेगा। फिलिप्पियों 4:19
  2. ताकि उन के मनों में शान्ति हो और वे प्रेम से आपस में गठे रहें,
  3.  वे पूरी समझ का सारा धन प्राप्त करें, और परमेश्वर पिता के भेद को अर्थात मसीह को पहिचान लें। कुलुस्सियों 2:2
  4. और उसी में जड़ पकड़ते और बढ़ते जाओ;
  5. जैसे तुम सिखाए गए वैसे ही विश्वास में दृढ़ होते जाओ, और अत्यन्त धन्यवाद करते रहो॥ कुलुस्सियों 2:7

प्रार्थना में लगे रहो, और धन्यवाद के साथ उस में जागृत रहो। कुलुस्सियों 4:2

  1. इस संसार के धनवानों को आज्ञा दे, कि वे अभिमानी न हों और चंचल धन पर आशा न रखें,
  2. परन्तु परमेश्वर पर जो हमारे सुख के लिये सब कुछ बहुतायत से देता है। 1 तीमुथियुस 6:17
  3. और भलाई करें, और भले कामों में धनी बनें, और उदार और सहायता देने में तत्पर हों। 1 तीमुथियुस 6:18
  4. और मसीह के कारण निन्दित होने को मिसर के भण्डार से बड़ा धन समझा:
  5. क्योंकि उस की आंखे फल पाने की ओर लगी थीं। इब्रानियों 11:26
  6. इस कारण हम इस राज्य को पाकर जो हिलने का नहीं, उस अनुग्रह को हाथ से न जाने दें,
  7. जिस के द्वारा हम भक्ति, और भय सहित, परमेश्वर की ऐसी आराधना कर सकते हैं जिस से वह प्रसन्न होता है। इब्रानियों 12:28

याकूब, 1 पतरस

  1.  धनवान अपनी नीच दशा पर: क्योंकि वह घास के फूल की नाईं जाता रहेगा। याकूब 1:10
  2. क्योंकि सूर्य उदय होते ही कड़ी धूप पड़ती है और घास को सुखा देती है, और उसका फूल झड़ जाता है,
  3. उस की शोभा जाती रहती है; उसी प्रकार धनवान भी अपने मार्ग पर चलते चलते धूल में मिल जाएगा। याकूब 1:11
  4. धन्य है वह मनुष्य, जो परीक्षा में स्थिर रहता है; क्योंकि वह खरा निकल कर जीवन का वह मुकुट पाएगा, जिस की प्रतिज्ञा प्रभु ने अपने प्रेम करने वालों को दी है। याकूब 1:12
  5. हे मेरे प्रिय भाइयों सुनो; क्या परमेश्वर ने इस जगत के कंगालों को नहीं चुना कि विश्वास में धनी, और उस राज्य के अधिकारी हों, जिस की प्रतिज्ञा उस ने उन से की है जो उस से प्रेम रखते हैं, याकूब 2:5

याकूब: हे धनवानों सुन तो लो;

  1. हे धनवानों सुन तो लो; तुम अपने आने वाले क्लेशों पर चिल्ला-चिल्लाकर रोओ। याकूब 5:1
  2. तुम्हारा धन बिगड़ गया और तुम्हारे वस्त्रों को कीड़े खा गए। याकूब 5:2
  3. तुम्हारे सोने-चान्दी में काई लग गई है; और वह काई तुम पर गवाही देगी,
  4.  आग की नाईं तुम्हारा मांस खा जाएगी: तुम ने अन्तिम युग में धन बटोरा है।याकूब 5:3
  5. और यदि तुम धर्म के कारण दुख भी उठाओ, तो धन्य हो; पर उन के डराने से मत डरो, और न घबराओ। 1 पतरस 3:14

प्रकाशित वाक्य

  1. तू जो कहता है, कि मैं धनी हूं, और धनवान हो गया हूं, और मुझे किसी वस्तु की घटी नहीं, और यह नहीं जानता, कि तू अभागा और तुच्छ और कंगाल और अन्धा, और नंगा है। प्रकाशित वाक्य 3:17
  2. इसी लिये मैं तुझे सम्मति देता हूं, कि आग में ताया हुआ सोना मुझ से मोल ले, कि धनी हो जाए;और श्वेत वस्त्र ले ले कि पहिन कर तुझे अपने नंगेपन की लज्ज़ा न हो;अपनी आंखों में लगाने के लिये सुर्मा ले, कि तू देखने लगे। प्रकाशित वाक्य 3:18

प्रकाशित वाक्य 5:12

  1.  वे ऊंचे शब्द से कहते थे, कि वध किया हुआ मेम्ना ही सामर्थ, और धन, ज्ञान, शक्ति,आदर, महिमा, और धन्यवाद के योग्य है। प्रकाशित वाक्य 5:12
  2. फिर मैं ने स्वर्ग में, और पृथ्वी पर, और पृथ्वी के नीचे, और समुद्र की सब सृजी हुई वस्तुओं को,और सब कुछ को जो उन में हैं, यह कहते सुना, कि जो सिंहासन पर बैठा है, उसका, और मेम्ने का धन्यवाद, आदर, और महिमा, और राज्य, युगानुयुग रहे। प्रकाशित वाक्य 5:13
  3.  पृथ्वी के राजा, और प्रधान, और सरदार, और धनवान और सामर्थी लोग,
  4.  हर एक दास, और हर एक स्वतंत्र, पहाड़ों की खोहों में, और चट्टानों में जा छिपे। प्रकाशित वाक्य 6:15
  5.  उस ने छोटे, बड़े, धनी, कंगाल, स्वत्रंत, दास सब के दाहिने हाथ या उन के माथे पर एक एक छाप करा दी। प्रकाशित वाक्य 13:16

प्रकाशित वाक्य: देख, मैं चोर की नाईं आता हूं;

  1. धन्य वह है, जो जागता रहता है, और अपने वस्त्र कि चौकसी करता है, कि नंगा न फिरे, और लोग उसका नंगापन न देखें।प्रकाशित वाक्य 16:15
  2. क्योंकि उसके व्यभिचार के भयानक मदिरा के कारण सब जातियां गिर गई हैं, और पृथ्वी के राजाओं ने उसके साथ व्यभिचार किया है; और पृथ्वी के व्यापारी उसके सुख-विलास की बहुतायत के कारण धनवान हुए हैं। प्रकाशित वाक्य 18:3
  3. इन वस्तुओं के व्यापारी जो उसके द्वारा धनवान हो गए थे, उस की पीड़ा के डर के मारे दूर खड़े होंगे, और रोते और कलपते हुए कहेंगे। प्रकाशित वाक्य 18:15

प्रकाशित वाक्य 18:15

  1. घड़ी ही भर में उसका ऐसा भारी धन नाश हो गया: हर एक मांझी, जलयात्री, और मल्लाह, और जितने समुद्र से कमाते हैं, सब दूर खड़े हुए। प्रकाशित वाक्य 18:17
  2.  अपने अपने सिरों पर धूल डालेंगे, और रोते हुए और कलपते हुए चिल्ला चिल्ला कर कहेंगे, कि हाय! हाय!
  3. यह बड़ा नगर जिस की सम्पत्ति के द्वारा समुद्र के सब जहाज वाले धनी हो गए थे घड़ी ही भर में उजड़ गया। प्रकाशित वाक्य 18:19
  1. बुद्धि और ज्ञान के वचन-भाग 3/4
  2. MUKTI DILAYE YEESHU NAAM
  3. https://hindibible.live/
  4. 70 PLUS BIBLE VERSES ABOUT ATTITUDE OF GRATITUDE
  5. The Power of Yoga
  6. https://www.goodreads.com/book/show/41881472-the-psychology-of-money

ध्यान का नियम: प्रार्थना और परमेश्वर की तलाश के बारे में है

ध्यान का नियम: प्रार्थना और परमेश्वर की तलाश के बारे में है

ध्यान का नियम: प्रार्थना और परमेश्वर की तलाश के बारे में है –“मैं भी तेरे सब कामों पर ध्यान करूंगा, और तेरे कामों की चर्चा करूंगा।”  1 तिमुथियुस 4:15 “इन बातों पर मनन करना, अपने आप को इन में पूरा कर देना, कि तेरा लाभ सब को दिखाई दे।”  भजन संहिता 119:97 “हे मैं तेरी व्यवस्था से कैसी प्रीति रखता हूं! सारा दिन मेरा ध्यान यही रहता है।” 

परमेश्वर  के शब्द पर ध्यान एक आदेश 

  • “व्यवस्था की पुस्तक तेरे मुंह से न छूटे; परन्तु तू उस में दिन रात ध्यान करना, कि जो कुछ उस में लिखा है उसके अनुसार करने के लिये चौकसी करना;
  • क्योंकि तब तू अपके मार्ग को सफल बनाएगा, और तब तुझे अच्छी सफलता मिलेगी।” 
  • यहून्ना 14:23 “यदि कोई मुझ से प्रेम रखता है, तो वह मेरी बातों पर चलेगा; और मेरा पिता उस से प्रेम रखेगा,
  • और हम उसके पास आकर उसके साथ निवास करेंगे।” 
  •  “मैं अब तुम्हें लिखता हूं; उन दोनों में जो मैं तुम्हारे शुद्ध मन को स्मरण के द्वारा उभारता हूं: कि तुम उन वचनों से सावधान रहो जो पवित्र भविष्यद्वक्ताओं द्वारा पहले कहे गए थे,
  • और की आज्ञा हम प्रभु और उद्धारकर्ता के प्रेरित हैं।”

आत्मा का नियम यह है कि हम उसके कार्य पर मनन करें और उसके कार्यों के बारे में बात करें।

  • आप जिस भी चीज का ध्यान करते हैं वह शीघ्र ही आपका हिस्सा बन जाती है।

ध्यान का नियम: प्रार्थना के लिए और भगवान की तलाश के लिए और अपने जीवन में धार्मिकता निर्माण के लिए

  •  “इन बातों पर मनन करो, अपने आप को उन पर पूरी तरह से लगा दो।”
  • कोई आधा रास्ता नहीं है।
  • हम या तो  परमेश्वर की सेवा करते हैं या शैतान की।
  • परमेश्वर  कहते हैं कि अपने आप को पूरी तरह से उन्हें दे दो।
  • आधा रास्ता ईसाई धर्म विफलता और निराशा पैदा करता है।
  • अपने आप को पूरी तरह से यीशु और उसके वचन को दे दो।

परमेश्वर के वचन पर ध्यान करने से सफलता मिलती है

  •  “वह यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न होता है, और उसकी व्यवस्था पर रात दिन ध्यान करता रहता है।
  • वह उस वृक्ष के समान होगा, जो जल की नदियों के किनारे लगाया जाता है, जो अपने समय पर अपना फल लाता है।
  • वो समृद्ध होगा।” 
  •  “वे तेरी दृष्टि से न हटें; उन्हें अपके मन के बीच में रख; क्योंकि जो उन्हें पाते हैं उनके लिये वे जीवन हैं, और उनके सब शरीरों के लिये स्वास्थ्य हैं।
  • अपने हृदय को पूरी लगन के साथ रखना; यह जीवन के मुद्दे हैं।
  • ” भज। 37:31 “उसके परमेश्वर की व्यवस्था उसके हृदय में है, और उसका कोई कदम नहीं हिलेगा”।
  • 1 कुरिं। 3:9 “तुम परमेश्वर के लेपालक हो, “प्रेम में सच बोलना”
  • सब बातों में जो सिर है, अर्थात् मसीह में बड़ा हो सकता है:”
  • भज. 119:23 “राजकुमारों ने भी बैठकर मेरे विरुद्ध बातें कीं, परन्तु तेरा दास तेरी विधियों पर ध्यान करता रहा।

उनकी चितौनियां भी हैं: परमेश्वर की सलाह मेरे लिए खुशी की बात है,

  • और मेरे सलाहकारों “, तू करोगे ध्यान उसमें दिन और रात, कि तू सब उसमें लिखा है के अनुसार करने के लिए निरीक्षण जाए,
  • तो तू तेरा रास्ता समृद्ध बनाने करोगे के लिए, और फिर तू है करोगे अच्छा सफलता।”
  • जो व्यक्ति दिन-रात परमेश्वर के वचन पर ध्यान करता है, वह परमेश्वर के पास हो जाता है क्योंकि वचन ही परमेश्वर है।
  •  ऐसा आदमी जो कुछ भी करता है, वह एक सफलता है।
  • वह पानी के द्वारा लगाए गए पेड़ की तरह है।
  • वह ऐसा है ईश्वर से जुड़ा है कि सूखे के समय में भी उसका पत्ता नहीं मुरझाता।
  • ऐसा व्यक्ति बेल, डाली से जुड़ा हुआ है।

“उसके ईश्वर का कानून उसके दिल में है, उसका कोई कदम नहीं हिलेगा।”

  • वह वही बन जाता है जो वह पु उसके दिल में टीएस। उसके कदम उसके दिल से नियंत्रित होते हैं।
  • वह असफल नहीं हो सकता, वह परमेश्वर को याद कर सकता।
  • परमेश्वर का वचन उसके हृदय में है। परमेश्वर उसे नियंत्रित करते हैं।

“उन्हें अपने हृदय के बीच में रख।”

  • यह उनके लिए जीवन है जो इस रहस्य को खोजते हैं।
  • वचन को अपने हृदय में रखें।
  • यीशु के अलावा किसी और चीज़ पर ध्यान करने से इनकार करें।
  • इससे यीशु का अधिक उत्पादन होगा।
  • आप परमेश्वर के मित्र हैं।
  • तुम परमेश्वर के बगीचे हो।
  • आप बगीचे में बीज डालें।

तुम जो बीज बोओगे, वह शीघ्र ही उस बाग में खिलेगा। 

  • परमेश्वर का वचन आपके बगीचे का बीज है।
  • परमेश्वर के आत्मा के वचन को अपने आत्मा के हृदय में रखो, और तुम्हारे पास ईश्वरीय फल होगा। 
  • अपने दिल में शैतानी विचार रखें, और जल्द ही आपके जीवन में शैतान का फल आएगा।
  • यही कारण है कि रोमियो की पुस्तक  6:13 हमें बताता है, कि हम अपने सदस्यों को ईश्वर को सौंप दें न कि शैतान को।
  • आप जिस किसी के सामने झुकेंगे, वह जल्द ही आप पर हावी हो जाएगा।
  • “प्रेम में सच बोलो, सब बातों में मसीह के रूप में विकसित हो जाओ।”
  • जब हम परमेश्वर के वचन के बारे में सोचते हैं तो हम शीघ्र ही परमेश्वर के वचन को बोलते हैं।
  • हम जल्द ही पूर्ण विकसित पुत्रों के रूप में विकसित हो रहे हैं।

राजकुमार “आपके खिलाफ बोल सकते हैं” लेकिन आप उनके वचन पर ध्यान देंगे। 

  • उसका वचन आपका पहला प्यार और आपका सलाहकार बन जाता है। 
  • परमेश्वर की स्तुति होवे।
  • लोग आपके बारे में क्या कह रहे हैं, इसकी चिंता करने के बजाय, बस वचन की ओर दौड़ें और प्रेम में खो जाएं।
  • उसका वचन आपको सलाह देता है और आपको प्रोत्साहित करता है।
  • यह अब तक का सबसे अच्छा मनोरोग उपचार है।

 “उसमें दिन रात  ध्यान करना, तब तू अपना मार्ग सुफल करना।

  • तब तुझे अच्छी सफलता मिलेगी।” 
  • यदि आप असफल हैं, तो इसका कारण यह है कि आप सफल होने के लिए बहुत आलसी हैं। 
  • परमेश्वर हमें शत्रु विचारों के बजाय लगातार उसके वचन पर ध्यान करने के लिए कहता है;
  • तब हम इन ईश्वरीय विचारों पर कार्य करते हैं जिससे हमारा मार्ग समृद्ध हो जाता है। 

ऐसा ध्यान करने से सफलता मिलती है।

  • संदेह, भय, असफलता, सीमाओं, अपनी कमियों, और चिंता को अपने हृदय में भरते रहो; और ठीक वैसा ही तुम बन जाते हो। 
  • आप असफल हो जाते हैं। 
  • अपने हृदय में परमेश्वर के वचन को खिलाओ और जल्द ही आप इन जीवित परमेश्वर के वचनों के द्वारा पूरी तरह से नियंत्रित हो जाते हैं।
  • वे आपको जीवन देते हैं।
  • वे आपको सफल बनाते हैं।
  • हलेलुजाह! 

अच्छी बातों और सुख पर ध्यान देना, परमेश्वर की एक आज्ञा भी है

  •  “आखिरकार, हे भाइयो, जो जो बातें सत्य हैं, जो जो बातें ईमानदार हैं, जो जो बातें धर्मी हैं,
  • जो जो बातें शुद्ध हैं, जो जो बातें मनोहर हैं, जो जो बातें मनोहर हैं,
  • और जो जो बातें अच्छी हैं, यदि कोई सद्गुण हैं, और यदि कोई प्रशंसा, इन बातों पर विचार करो।” 
  •  “मेरे मुंह के वचन, और मेरे हृदय का ध्यान, हे यहोवा, मेरे बल, और मेरे उद्धारकर्ता, तेरी दृष्टि में ग्रहण योग्य हों।” 
  •  “मेरा मुंह बुद्धि की बातें करेगा, और मेरे मन का ध्यान समझ का होगा।” 

आत्मा का नियम यह है कि हम अच्छी बातें बोलते हैं।

  • हमें उन चीजों के बारे में सोचना है जो शुद्ध, प्यारी और एक अच्छी रिपोर्ट हैं।
  • अगर इसमें कुछ भी अच्छा है, तो हमें उज्ज्वल पक्ष पर बोलना है।
  • हमें एक अच्छी रिपोर्ट लाने के लिए आत्मा द्वारा आज्ञा दी गई है।
  • हमें शैतान द्वारा सिखाई गई इस आदत से छुटकारा पाना है कि हम कमजोर पक्ष, या अंधेरे पक्ष, या घिनौने पक्ष की तलाश में हैं।
  • और हमें एक अच्छी रिपोर्ट पेश करनी है।
  • यदि कोई अच्छी रिपोर्ट नहीं है, तो रिपोर्ट न करें। रिपोर्ट करने के लिए बहुत सारी अच्छी चीजें हैं।

बस विषय वस्तु को यीशु में बदलें। 

  • जब आप अपने आप को फिर से नकारात्मक रिपोर्ट लाते हुए देखें, तो ठीक बीच में रुकें, और कुछ अच्छा करने के लिए आगे बढ़ें।
  • “जो अपनी बात ठीक करने का आदेश देता है, उसे मैं यहोवा का उद्धार दिखाऊंगा।” 
  • सुनिश्चित करें कि आपके ध्यान परमेश्वर की दृष्टि में स्वीकार्य हैं।
  • क्या यीशु उन बातों के बारे में सोचेगा? य
  • दि नहीं, तो वे आपके लिए भी उपयुक्त नहीं हैं।
  • मैं ध्यान और बुद्धि और समझ पर बोलूंगा।
  • मैं गलतफहमियों पर ध्यान नहीं दूंगा।
  • और मैं भ्रमित करने वाले मुद्दों पर ध्यान नहीं दूंगा।
  • मैं केवल अपना मन यहोवा पर रखूंगा।
  • मैं इस रवैये के साथ भगवान और अपने देश के लिए एक विवादास्पद तर्कपूर्ण भावना के साथ अधिक उद्धार करूंगा। 

ध्यान: आयोजन के समय शांति का समय है

  •  “इसहाक मैदान में ध्यान करने के लिए निकला था: और उसने अपनी आंखें उठाई, और देखा, और देखो, ऊंट आ रहे थे।” 
  • प्रेरितों के काम 10:9 “… पतरस छत पर चढ़कर छठवें पहर के निकट प्रार्यना करने को गया: और वह बहुत भूखा हो गया, और खा लेता;
  • परन्तु जब वे तैयार हो रहे थे, तब वह मूर्छित हो गया, और देखा कि स्वर्ग खुल गया है। ” 
  •   “मैं अपने दिल से बातचीत करता हूं: और मेरी आत्मा ने परिश्रम से खोज की।” 
  •  “आश्चर्य से खड़े रहो, और पाप न करो: अपके बिछौने पर अपके मन से बातें करो, और चुप रहो।” 
  • “खड़े रहो, और मैं सुनूंगा कि यहोवा तुम्हारे विषय में क्या आज्ञा देगा।”

शांत समय में परमेश्वर के साथ रहें।

  • कुछ लोगों के लिए सुबह का समय अच्छा होता है।
  • दूसरों को पता चलेगा कि दोपहर में भोजन करने से ठीक पहले परमेश्वर के साथ संवाद करने का एक उत्कृष्ट समय है।
  • इसहाक सांझ से ठीक पहले ध्यान करने निकला।
  • यह शायद इब्राहीम की ओर से उसे सौंपी गई एक प्रथा थी।
  • दोपहर के भोजन से ठीक पहले पतरस प्रार्थना करने गया; और प्रार्थना करते-करते वह बेहोश हो गया; और परमेश्वर ने उस से आत्मा के द्वारा बातें कीं।

इस तरह परमेश्वर को खोजने का एक अच्छा समय खाली पेट है।

  • जब आप उपवास की आत्मा में हैं।
  • तब आत्मा अधिक सक्रिय प्रतीत होती है।
  • “मैं अपने दिल से संवाद करता हूं।  मेरी आत्मा ने एक मेहनती खोज की।”

आप अपने दिल की तलाश शुरू करते हैं।

  • आप आत्मा की दुनिया में देखना शुरू करते हैं।
  • जब आप उसका ध्यान करते हैं तो परमेश्वर आपसे बात करना शुरू कर देता है।
  • “अपने बिस्तर पर अपने दिल से संवाद करें, और शांत रहें।” 
  • जैसे ही आप आराम करने के लिए लेट जाएं, शांत हो जाएं।

ध्यान का नियम: प्रार्थना और परमेश्वर की तलाश के बारे में है

अपना पूरा ध्यान यीशु पर लगाएं।

  • बस उसकी उपस्थिति में प्रतीक्षा करें। 
  • वह इस वातावरण में आत्मा के उपहारों को प्रकट करना शुरू कर देगा।
  • इससे पहले कुछ समय के लिए स्तुति और आत्मा में प्रार्थना करना अच्छा है। 
  • कई बार मैं आत्मा में पंद्रह मिनट से एक घंटे तक प्रार्थना करता हूं। तब मैं चुप हो जाऊंगा।
  • कभी-कभी मैं वास्तव में पाँच मिनट के लिए सो जाता हूँ। 
  • जैसे ही मैं जागना शुरू करता हूं मैं परमेश्वर से सुनता हूं।
  • चेतावनी पर ध्यान दें;

  • “आश्चर्य में खड़े रहो और पाप मत करो।”
  • धार्मिकता और पवित्रता बहुत महत्वपूर्ण हैं।
  • पाप पवित्र आत्मा के साथ संचार की रेखाओं को तोड़ सकता है और उन्हें शत्रु आत्मा के साथ स्थापित कर सकता है।
  • “इसलिये खड़ा रह कि मैं सुन सकूँ कि यहोवा तेरे विषय में क्या आज्ञा देगा।”

यह आत्मा का नियम है।

  • जैसे ही हम शांत और स्थिर होते हैं, हम आसानी से भगवान की आवाज सुन सकते हैं।
  • (प्रार्थना और ईश्वर की खोज के लिए, और ईश्वर को अपने जीवन में बनाने के लिए)

परमेश्वर के वचन पर ध्यान एक आज्ञा है

  •  “मैं भी तेरे सब कामों पर ध्यान करूंगा, और तेरे कामों की चर्चा करूंगा।” 
  •  “इन बातों पर मनन करना, अपने आप को इन में पूरा कर देना, कि तेरा लाभ सब को दिखाई दे।”
  • “हे मैं तेरी व्यवस्था से कैसी प्रीति रखता हूं! सारा दिन मेरा ध्यान यही रहता है।” 
  •  “व्यवस्था की पुस्तक तेरे मुंह से न छूटे; परन्तु तू उस में दिन रात ध्यान करना, कि जो कुछ उस में लिखा है उसके अनुसार करने के लिये चौकसी करना;
  • क्योंकि तब तू अपके मार्ग को सफल बनाएगा, और तब तुझे अच्छी सफलता मिलेगी।” 
  •  “यदि कोई मुझ से प्रेम रखता है, तो वह मेरे वचनों को मानेगा, और मेरा पिता उस से प्रेम रखेगा, और हम उसके पास आएंगे, और उसके साथ निवास करेंगे।” 
  • “मैं अब तुम्हें लिखता हूं; उन दोनों में जो मैं तुम्हारे शुद्ध मन को स्मरण के द्वारा उभारता हूं:
  • कि तुम उन वचनों से सावधान रहो जो पवित्र भविष्यद्वक्ताओं द्वारा पहले कहे गए थे, और की आज्ञा हम प्रभु और उद्धारकर्ता के प्रेरित हैं।” 

आत्मा का नियम यह है कि हम परमेश्वर के वचन पर मनन करें और उसके कार्यों के बारे में बात करें।

आप जिस चीज का ध्यान करते हैं, वह शीघ्र ही आपका हिस्सा बन जाती है।  “इन बातों पर मनन करो, अपने आप को उन पर पूरी तरह से लगा दो।”  यह आत्मा का नियम है। जैसे ही हम शांत और स्थिर होते हैं, हम आसानी से भगवान की आवाज सुन सकते हैं। 

निर्धारित स्पष्ट लक्ष्य क्यों जरूरी है?

12 BEST QUOTES ABOUT CHARACTER | अनमोल वचन

Audio Hindi Bible

समृद्धि का नियम (Rule of Prosperity): ये सभी क्षेत्रों में अपने जीवन में सफलता के निर्माण के लिए है।

समृद्धि का नियम (Rule of Prosperity): ये सभी क्षेत्रों में अपने जीवन में सफलता के निर्माण के लिए है।

 परमेश्वर की इच्छा है कि हम समृद्ध हों । समृद्धि का नियम (Rule of Prosperity): ये सभी क्षेत्रों में अपने जीवन में सफलता के निर्माण के लिए है। –समृद्धि का नियम: ये सभी क्षेत्रों में अपने जीवन में सफलता के निर्माण के लिए है।  हे प्रियों, मैं चाहता हूं, कि सब से बढ़कर तेरा भला हो, और तेरे प्राण की उन्नति के अनुसार तू स्वस्थ रहे।   “वह अपने मार्ग को सुफल बनाएं।” “क्योंकि बीज समृद्ध होगा; दाखलता अपना फल देगी, और भूमि अपनी वृद्धि देगी, और आकाश अपनी ओस देगा; और मैं इन लोगों के बचे हुओं को इन सब वस्तुओं का अधिकारी बनाऊंगा।” 

परमेश्वर की इच्छा है कि हम समृद्ध हों

Optimal Health - 51VxeI8UYNS edited - Optimal Health - Health Is True Wealth.
समृद्धि का नियम (Rule of Prosperity): ये सभी क्षेत्रों में अपने जीवन में सफलता के निर्माण के लिए है।
  •  “स्वर्ग का परमेश्वर, वह हमें समृद्ध करेगा; इसलिए हम उसके सेवक उठेंगे और निर्माण करेंगे:” 
  • उत्पत्ति 24:56 “मुझे मत रोको, यह देखते हुए कि प्रभु ने मेरे मार्ग को समृद्ध किया है ” 
  •  “और यहोवा यूसुफ के संग रहा, और वह धनवान या।
  • और उसके स्वामी ने देखा, कि यहोवा उसके संग है, और जो कुछ वह करता या, वह सब यहोवा ने उसके हाथ से किया;
  • यूसुफ पर अनुग्रह हुआ; और उस ने उसको देखा, और उस ने उसकी उपासना की,
  • और उसको अपने घर का, और अपना सब कुछ उसके हाथ में कर दिया।”
  • “सबसे बढ़कर मेरी इच्छा है कि आप समृद्ध हों।” 
Optimal Health - Dgyx jrVAAUGJ5q - Optimal Health - Health Is True Wealth.
समृद्धि का नियम (Rule of Prosperity): ये सभी क्षेत्रों में अपने जीवन में सफलता के निर्माण के लिए है।

यह तुम्हारे लिए परमेश्वर की सिद्ध इच्छा है। 

  • आपके लिए असफल होना यीशु के लिए कोई सम्मान की बात नहीं है।
  • “वह अपने मार्ग को समृद्ध बनाएगा।”
  • परमेश्वर ने आपके रास्ते को समृद्ध बनाया है।
  • शत्रु ने तुम्हें घेर लिया है।
  • समृद्धि की राह पर वापस आएं। 

“बीज समृद्ध होगा: दाखलता अपना फल देगी, और भूमि उसे बढ़ाएगी।” 

  • यह परमेश्वर की योजना है।
  • यह शायद एक सहस्राब्दी कविता है; हालाँकि, आप इसे अभी अपने लिए लागू कर सकते हैं।
  • समृद्धि के नियम में आगे बढ़ने का निश्चय करें। 
  • यह परमेश्वर,का नियम है। 

शत्रु का नियम असफलता और दरिद्रता है। 

  • आप किसमें चलने जा रहे हैं?
  • यह आप पर निर्भर है।
  • “मुझे मत रोको, प्रभु को देखकर मुझे सफलता मिली है।”

यह युगों-युगों का नारा है। 

  • परमेश्वर,एक पिता है जो अपने बच्चों को समृद्ध देखना पसंद करता है।
  • जैसे-जैसे हम समृद्ध होते हैं, परमेश्वर स्वयं को बार-बार हममें देखता है।
  • जब हम असफल होते हैं तो शैतान हमारे अंदर दिखाई देता है।
  • “यहोवा यूसुफ के संग रहा, और वह धनी पुरूष था।” 
  • यहाँ एक कानून है।
  • इसे अपने दिल में उतारो।
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समृद्धि का नियम (Rule of Prosperity): ये सभी क्षेत्रों में अपने जीवन में सफलता के निर्माण के लिए है।

जब परमेश्वर,आपके साथ होंगे तो आप समृद्ध होंगे।

  • यीशु ने कहा, “यदि कोई मेरी सेवा करे, तो वह मेरे पिता का आदर करेगा।”
  • आपका सम्मान करने से परमेश्वर प्रसन्न होते हैं।
  • जब आप मसीह में चलते हैं, तो परमेश्वर आपके माध्यम से चलता है और आपको समृद्ध करता है।
  • अगर परमेश्वर,आपके साथ है, तो आप समृद्ध होंगे।
  • यदि आप समृद्ध नहीं हैं, तो अपने आप को एक आध्यात्मिक दर्पण के पास ले जाएँ और देखें कि आप कहाँ परमेश्वर,को याद कर रहे हैं।
  • परमेश्वर,असफल नहीं हो सकते।
  • यीशु विजयी और समृद्ध था क्योंकि परमेश्वर उसके साथ था।

समृद्धि का मतलब यह नहीं है कि आपके पास एक बड़ा बैंक खाता है।

  • आप कई क्षेत्रों में समृद्ध हो सकते हैं। 
  • हालाँकि, आपको आर्थिक रूप से समृद्ध होना चाहिए। 
  • यीशु का अपना कोषाध्यक्ष था और वह गरीबों को देने की निरंतर आदत में था। 
  • उन्हें गरीबी से त्रस्त एक के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया था। 
  • आपको कम से कम इस दायरे में जाना चाहिए। 

परमेश्वर अपने दूत को समृद्ध करता है 

समृद्धि का नियम: ये सभी क्षेत्रों में अपने जीवन में सफलता के निर्माण के लिए

  • “प्रभु अपने दूत को तेरे साथ भेजेगा, और तेरा मार्ग समृद्ध करेगा;समृद्ध करता है 
  • हमारे सामने भेजकर हमें जब हम उसके वचन को मानते हैं तो परमेश्वर हमें  “इसलिये इस वाचा के वचनों को मानना, और उनका पालन करना,
  • कि जो कुछ तुम करते हो उस में तुम सफल हो सके।”
  •  “केवल तू बलवन्त और बहुत साहसी बन, कि तू सारी व्यवस्था के अनुसार करने के लिए चौकस रह सके, कि जहां कहीं तू जाए वहां उन्नति कर सके।”
  • अब, हे मेरे पुत्र, यहोवा तेरे संग रहे; और तू कुशल से हो, और जैसा उसने तेरे विषय में कहा है, वैसा ही अपने परमेश्वर यहोवा का भवन भी बना इस्राएल,
  • कि तू अपने परमेश्वर यहोवा की व्यवस्था का पालन करे,
  • तब यदि तू उन विधियोंऔर नियमों को जिन को यहोवा ने मूसा को ठहराया या, उनको पूरा करने पर ध्यान से तू सुफल होगा।

“तुम यहोवा की आज्ञाओं का उल्लंघन क्यों करते हो, कि तुम सफल नहीं हो सकते?

  • क्योंकि तुमने यहोवा को त्याग दिया है, उसने तुम्हें भी छोड़ दिया है।”
  • “परन्तु वह यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता है, और उसकी व्यवस्था पर रात दिन ध्यान करता रहता है।
  • और वह उस वृक्ष के समान होगा जो जल की नदियों के किनारे लगाया जाता है, जो अपने समय पर फल लाता है।
  • उसका पत्ता भी न मुरझाएगा, और जो कुछ वह करे वह सुफल होगा।”
  • “मेरा वचन जो मेरे मुंह से निकलता है, वैसा ही होगा; वह व्यर्थ न होकर मेरी ओर फिरेगा,
  • वरन जो कुछ मैं चाहता है वह पूरा करेगा, और जिस काम में मैं उसे भेजता हूं उसमें वह सफल होता है।”

“यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें, तो जो चाहो मांगो, और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।” 

“मैं तुम्हें परमेश्वर के पास, और उसके अनुग्रह के वचन की प्रशंसा करता हूं, जो तुम्हें बनाने में सक्षम है, और तुम्हें विरासत में दे सकता है।” 

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समृद्धि का नियम (Rule of Prosperity): ये सभी क्षेत्रों में अपने जीवन में सफलता के निर्माण के लिए है।

जब हम उसके वचनों का पालन करते हैं और उन्हें करते हैं, तो हम समृद्ध होते हैं। 

  • याकूब 1:22 “वचन पर चलने वाले बनो और केवल सुनने वाले ही नहीं।”
  • यहाँ आत्मा का नियम है। परमेश्वर अपने वचन में है।
  • जब आप वह करते हैं जो वचन कहता है, तो आप परमेश्वर में आगे बढ़ रहे हैं।
  • इसे समृद्ध करना है।
  • जब आप उसके वचन में बने रहेंगे, तो आप “जो चाहोगे मांगोगे, वह हो जाएगा।” 
  • किसी व्यक्ति के लिए परमेश्वर और उसके वचन में बने रहना और असफल होना असंभव है।
  • अब अपना मन बनाओ।
  • क्या आप उसके वचन का आंशिक रूप से पालन करने और आंशिक आशीष का आनंद लेने जा रहे हैं,
  • या क्या आप पूरे रास्ते जाकर अपने मार्ग को समृद्ध होते हुए देखने जा रहे हैं? 

“केवल यहोवा ही तुझे बुद्धि और समझ दे कि परमेश्वर की व्यवस्था का पालन करे।” 

  • परमेश्वर के वचन का पालन करना ब्लूप्रिंट के एक सेट का अनुसरण करने जैसा है।
  • यदि वास्तुकार को पता था कि वह क्या कर रहा है, और आप उनका ठीक उसी तरह अनुसरण करते हैं जैसा कि खींचा गया है, तो आप असफल नहीं हो सकते।
  • परमेश्वर जानता है कि वह क्या कर रहा है।
  • यदि आप असफल हैं, तो जांचें कि आपने ब्लूप्रिंट को कहां गलत तरीके से पढ़ा है।
  • “वह अपनी व्यवस्था के अनुसार दिन रात ध्यान करता है, जो कुछ वह करेगा वह सफल होगा।”
  • परमेश्वर निडरता से घोषणा करता है, “मेरे वचन पर ध्यान लगाओ और तुम जल के द्वारा लगाए गए वृक्ष के समान हो जाओगे।
  • तुम्हारा पत्ता न मुरझाएगा और न मुरझाएगा।

तुम जो कुछ भी करोगे वह समृद्ध होगा।” ऐसा क्यों है? 

  • परमेश्वर का वचन आपको परमेश्वर के अधीन होने का कारण बनता है। 
  • “यदि कोई मुझ से प्रेम रखता है, तो वह मेरे वचनों पर चलेगा, और मेरा पिता उस से प्रेम रखेगा, और हम उसके पास आकर उसके साथ निवास करेंगे।” 
  • आइए हम अधिक से अधिक लोगों को पूरी तरह से परमेश्वर के वचन के अधिकार में रखें। 
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समृद्धि का नियम (Rule of Prosperity): ये सभी क्षेत्रों में अपने जीवन में सफलता के निर्माण के लिए है।

परमेश्वर हमें समृद्ध करता है क्योंकि हम यहोवा को ढूंढते हैं 

  •  “जब तक वह प्रभु को खोजता रहा, परमेश्वर ने उसे समृद्ध किया।” 
  •  “किस ने उसके विरुद्ध अपने आप को कठोर किया है, और सफल हुआ है?” 
  • “यदि तू उसे चान्दी की नाईं ढूंढ़े, और गुप्त धन की नाईं उसकी खोज करे, तो क्या तू यहोवा के भय को समझ सकेगा, और परमेश्वर का ज्ञान पा सकेगा।” 
  • “वह लालसा वाले जीव को तृप्त करता है, और भूखे को भलाई से तृप्त करता है।”
  • परमेश्वर को खोजने के लिए अपना दिल लगाओ।
  • ईश्वर आपको समृद्ध बनाएगा।
  • यदि आपका जीवन ईश्वर के लिए उत्पादन नहीं कर रहा है, तो उसे खोजो। 

प्रार्थना और उपवास के द्वारा उसे खोजो। 

  • दिन-रात उसकी तलाश करो। मैं तुमसे वादा करता हूँ कि तुम उसे पाओगे, और तुम कभी भी पहले जैसे नहीं रहोगे।
  • परमेश्वर को जानने के लिए अपने दिल को चकमक पत्थर की तरह लगाएं।
  • आप समृद्ध होंगे। 
  • जितना खोजोगे उतना ही पाओगे।
  • जब आप परमेश्वर  को खोजते हैं, तो आपको एक ऐसा परमेश्वर मिलता है, जो समृद्ध होता है।
  • आप समृद्धि के साथ बहने लगते हैं क्योंकि आपको एक समृद्ध परमेश्वर  मिल गया है।
  • परमेश्वर  के बारे में सब कुछ समृद्ध है।

इसलिए यदि आप उसे और पाते हैं तो आपके लिए समृद्ध होना स्वाभाविक ही है।

  •  “वह लालसा आत्मा को संतुष्ट करता है। वह भूखी आत्मा को भलाई से भर देता है।”
  • वह उन्हें संतुष्ट करता है जो उससे अधिक की लालसा रखते हैं।
  • परमेश्वर यहोवा उन्हें भरता है, जो परमेश्वर के भूखे हैं। 
  • आप कुछ ऐसा नहीं भर सकते जो पहले से ही भरा हुआ हो।
  • यदि तुम संसार से भरे हुए हो तो तुम परमात्मा से नहीं भरे जा सकते।
  • सांसारिक “जग” से निकल जाओ।
  • परमेश्वर के भूखे हो जाओ।
  • अपनी भूखी आत्मा को यीशु के अलावा कुछ भी से संतुष्ट न करें। 

 बाइबल के अनुसार जीवन आत्मा की व्यवस्था किसे कहते हैं?  

समृद्ध मानसिक आदतें

https://vdocuments.net/the-power-of-the-tongue-by-kenneth-copeland.html

The Universal Laws Of Prosperity And Abundance! (Law Of Attraction)

The Law of Confession

The Law of Confession

 ‘The Laws of the Spirit’- By Bob Buses-This is the article about, The Law of Confession- To build strength through proper use of words, The Law of the Spirit is based on Rom. 8:2. “For the law of the Spirit of life in Christ Jesus hath made me free from the law of sin and death.” Every Word of God is a Spirit Word. Jn. 6:63 “It is the Spirit that quickeneth; the flesh profiteth nothing: the words that I speak unto you, they are spirit, and they are life.” They are the truths of God’s Spirit. They are Spirit laws. When acted upon they produce life. 

"The

1 The Law of Confession- To build strength through proper use of words

  •  2 The Law of Meditation- (For prayer and seeking God, and for building God into your life) 
  •  3 The Law of Prosperity-  (For building success into your life in all areas) 
  • 4 The Law of Riches- (To overcome poverty in personal life and your church) 
  • 5 The Law of Giving- (To understand the law of increase through giving) 
  • 6 The Law of Poverty-  (To wash out traditional teachings concerning poverty) 
  • 7 The Law of Abundance- (To build into your thinking the Abundance of God’s blessings) 
  •  8 The Law of Strength- (To overcome weakness and failure in your life) 
  •  9 The Law of Growth- (Use to open your life to growth and enlargement in Christ) 
  •  10 The Law of Deliverance-  (To build faith for deliverance in all areas) 
  •  11 The Law of Healing- (Read over and over when sick) 
  • 12 The Law of Safety- (Read before trips, or when fear tempts you or to children before they leave home)
  • When ignored through ignorance or rebellion, they produce death.

The law of the Spirit is life.

  • This law, when acted upon, makes one free from the opposite law.
  • The law of sin is death.
  • Obey sin and unbelief; then death follows.
  • So every promise that you believe and act upon regardless of emotion or feeling produces life and deliverance from bondage.
  •  Jn. 8:32 “Ye shall know the truth and the truth shall make you free.”

As you continue in God’s Word, then you become a full-grown son.

  • You become a real disciple.
  • You then operate in God’s truth.
  • This truth liberates you.
  • The entire purpose of this book is to put the Word of God in your heart. 
  • The reader is encouraged to apply this Word to daily problems.

 Each time the Word makes a statement,

  • the believer or reader is encouraged and taught to act upon that Word regardless of feelings, emotions, or previous experience to the contrary.
  • As the believer begins to believe the Word of God regardless of experience or emotions,
  • then full-grown faith begins to manifest itself in the heart.
  • Therefore, the reason for this book is to help you to let the Word of God become your law of life instead of experience,
  • and unbelief your law of sin and death.

The Law of Confession

The scriptures are placed at the beginning of each subdivision.

  • Then the same scriptures are discussed immediately following.
  • This follows throughout the entire book.
  • My suggestion is that you use these scriptures to build faith.
  • This is why I have them all at the beginning of each topic.

Read and reread these scriptures daily to build faith.

  • These scriptures are also good for Bible studies and prayer groups.
  • These scriptures have accumulated in my notebook from my daily devotional studies.
  • I have not tried to cover the entire field.
  • You can easily build several messages out of each topic.
  • I Pet. 2:2 “Like newborn babies, desire the sincere milk of the Word that ye may grow thereby.”
  • Newborn babes drink milk every three or four hours.
  • Take a Word break rather than a coffee break.
  • Put a vitamin in you every few hours to build up the Spiritual deficiency in any area you find lacking.

These scriptures serve as vitamin pills.

  •  Read them, and reread them daily under the subject most needed during that day.
  • I usually read them during devotion over and over.
  • Then I stop and pray after the verses as I feel led.
  • One chapter is plenty to work on during the day.

However, you may feel led to use several or parts of several.

  • Read the book completely through several times.
  • Then use it as a faith builder daily.
  • After you have read the book through a couple of times you may want to disregard the comments.
  • Just stick to the scriptures under each topic.

The Law of Confession

 When you need healing, read verses over and over under healing. 

  • Read them until you believe in healing more than you do the Devil’s sickness.
  • When weak, read the scriptures on Strength over and over until you are convinced of God’s law of strength.
  • Automatically you will begin to disbelieve in Satan’s law of weakness.
  • Thus you can use the different chapters in daily faith-building.
  • Some of the scriptures used are taken out of context and are applied spiritually for the reader today.
  • 2 Tim. 3:16 “All scripture is … profitable.”
  • 1 Cor. 10:11 “Now all these things happened unto them for ensamples: and they were written for our admonition …” 

The Law of Confession- To build strength through proper use of words

 THE TONGUE IS A TREE OF LIFE 

  • Pr. 6:2 -“Thou art snared with the words of thy mouth, thou art taken with the words of thy mouth.”
  •  Pr. 12:13-14 ” The wicked is snared by the transgression of his lips: but the just shall come out of trouble. 
  • A man shall be satisfied with good by the fruit of his mouth: …”
  •  Pr. 15:4 “A wholesome tongue is a tree of life: but perverseness therein is a breach in the Spirit.” 
  • Pr. 18:21  “Death and life are in the power of the tongue: and they that love it shall eat the fruit thereof.” 
  • “You are snared by your words.” Whatever you speak becomes part of you sooner or later.
  • “The wicked is snared” by his words. 
  • The just shall come out of trouble with his words.

The Law of Confession

 “A man shall be satisfied with good” by proper use of words. 

  • The words you speak are the fruit of your spirit.
  •  Your heart speaks through the lips and the fruit is therefore born on the lips.
  •  Negative words tear and destroy what the good words have built up.
  •  Every good word builds a shield around you.
  •  Every negative word tears this shield down.
  •  Keep your words right and the enemy cannot tear down that shield.
  • He will not be able to penetrate you. 

The Law of Confession

WHATEVER YOU PUT IN YOUR HEART WILL COME FORTH 

  • Mt. 12:35-37  “A good man out of the good treasure of the heart bringeth forth good things:
  • and an evil man out of the evil treasure bringeth forth evil things. 
  • But I say unto you, that every idle word that men shall speak,
  • they shall give account thereof in the day of judgment. 
  •  For by thy words thou shalt be justified, and by thy words, thou shalt be condemned.”
  • Pr. 4:23  “Keep thy heart with all diligence; for out of it are the issues of life.”
  • 1 Cor. 3:9 “.  Ye are God’s husbandry .” (farm)

This is a law of the Spirit. You get whatever you speak. 

  • Mk. 11:23 “You shall have what you say.”
  • “A good man out of the good treasure of his heart bringeth forth good things.”
  • The heart is where the words are stored. Then they are released through the lips. 
  • The good man stores the Word.
  • He meditates on God.
  • He brings forth good things.
  • “The evil man out of the evil treasure brings forth evil.”
  • Whatever you put in will grow up and come out.

The Law of Confession-To Build Strength Through Proper Use Of Words 

This is the law of reaping.

  • You reap what you sow.
  • Whatever you think on most becomes a part of you.
  • When you speak it, it is yours.
  • By thy words, thou shalt be justified or condemned.

Your words will deliver you, or they will condemn you.

  • Your words are what you believe in the most.
  • Confess sickness, and get sick because you believe in sickness more than you do the healing.
  • Confess failure, and get failure because you believe in failure more than you do victory through Jesus Christ.
  • And Confess the ministry of Christ, and you get the ministry of Christ
  • because you believe in the ministry of Christ more than you do the ministry of doubt and unbelief which are born in hell.
  • “Keep your heart with all diligence for out of it are the issues or controlling factors of your life.”
  • Pr. 23:7  “As he thinketh in his heart so is he.”

The Law of Confession-To Build Strength Through Proper Use Of Words 

Whatever you put in that heart is going to bear fruit.

  • It will someday grow up and become a part of your speech.
  • When it does, you have accepted that as your law.
  • So fill your heart with God’s Word.
  • Then God will come forth on your lips and deliver you in the area concerning your speech at that moment.
  • Whatever you believe in the most will come forth through your lips and control you.
  • So become God-possessed through reading, and studying, and doing God’s Word.
  • Then God will always be on your lips.
  • Then God will always be the shield around you through good and proper words.
  • And then the enemy cannot penetrate. 

The Law of Confession

ALL INCREASE OR DECREASE IN YOUR LIFE COMES BY YOUR TONGUE 

  • “A wholesome tongue is a tree of life: but perverseness therein is a breach in the spirit.”Pr. 15:4 
  •  “Death and life are in the power of the tongue: and they that love it shall eat the fruit thereof.” Pr. 18:21
  •  “A man’s belly shall be satisfied with the fruit of his mouth; and with the increase of his lips shall he be filled.” Pr. 18:20 
  •  ” To him that ordereth his conversation aright will I show the salvation of God.” Ps. 50:23 
  • “Whoso privily slandereth his neighbor, he will I cut off .”  Ps. 101:5  
  • “A man shall eat well by the fruit of his mouth: but the soul of the transgressors shall eat. He that keepeth his mouth keepeth his life: but he that openeth wide his lips shall have destruction.” Pr. 13:2-3-

The sweetness of the lips increaseth learning.” Pr. 16:21

  •  1 Tim. 2:16-17 “Shun profane and vain babblings: for they will increase unto more ungodliness.”
  • James 3:2 “For in many things we offend all.
  • If any man offends not in word, the same is a perfect man, and able also to bridle the whole body.”
  • “Whoso keepeth his mouth and his tongue keepeth his soul from troubles.” Pr. 21:23
  • “Heaviness in the heart of man maketh it stoop: but a good word maketh it glad.”
  • Pr. 10:20 “The tongue of the just is as choice silver. ” Pr. 12:25
  • “The tongue of the wise is health.” Pr. 12:18
  • Pr. 13:3 “He that keepeth his mouth keepeth his life: but he that openeth his lips shall have destruction.”

This is a law established by God’s Spirit Word.

  • All increase or decrease in your life comes by your tongue.
  • “A wholesome tongue is life.”
  • Perverseness in your words is a breach or tear in the spirit.
  • All the victory drains out through these torn places.
  • Your tongue is either building life; or it is tearing, destroying, and killing you and yours.
  • Every good word is a blessing to you and yours.
  • Every negative word of doubt, unbelief, and condemnation is destruction.
  • “Death and life are in the tongue.”
  • Some people love to build. Some people love to kill.
  • Learn to build your family.

The Law of Confession-To Build Strength Through Proper Use Of Words 

Learn to lift them. 

  • And Learn to speak words that encourage and bless.
  • Send your children off to school in an atmosphere of life and joy.
  • Send the wife or husband forth in an atmosphere of strong words of love.
  • Deal with your business associates with words of deliverance.
  • Away with this negative approach.
  • Think the right side.
  • Don’t always emphasize the gloomy side.
  • This is the enemy.

Emphasize the good side. 

  • This is Jesus. 
  • The good, be it but small, will overcome if you will give it a word of encouragement.
  • You can build or kill your church with words.
  • And You can build or kill your family with words.
  • You can build or kill your usefulness in the community with words. 

Determine to use words that create a life for you in the kingdom of God.

  • “Your belly will be satisfied with the fruit of your mouth.” 
  • Your spiritual belly or your physical belly will increase or decrease as your words rise or fall.
  • “Whoso privily slandereth his neighbor will be cut off.”
  • God cannot use a man that does not keep his tongue.
  • He is working for the enemy and not God.
  • It is impossible to be used to any great extent if you continually speak negative words of judgment and slander against people with whom you associate.
  • Away with this spirit of the Devil.
  • It will destroy you and all you ever want to be.

“Transgressors shall eat violence.”

  • Transgress with your lips, and you reap transgressions.
  • It is the law of sowing and reaping.
  • If you want more love, start loving.
  • If you want more faith, start using the faith you have.
  • And If you want more joy, begin to rejoice in all things.
  • If you want the gifts of the Spirit to operate, through love and faith begin to do what you can; and they will blossom forth.
  • The reverse is also true.
  • If you want trouble, just speak trouble.

If you want your financial blessings to stop flowing,

  •  just stop giving your tithes and offerings. 
  • If you want love to stop, just start being bitter. 
  • Whatever you sow, you shall reap. 
  • So if you want violence to hit you, just speak violence against others. 
  • It won’t be long until this violence will have done its destruction in you. 
  • Sickness comes in this manner at times.

The Law of Confession-To Build Strength Through Proper Use Of Words 

Financial setbacks sometimes come in this manner.

  • Defeat will be around if you sow words of negative content.
  • “He that keepeth his mouth keepeth life.”
  • Your spirit stores the words you put into it.
  • The tongue releases these words.
  • When you release good words they produce life.
  • When you meditate on and release negative words, you are speaking death and condemnation.
  • Whatever comes forth out of your spirit lives on.

We are dealing with the spirit world.

  • So whatever comes out of your spirit is spirit.
  • This is why when people speak good or bad it keeps ringing in your ears for days.
  • “He that openeth wide his lips shall have destruction.
  • Let your spirit speak words that were inspired by the Devil and you reap the Devil.
  • You have yielded yourself to the enemy spirit.
  • You actually joined forces temporarily with the enemy.
  •  “Whoso ordereth his conversation aright will I show the salvation of God.”
  • There is nothing that God won’t do for you if you stop yielding your words to the enemy.

Stop thinking for the enemy. 

  • Stop storing up enemy words of doubt, shame, sin, fear, greed, envy, and hatred in your heart.
  • Whatever you put there will soon be out.
  • Once it gets out, it pierces everything good you ever did.
  • He that learns to control his tongue has learned the secret of coming into perfect Sonship through Christ: Let me explain something here.
  • Every born-again believer is a son.
  • However, some of us don’t act like sons.

The Law of Confession-To Build Strength Through Proper Use Of Words 

“Sweetness of the lips increaseth learning.”

  • This is a lip that speaks for Jesus all the time.
  • So naturally, you are going to get an increase in learning. You become completely shielded by Jesus.
  •  “Vain babblings will increase to more ungodliness.”
  • Whatever you put forth, be it good or be it bad will increase.
  • God help us to recognize this law of the Spirit!
  • We must stop speaking for the Devil.
  • When we speak negative words, we are building the Devil’s work.

“Heaviness in the heart maketh it stoop. A good word maketh it glad.” 

  • Try it. One lady began to say she loved a person that she hated.
  • After saying it five times, the glory of God filled her soul; and she began to love the person.
  • Praise His Name.
  • “The tongue of the just is as choice silver.”

Speak words of faith, and financial blessings flow.

  •  Speak words of sin, and poverty comes your way.
  • “The tongue of the wise is health.”
  • Your tongue will make you well, or it will make you sick.
  • Just keep on complaining and speaking gloom every hour of your day, and Mr. Devil Gloom comes into your life with sickness and destruction.
  • On the other hand, speak of Jesus and joy and happiness all day long, and Jesus comes into your life and drives out the enemy, Mr. Devil Gloom.
  • Hallelujah!
  • “The just shall come out of trouble,” with proper words.
  • From this day forward Confess good words.
  • Confess a good confession.
  • All increase or decrease comes with your tongue.  

The Law of Confession

CHRISTIANITY IS BASED ON CONFESSION

  •  Rom. 10:9-10 “That if thou shalt confess with thy mouth the Lord Jesus,
  • and shalt believe in thine heart that God hath raised him from the dead, thou shalt be saved. 
  • For with the heart, man believeth unto righteousness; and with the mouth, confession is made unto salvation.”
  • Mk. 11:23 ” Believe that those things which he saith shall come to pass; he shall have whatsoever he saith.
  • ” Heb. 3:1 “Wherefore, holy brethren, partakers of the heavenly calling,
  • consider the Apostle and High Priest of our profession, (confession) Christ Jesus.”
  • Mt. 10:32 “Whosoever, therefore, shall confess me before men, him will I confess also before my Father which is in heaven.
  • Whosoever shall deny me before men, he will I also deny before my Father which is in heaven.
  • If you confess with your mouth and believe in your heart, you shall be saved. Confession seals your faith.

The Law of Confession

Confession is made unto salvation. 

  • And Confession produces salvation.
  • However, you have to believe it in your heart first.
  • If a person denies every day that he is saved, he will not grow very much in Jesus.
  • On the other hand, if he confesses that Jesus saved him because he accepted Him into his heart,
  • regardless of feeling, joy will flow; faith will rise, and deliverance will come more and more. 

The more you confess, the greater release you have.

  •  If you believe, you will have what you say.
  • This is the law of the Spirit. Base your belief in the Word statement.
  • Confess it until you get it.
  • (Mk. 11:23) “Consider the apostle and high priest of ours. ” 

  • The profession is the same as a confession in Greek.
  •  The same word is translated throughout the New Testament as a confession. 
  • Jesus is the high priest of what you will confess based on true faith in the heart.
  • He will confess what you confess. Hallelujah! 

  • “Whosoever shall confess me before men, he will I confess to my Father in heaven.
  • Whoever denies me before men, he will deny before my Father.”
  • Whatever you confess, Jesus confesses it to the Father.
  • Confess healing; He confesses healing.
  • Confess salvation; He confesses salvation.
  • Deny healing, and He denies healing to the Father.
  • Whatever you confess, He confesses. He is the high priest of your confession.

The Law of Confession

WE ARE TO SPEAK THE WORD OF GOD 

  • Ep. 5:19 “Speaking to yourselves in psalms and hymns and spiritual songs, singing and making melody in your heart to the Lord.” 
  • 1Pet. 4:11 “If any man speaks, let him speak as the oracles of God;
  • ” Col. 3:16 “Let the word of Christ dwell in you richly in all wisdom;
  • teaching and admonishing one another in psalms and hymns and spiritual songs, singing with grace in your hearts to the Lord.” 
  • 2 Tim. 4:2 “Preach the word”
  • “Speaking to yourselves in psalms.”
  • This is the Word of God.
  • Speak to yourself what God says.
  • Don’t go by feelings.

  • “Let the Word of Christ dwell in you richly.”
  • Dwell in the Word.
  •  Become God-possessed by the Word.
  • “Preach the Word.”
  • People are sick of sermons.
  • Let us have the Word of God. 

This is a command. It is a law of the Spirit.

  • Put God’s Word in your heart.
  • Speak God’s Word.
  • Then you will become Godly. 

The Law of Confession

WE ARE TO SPEAK WORDS THAT MINISTER GRACE

  • Col. 4:6 “Let your speech be always with grace, seasoned with salt, that ye may know how ye ought to answer every man.” 
  • Pr. 8:6-7 “Hear; for I will speak of excellent things, and the opening of my lips shall be right.
  • For my mouth shall speak the truth. 
  • ” Ep. 4:29 “Let no corrupt communication proceed out of your mouth,
  • but that which is good to the use of edifying, that it may minister grace unto the hearers.” 
  • Pr. 15:26 “The words of the pure are pleasant words.” 
  • “Let your speech be with grace.”

  • Minister grace to those to whom you speak.
  • Minister life. Talk about life. 
  • Talk right.
  • Away with this “garbage” talk.
  • Away with this negative report.
  • “I will speak of excellent things.” 
  • Check your conversation.

  • Are you always speaking of excellent things?
  • Are you always saying the right things?
  • Or are you always bringing a negative report?
  • Some are so geared to judging and criticizing that no matter how good a person is, they will always seek to find the negative side.
  • Recognize this for what it is. It is a demon invasion into your life.
  • Away with it.
  • Your body belongs to the Holy Ghost, not evil spirit thoughts.
  • “Resist the devil, and he will flee from you.”
  • Begin to look for a good report.
  • Begin to speak the right things.

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