प्रकृति के साथ और ईश्वर के साथ एकता  (Unity with Nature and with God)

प्रकृति के साथ और ईश्वर के साथ एकता (Unity with Nature and with God)

पृथ्वी पर उद्धारकर्ता का जीवन प्रकृति और ईश्वर के साथ एकता का जीवन था। इस भोज में, उन्होंने हमारे लिए शक्ति के जीवन का रहस्य प्रकट किया। प्रकृति के साथ और ईश्वर के साथ एकता (Unity with Nature and with God)

यीशु एक गंभीर, निरंतर कार्यकर्ता था।

जिम्मेदारियों से इतना भारित पुरुषों के बीच पहले कोई कभी नहीं रहा। दुनिया के दुख और पाप का इतना भारी बोझ कभी किसी ने नहीं उठाया। पुरुषों की भलाई के लिए इस तरह के स्वार्थी उत्साह के साथ किसी और ने कभी मेहनत नहीं की। फिर भी उनका जीवन स्वस्थ्य था। शारीरिक और साथ ही आध्यात्मिक रूप से उनका प्रतिनिधित्व बलि के मेमने द्वारा किया गया था, “बिना दोष और दाग के।” “परन्तु मसीह के अनमोल लहू से, जैसे निर्दोष और निष्कलंक मेम्ने के समान”।1 पतरस 1:19. शरीर में रहते हुये आत्मा के रूप में, वह एक उदाहरण था जिसे परमेश्वर ने सारी मानवजाति को उसके नियमों का पालन करने के लिए बनाया था।

 जब लोगों ने यीशु की ओर देखा, तो उन्होंने एक ऐसा चेहरा देखा जिसमें दिव्य करुणा सचेतन शक्ति भी साथ-साथ मिश्रित थी।

वह आध्यात्मिक जीवन के वातावरण से घिरा हुआ प्रतीत होता था। जबकि उनके शिष्टाचार सौम्य और सरल थे, उन्होंने पुरुषों को उस शक्ति की भावना से प्रभावित किया जो छिपी हुई थी, फिर भी पूरी तरह उनको नहीं जाना जा सका। 

यीशु की सेवकाई के दौरान, धूर्त और पाखंडी लोगों द्वारा उसका लगातार पीछा किया जाता था जो उसके जीवन की खोज कर रहे थे। जासूस उसके मार्ग पर थे, उसके वचनों को देख रहे थे, ताकि उसके विरुद्ध कोई अवसर ढूंढ़ सकें। राष्ट्र के सबसे तेज और सबसे उच्च संस्कारी दिमागों ने उन्हें विवाद में हराने की कोशिश की। लेकिन उन्हें कभी फायदा नहीं हो सका।

उन्हें गलील के दीन शिक्षक द्वारा निराश और लज्जित होकर मैदान से सेवानिवृत्त होना पड़ा। मसीह की शिक्षा में एक ताजगी और एक शक्ति थी जैसे कि पुरुषों को पहले कभी नहीं पता थी। यहाँ तक कि उसके शत्रुओं को भी यह स्वीकार करने के लिए विवश किया गया, “मनुष्य ने कभी इस मनुष्य के समान नहीं कहा।” यहून्ना 7:46। 

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गरीबी में बीता यीशु का बचपन, एक भ्रष्ट युग की बनावटी आदतों से अबाधित हो गया था।

बढ़ई की बेंच पर काम करते हुए, गृह जीवन का बोझ उठाते हुए, आज्ञाकारिता और परिश्रम का पाठ सीखते हुए, उन्होंने प्रकृति के दृश्यों के बीच मनोरंजन पाया, ज्ञान इकट्ठा किया क्योंकि उन्होंने प्रकृति के रहस्यों को समझने की कोशिश की। उसने परमेश्वर के वचन का अध्ययन किया, और उसकी सबसे बड़ी खुशी के घंटे तब पाए गए जब वह अपने परिश्रम के दृश्य से हटकर पहाड़ तक पहुंच गया।

पहाड़ के किनारे या जंगल के पेड़ों के बीच। सुबह-सुबह उसे अक्सर किसी एकांत जगह पर, ध्यान करते हुए, शास्त्रों की खोज करते हुए, या प्रार्थना में पाया जाता था। गायन की आवाज से उन्होंने सुबह की रोशनी का स्वागत किया। धन्यवाद के गीतों के साथ, उन्होंने अपने श्रम के घंटों को खुश किया और स्वर्ग की खुशी को परिश्रमी और निराश लोगों के लिए आशा स्वरूप प्रस्तुत किया। 

अपनी सेवकाई के दौरान, यीशु काफी हद तक एक बाहरी जीवन जीते थे।

उसकी एक जगह से दूसरी जगह की यात्रा पैदल ही होती थी, और उसकी बहुत सी शिक्षाएँ खुली हवा में दी जाती थीं। अपने शिष्यों को प्रशिक्षण देने में वह अक्सर शहर की उलझनों से हटकर खेतों की खामोशी में, सादगी, विश्वास और आत्म-त्याग के पाठों के साथ सामंजस्य बिठा लेते थे, जिसे वह उन्हें आगे सिखाना चाहता था। यह पहाड़ के किनारे के पेड़ों के नीचे था, लेकिन गलील के सागर से थोड़ी दूरी पर, कि बारहों को धर्मत्यागी के पास बुलाया गया था, और पहाड़ पर उपदेश दिया गया था।  

मसीह को अपने बारे में लोगों को नीले आकाश के नीचे, किसी घास वाली पहाड़ी पर, या झील के किनारे समुद्र तट पर इकट्ठा करना पसंद था।

यहाँ, अपनी रचना के कार्यों से घिरे हुए, वे उनके विचारों को कृत्रिम से प्राकृतिक दृश्य में बदल सकते थे। प्रकृति की वृद्धि और विकास में उसके राज्य के सिद्धांत प्रकट हुए। जैसे कि, लोगों को अपनी आँखें परमेश्वर की पहाड़ियों की ओर उठानी चाहिए और उनके हाथ के अद्भुत कार्यों को देखना चाहिए, वे ईश्वरीय सत्य के अनमोल पाठ सीख सकते हैं। भविष्य के दिनों में प्रकृति की चीजों से उन्हें ईश्वरीय शिक्षक के पाठों को दोहराया जाएगा। मन का उत्थान होगा और हृदय को विश्राम मिलेगा।

 चेले जो उसके काम में उसके साथ जुड़े थे, यीशु को अक्सर एक समय के लिए रिहा कर दिया जाता था, ताकि वे अपने घरों में जाकर आराम कर सकें; परन्तु उन्हें उसके परिश्रम से दूर करने के उनके प्रयास व्यर्थ थे। पूरे दिन वह उन भीड़ की सेवा करता था जो उसके पास आते थे, और घटना के समय, या भोर में, वह अपने पिता के साथ संगति के लिए पहाड़ों के अभयारण्य में चला गया। 

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अक्सर उनके निरंतर श्रम और शत्रुता और रब्बियों की झूठी शिक्षा के साथ संघर्ष ने उन्हें इतना थका दिया कि उनकी माँ और भाइयों, और यहाँ तक कि उनके शिष्यों को भी डर था कि उनका जीवन बलिदान हो जाएगा।

लेकिन जैसे ही वह प्रार्थना के घंटों से लौटता था,फिर से और सामर्थी होकर सेवा करने लगता, ये सब ऐसा रहा हो मानो, जिसने कठिन दिन को बंद कर दिया, उन्होंने उसके चेहरे पर शांति, ताजगी और जीवन, और शक्ति को चिह्नित किया, जो प्रकृति और ईश्वर के साथ एकता में रह सके, जो उसके पूरे अस्तित्व में व्याप्त थी।

ईश्वर के साथ अकेले बिताए घंटों से, वह लोगों के लिए स्वर्ग का प्रकाश लाने के लिए, सुबह से अगली सुबह तक। 

यह उनके पहले मिशनरी दौरे से लौटने के ठीक बाद था कि यीशु ने अपने शिष्यों को कहा, अलग आओ, और थोड़ी देर आराम करो। जब हेरोदेस के हाथों यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले की मृत्यु की खबर उन तक पहुँची तो चेले सुसमाचार के प्रचारक के रूप में अपनी सफलता की खुशी से भरे हुए लौट आए थे।

यह एक कड़वा दुख और निराशा थी। यीशु जानता था कियूहन्ना बपतिस्मादाता को जेल में मरने के लिए छोड़ कर उसने चेलों के विश्वास की कड़ी परीक्षा ली थी। करुणामय कोमलता के साथ उसने उनके उदास, आंसू से सने चेहरों को देखा। उसकी आंखों और आवाज में आंसू थे क्योंकि उसने कहा, “तुम अपने आप को एक निर्जन स्थान में आओ, और थोड़ी देर आराम करो।” मरकुस 6:31। 

बेथसैदा के पास, गलील सागर के उत्तरी छोर पर, एक अकेला क्षेत्र था, जो वसंत के ताजे हरे रंग के साथ (हरियाली) सुंदर था, जो यीशु और उनके शिष्यों के लिए एक स्वागत योग्य वापसी की पेशकश करता था। इस स्थान के लिए वे झील के उस पार अपनी नाव पर सवार होकर निकल पड़े। यहाँ वे भीड़ के भ्रम के अलावा आराम कर सकते थे। यहाँ चेले मसीह के वचनों को सुन सकते थे, फरीसियों के प्रत्युत्तर और आरोपों से विचलित हुए बिना। यहाँ उन्होंने अपने प्रभु के समाज में संगति के एक छोटे से मौसम का आनंद लेने की आशा की। 

यीशु ने अपने प्रिय जनों के साथ अकेले कुछ ही समय बिताया, लेकिन वे चंद पल उनके लिए कितने कीमती थे।

उन्होंने सुसमाचार के कार्य और लोगों तक पहुँचने में अपने श्रम को अधिक प्रभावी बनाने की संभावना के बारे में एक साथ बात की। जैसे ही यीशु ने उनके लिए सत्य के खजाने खोले, वे दैवीय शक्ति से सक्रिय हो गए और आशा और साहस से प्रेरित हुए। 

लेकिन जल्द ही उसे फिर से भीड़ द्वारा खोजा गया। मान लीजिए- इसमें वह अपने सामान्य सेवानिवृत्ति के स्थान पर चला गया था, लोगों ने उसका पीछा किया। एक घंटे का भी आराम पाने की उनकी आशा में, विध्न, निराश पैदा थी। लेकिन अपने शुद्ध, दयालु हृदय की गहराई में भेड़ के अच्छे चरवाहे के पास इन बेचैन, प्यासी आत्माओं के लिए केवल प्रेम और दया उनमें भरी हुई थी। पूरे दिन वह उनकी जरूरतों को पूरा करता था, और शाम को उन्हें उनके घर जाने और आराम करने के लिए विदा करता था। 

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पूरी तरह से दूसरों की भलाई के लिए समर्पित जीवन में,

उद्धारकर्ता ने पाया कि अपने पिता के साथ सेवानिवृत्ति और अटूट संवाद की तलाश करने के लिए, निरंतर गतिविधि से अलग होना और मानवीय जरूरतों के साथ संपर्क करना आवश्यक है। जब भीड़ उसके पीछे चली गई थी, तो वह पहाड़ों में चला जाता है, और वहाँ, अकेले ईश्वर के साथ, इन दुखों, पापी, जरूरतमंद लोगों के लिए प्रार्थना में अपनी आत्मा को उंडेल देता है। 

जब यीशु ने अपने चेलों से कहा कि फसल बहुत है और मजदूर थोड़े हैं,

तो उसने उनसे निरंतर परिश्रम की आवश्यकता का आग्रह नहीं किया, लेकिन उनसे कहा, “इसलिये खेत के यहोवा से प्रार्थना करो, कि वह अपनी फसल काटने के लिये मजदूर भेजे। ” मत्ती 9:38. अपने पहले चेलों की तरह आज भी अपने परिश्रमी कार्यकर्ताओं के लिए वह करुणा के ये शब्द बोलते हैं, “तुम अलग हो जाओ, और थोड़ी देर आराम करो।” 

वे सभी जो परमेश्वर के प्रशिक्षण के अधीन हैं, उन्हें अपने हृदय, प्रकृति और परमेश्वर के साथ एकता के लिए शांत समय की आवश्यकता है। उनमें एक ऐसा जीवन प्रकट होना है जो संसार, उसके रीति-रिवाजों, या उसके व्यवहारों के अनुरूप नहीं है; और उन्हें परमेश्वर की इच्छा का ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक व्यक्तिगत अनुभव की आवश्यकता है।

हमें व्यक्तिगत रूप से उसे हृदय से बोलते हुए सुनना चाहिए।

जब हर दूसरी आवाज शांत हो जाती है, और शांति में, हम उसके सामने प्रतीक्षा करते हैं, आत्मा की चुप्पी ईश्वर की आवाज को और अधिक विशिष्ट बनाती है। वह हमसे कहता है, “शांत रहो, और जान लो कि मैं परमेश्वर हूं।” भजन 46:10। यह ईश्वर के लिए सभी श्रम के लिए प्रभावी तैयारी है।

जीवन की तीव्र गति और तीव्र गतिविधियों के बीच, जो इस प्रकार तरोताजा हो जाता है, वह प्रकाश और शांति के वातावरण से घिरा होगा। उसे शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की ताकत का एक नया बंदोबस्त प्राप्त होगा। उनके जीवन में एक सुगंध आएगी और एक दिव्य शक्ति प्रकट होगी जो लोगों के दिलों तक पहुंचेगी। 

90 Plus Quotes for Effective and Successful Daily Life

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UNITY WITH NATURE

परमेश्वर के राज्य के द्वारा प्रभुत्व। (Dominion through the kingdom of God) 

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परमेश्वर के राज्य के द्वारा प्रभुत्व। (Dominion through the kingdom of God) 

परमेश्वर के राज्य के द्वारा प्रभुत्व। (Dominion through the kingdom of God): रोम 10:17- सो तब विश्वास सुनने से और सुनना परमेश्वर के वचन से होता है। (So then faith cometh by hearing, and hearing by the word of God) Kingdom of God Bible study.

परमेश्वर के राज्य के द्वारा सारी दुनिया पर प्रभुत्व हांसील करना।

What is meant by the kingdom of God?

  • आदम सब कुछ अच्छा जानता था; उसने परमेश्वर की आत्मा के रहस्योद्घाटन ज्ञान में सब कुछ पाया। बगीचे में उस पेड़ को खाकर उसने जो कुछ हासिल किया, वह था विपत्ति का ज्ञान और अपने मुंह के शब्दों से मृत्यु को उत्पन्न किया है। 
  • शैतान, आदम को यह बताने में विफल रहा: “जिस दिन तुम आशीर्वाद और विपत्ति के वृक्ष का फल खाओगे, तुम न केवल अपने मुंह के शब्दों से विपत्ति उत्पन्न करने का ज्ञान प्राप्त करोगे, बल्कि तुम अपनी जीभ पर नियंत्रण खो दोगे! तुम’ एक दुष्ट शक्ति द्वारा शासित किया जाएगा!” 

जीभ दिल (हृदय) और मन को नियंत्रित करती है।  

  • हे मेरे भाइयो, बहुत से स्वामी न बनो, यह जानते हुए कि हम पर और भी बड़ी दण्ड की आज्ञा होगी। क्योंकि बहुत बातों में हम सब को ठोकर खिलाते हैं। यदि कोई मनुष्य वचन से ठेस न पहुँचाए, तो वही सिद्ध पुरुष है, और सारे शरीर पर लगाम लगाने में भी समर्थ है।। याकूब 3:1,2 
  • वचन में ठेस नहीं पहुँचाता यूनानी कहता है, “यदि वह अपने वचनों में ठोकर न खाए, तो वह सिद्ध मनुष्य है, और सारी देह पर लगाम लगाने में समर्थ है।” एम्प्लीफाइड बाइबल कहती है कि वह “अपने संपूर्ण स्वभाव पर अंकुश लगाने” में सक्षम होगा। 
  • देखो, हम घोड़ों के मुंह में लगाम लगाते हैं, कि वे हमारी बात मानें; और हम उनके पूरे शरीर को घुमाते हैं। 
  • उन जहाजों को भी देखो, जो यद्यपि इतने बड़े हैं, और प्रचण्ड वायु से चलाए जाते हैं, तौभी वे बहुत छोटे पतवार से इधर-उधर घुमाए जाते हैं, जैसा कि जहां कहीं राज्यपाल सूचिबद्ध करता है। याकूब 3:3, 

हृदय हमारा राज्यपाल है, लेकिन जीभ वह है जो राज्यपाल को प्रोग्राम करती है।

  • शब्द बेहद शक्तिशाली हैं क्योंकि आपकी जीभ आपके दिल को नियंत्रित करती है! याक़ूब कह रहा है कि घोड़े के मुंह में थोड़ा सा लगाम डालने से उसका पूरा शरीर घूम जाएगा। ‘थोड़ा सा’ जीभ पर दबाव डालता है।

आप जो शब्द कह रहे हैं वह आपको बदल देगा।

  • आर्थिक रूप से, आप आपदा के कगार पर हो सकते हैं। यदि आप अपने शब्दों को सीधा करेंगे—अपनी जीभ पर दबाव डालेंगे—तो आप अपना मार्ग बदल देंगे! दिल वही पैदा करता है जो आप उसमें रोपते हैं। 

आपकी जीभ आपके जहाज की पतवार है। 

  • यदि आपको यह पता नहीं है कि आप कहाँ जा रहे हैं, तो पतवार घुमाएँ। 

कोई भी मनुष्य जीभ को वश में नहीं कर सकता।  

  • जब आदम ने पाप किया, तो उसने परमेश्वर और मनुष्य के बीच वचन के उस संचार लिंक को तोड़ दिया। पुराने और नए नियम दोनों के अपने अध्ययन से, मुझे विश्वास हो गया है कि आदम का पतन सीधे उसकी जीभ से जुड़ा था। जब आदम ने वर्जित फल खाया, तो उसकी जीभ में जहर आ गया। 
  • फिर भी, जीभ एक छोटी सी सदस्य है, और बड़ी बातों पर घमण्ड करती है। देखो, माचिस की तीली , एक छोटी सी चीज़ है, पर सारे जंगल में आग लगा सकती है, और खुद भी आग में जलती है! 
  • जीभ आग है, अधर्म का जगत, और जीभ हमारे अंगों में ऐसी ही चीज़ है, जो कि  सारे शरीर को अशुद्ध करती है, और प्रकृति के मार्ग में आग लगा देती है; और उसे नर्क की आग में झोंक दिया जाता है। याकूब 3:5,6 

याकूब 3:8 कहता है कि जीभ एक अनियंत्रित बुराई है, और घातक विष से भरी हुई है।

  • परमेश्वर ने आग नहीं लगाई; शैतान ने किया! वह आदमी बगीचे में अपनी जीभ से जीवन के वृक्ष को टटोलने में सक्षम था, और वह आज भी ऐसा करने में सक्षम है। वचन कहता स्वस्थ जीभ जीवन का वृक्ष है, परन्तु टेढ़ी-मेढ़ी चाल चलने से आत्मा नष्ट हो जाती है(नीतिवचन 15:4)। 

Knowledge of the Kingdom of god in the bible

द एम्प्लीफाइड बाइबल जेम्स 3:6 को इस तरह बताती है: “जीभ जन्म के चक्र को आग लगाती है – मनुष्य के स्वभाव का चक्र।”

  • दूसरे शब्दों में, यदि आपको अपने माता-पिता से अच्छा स्वास्थ्य विरासत में मिला है, तो संभावना से अधिक आप स्वस्थ रहेंगें- जब तक आप अपनी जीभ पर नियंत्रण रखते! आपकी जीभ उस स्वभाव को बदल सकती है जो आपको विरासत में मिला है! 
  • आपके शरीर में उपचार शक्ति है; परमेश्वर ने मनुष्य को इस तरह बनाया। यदि आप की उंगली या जीभ कट जाती है, तो आपको पूरी रात प्रार्थना करने और परमेश्वर से उम्मीद करने की ज़रूरत नहीं है कि यह ठीक हो जाए। आप नहीं जानते कि यह कैसे करता है, लेकिन यह अपने आप ठीक हो जाएगा। 

वे सभी बर्तन एक साथ बुनेंगे और उपचार तब तक नहीं आएगा जब तक आप यह कहना बंद नहीं करते,

  • “मुझे विश्वास है कि यह संक्रमित हो रहा है! यह हर दिन बदतर दिख रहा है! बस देखो और देखो! मैं शायद डॉक्टर के पास जाऊँगा।” 
  • इस तरह बोलने से आप अपने शरीर में मौजूद उपचार शक्ति को रोक सकते हैं। उन शब्दों को अपने हृदय में बोलने से उपचार शक्ति बंद हो जाएगी। भीतर का आदमी एक आवेग भेजता है जो कहता है, “उपचार शक्ति बंद करो, उसे संक्रमण हो रहा है!”
  • यीशु ने कहा कि मनुष्य जो कुछ भी कहता और मानता है वह पूरा हो जाएगा यदि वह अपने दिल में संदेह नहीं करता है। आपका शरीर आपके शब्दों का पालन करने के लिए बनाया गया था, और वह यह जानता है कि इसे कैसे करना है।
  • यदि जीभ एक अनियंत्रित बुराई है, घातक जहर से भरी हुई है, नरक की आग में जल रही है, तो ऐसी जीभ में कौन स्वस्थ हो सकता है? कोई आदमी इसे वश में नहीं कर सकता! लेकिन शारीरिक या आर्थिक रूप से समृद्ध होने के लिए जीभ पर नियंत्रण रखना होगा। 

परमेश्वर की आत्मा और वचन ने जीभ को वश में किया। 

  •  मनुष्य ने अपनी स्वाभाविक क्षमता से पक्षियों, जानवरों और समुद्र की मछलियों को वश में कर लिया है; लेकिन प्राकृतिक क्षमता वाला कोई भी व्यक्ति जीभ को वश में नहीं कर सकता। यह अलौकिक क्षमता है, और परमेश्वर का वचन एक अलौकिक क्षमता है। 
  • जीभ को वश में करने के लिए परमेश्वर की आत्मा की आवश्यकता होती है। यह आपके भीतर के परमेश्वर को यह कहने के लिए ग्रहण कर लेता है, “मेरे परमेश्वर ने अपनी महिमा के धन के अनुसार मेरी ज़रूरत को पूरा किया है,” जब ऐसा लगता है कि आपकी ज़रूरत की आपूर्ति की जा रही सच्चाई से सबसे दूर की बात है! 
  • यह आपके भीतर ईश्वर की आत्मा को आपके कहने के लिए उठता है, “यीशु के नाम पर। यीशु के नाम पर। 

क्या आप जानते हैं कि परमेश्वर ने आपके वचनों पर शक्ति क्यों नहीं डाली? 

  • आप परमेश्वर की सामर्थ्य और अधिपथ्य पर संदेह कर रहे हैं” इससे तो आप एक गंभीर दुर्घटना का कारण बन सकते हैं। 
  • यही कारण है कि हमें अपने विश्वास को रचनात्मक रूप से विकसित करना चाहिए। हमें अपने शब्दों का रचनात्मक उपयोग करना सीखना चाहिए। अपनी जीभ को नियंत्रित करने के लिए यह हमारे भीतर ईश्वर की सामर्थ्य और परिपूर्णता को ले कर आता है। 

बेकार के शब्द ना बोलें।

  • ‘या तो पेड़ को अच्छा और उसके फल को अच्छा करो; या पेड़ को भ्रष्ट कर, और उसके फल को भ्रष्ट कर; क्योंकि वृक्ष अपने फल से पहचाना जाता है।
  • हे सांपों की पीढ़ी, तुम बुरे होकर भला बातें कैसे कह सकते हो? क्‍योंकि मन की बहुतायत में से मुंह बोलता है’। मत्ती 12:33,34 
  • यीशु उन लोगों को सम्बोधित कर रहा था जो उसके विरुद्ध बोल रहे थे। जब आप इन आयतों का संदर्भ में अध्ययन करते हैं, तो आप पाएंगे कि वह उन्हें बता रहा है कि उन्हें पृथ्वी पर या आने वाले संसार में नहीं छोड़ा जाएगा। 
  • कुछ लोगों ने इस मार्ग को संदर्भ से बाहर कर दिया है और इसका गलत अर्थ निकाला है, यह सोचकर कि यीशु ने कहा था कि ये लोग हमेशा के लिए नरक के लिए श्रापित थे। वह ऐसा नहीं कह रहा था। 

निष्क्रिय शब्द पवित्र आत्मा की निन्दा है। 

  • यीशु ने अभी-अभी लोगों को यह बताना समाप्त किया था कि वह सभी प्रकार की निन्दा को क्षमा करेगा सिवाय इसके कि जो पवित्र आत्मा के विरुद्ध बोला गया हो। जो कोई पवित्र आत्मा के विरुद्ध बोलता है (मत्ती 12:32) वह पवित्र आत्मा की निन्दा करता है।
  • इस शास्त्र में, यीशु कह रहे हैं: यदि आप परमेश्वर के वचन के विरुद्ध बोलते हैं, जो कि पवित्र आत्मा द्वारा रचित है, तो आप पवित्र आत्मा के विरुद्ध निन्दा कर रहे हैं (बोल रहे हैं) और आपको उसके लिए छूट नहीं दी जाएगी; आपने जो कहा उसका परिणाम आपको मिलेगा, क्योंकि आप परमेश्वर को बुरा कह रहे हो।  और इस पाप सजा मृत्यु है।

1 यूहन्ना 5:16 

यदि कोई अपके भाई को ऐसा पाप करते हुए देखे, जो अनन्त काल तक नहीं है, तो वह मांगे, और वह उनके लिथे उसे जीवन दे, कि पाप मृत्युपर्यंत न हो। मृत्यु पर्यंत पाप है: मैं यह नहीं कहता कि वह इसके लिए प्रार्थना करेगा।

  • इब्रानियों 6:4-6 क्योंकि यह उनके लिए असम्भव है जो एक बार प्रबुद्ध थे, और जिन्होंने स्वर्गीय उपहार का स्वाद चखा है, और पवित्र आत्मा के भागी बन गए थे, और परमेश्वर के भले वचन का, और आने वाले जगत की शक्तियों का स्वाद चखा है, यदि वे भटक कर मन फिराव के लिये फिर से नया करने के लिथे गिर जाएं; यह देखकर कि वे अपने लिये परमेश्वर के पुत्र को नये सिरे से क्रूस पर चढ़ाते हैं, और उसे लज्जित करते हैं।
  • इब्र 10:26 क्‍योंकि यदि हम ने जान बूझकर पाप किया है, तो हमें सच्चाई का ज्ञान हो गया है, पापों के लिए फिर कोई बलिदान नहीं है,
  • इब्र 10:27, परन्‍तु एक भययोग्य न्याय की बाट जोहता है, और जलजलाहट करता है, जो विरोधियों को भस्म कर डालेगा।
  • इब्र 10:28  जो मूसा की व्यवस्था को तुच्छ जानता था, वह दो या तीन गवाहों के अधीन दया के बिना मर गया:
  • इब्र 10:29 जिस ने परमेश्वर के पुत्र को पांवों से रौंदा, और उस वाचा के लोहू को, जिसके द्वारा वह पवित्र किया गया था, एक अपवित्र काम गिना गया, कितना अधिक बड़ा दण्ड के योग्य समझा जाएगा, और किया अनुग्रह की आत्मा के बावजूद?

 मत्ती 12:32

  • और जो कोई मनुष्य के पुत्र के विरुद्ध कुछ कहे, वह क्षमा की जाएगी; परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरुद्ध कुछ कहे, वह न तो इस संसार में, और न आने वाले जगत में क्षमा की जाएगी।
  • इस तरह का पाप और दोषारोपण, हर ईसाई ने इसे कभी न कभी किया है। लेकिन अगर आप लगातार परमेश्वर के वचन का खंडन करते हैं, तो आप खतरनाक क्षेत्र में चल रहे हैं। 
  • मत्ती 5:22 परन्तु मैं तुम से कहता हूं, कि जो कोई अपके भाई पर अकारण क्रोध करे, उस पर न्याय का संकट पड़ेगा; और जो कोई अपने भाई से कहे, दुष्ट, उस पर महासभा का खतरा होगा, परन्तु जो कोई कहे हे मूर्ख, नरक की आग के खतरे में होगा।
  • परंपरागत रूप से, हमने सोचा है कि यह कविता उस अक्षम्य पाप को संदर्भित करती है जिसमें आपकी आत्मा को नरक में डाल दिया जाता है। परन्तु बाद में यीशु ने आप ही कहा, हे मूर्खों, और मन से टेढ़े लोगो।  (लूका 24:25)।
  • तो उस शास्त्र की अधिकांश व्याख्याओं के द्वारा, यीशु नरक की ओर जा रहे थे। नहीं, मत्ती 5:22 में यीशु जो कह रहा था, वह यह था कि जो पवित्र आत्मा ने लिखा है, उसके विरुद्ध बोलने के लिए तुम्हें छूटने नहीं दिया जाएगा। 

यीशु का लहू हमारी क्षमा के लिए बहाया गया।

  • सभी प्रकार का पाप और निन्दा मनुष्यों को क्षमा की जाएगी (मत्ती 12:31), जिसमें यीशु के विरुद्ध निन्दा भी सम्मिलित है। 
  • मत्ती 12:32 में यीशु ने जो कहा उसके अनुसार, जो कोई मनुष्य के पुत्र के विरुद्ध कुछ कहे, उसका पाप क्षमा किया जाएगा। पद 31 में वह कहता है: परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा मनुष्यों की क्षमा न की जाएगी। यीशु ने पवित्र आत्मा के विरुद्ध ईशनिंदा—पाप नहीं करने के लिए चेतावनी दी। 
  • फरीसी यीशु के विरुद्ध बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि यीशु के पास एक शैतान था और उसने दुष्टात्माओं के राजकुमार द्वारा दुष्टात्माओं को निकाला। (मत्ती 9:34.) फरीसी पवित्र आत्मा के विरुद्ध पाप करने के दोषी नहीं हो सकते थे; वे यह भी नहीं जानते थे कि पवित्र आत्मा मौजूद है। इसके लिए दोषी होने के लिए, उन्हें पहले पवित्र आत्मा को जानना होगा। 

फरिसी, परमेश्वर के वचन के विपरीत बोल रहे थे।

  • यीशु ने कहा, “तुम्हें इसके लिए छूट नहीं दी जाएगी।” फरीसियों को उन चमत्कारों में से कोई भी प्राप्त नहीं हुआ, जो दूसरों ने प्राप्त किया क्योंकि वे उन पर विश्वास नहीं करते थे। उन्होंने जो कहा, उसके कारण उन्हें कोई चंगाई या छुटकारा नहीं मिला। 
  • यीशु बस इतना कह रहे हैं कि पवित्र आत्मा ने जो लिखा है उसके विपरीत बोलना इस पृथ्वी पर आपको क्षमा नहीं किया जाएगा। यीशु, मरकुस 11:23 में इसकी पुष्टि करते हैं, जो कोई कहे और अपने मन में सन्देह न करेगा, वरन जो बातें वह कहता है, उन की प्रतीति करे; वह जो कुछ भी कहेगा, वह सब उसके पास होगा। 

दूसरे शब्दों में, आप जो कहते हैं उसका परिणाम आपको मिलेगा। 

  • राज्य के संचालन के बारे में शैतान ने लोगों के दिमाग को अंधा कर दिया है, लेकिन अज्ञानता आपको पृथ्वी या स्वर्ग पर माफ नहीं करेगी। आपने जो कुछ कहा है, उसका परिणाम आपको भुगतना पड़ेगा, क्योंकि आप उन चीजों को खो देंगे जो आपके पास पृथ्वी पर हो सकती थीं और परिणामस्वरूप, स्वर्ग में पुरस्कार खो देंगे।

आखिरकार, आपके पास वही होगा जो आप कहते हैं, चाहे वह सही हो या गलत। 

  • आप इसे महसूस करें या न करें, आप राज्य के एक ईश्वरीय सिद्धांत का संचालन कर रहे हैं। शब्द आत्मिक संसार में बीज हैं, और वे बोले जाने वाली बातों को पूरा करेंगे। 
  • अच्छा मनुष्य मन के भले भण्डार (जमा) से अच्छी बातें निकालता है, और दुष्ट मनुष्य बुरे भण्डार से बुरी बातें निकालता है (मत्ती 12:35)।
  • जब यीशु ने दुष्ट मनुष्य शब्द का प्रयोग किया, तो वह अनिवार्य रूप से एक दुष्ट व्यक्ति के बारे में बात नहीं कर रहा था। वह एक ऐसे व्यक्ति की बात कर रहे थे जो बुरी नजर से अपने पूरे शरीर को अंधकार से भर देता है। आप नकारात्मक बातें बोलकर ऐसा कर सकते हैं। (मत्ती 6:23.) 

एक बुराई की रिपोर्ट  का उदाहरण

  • गिनती की किताब में, हम एक उदाहरण पाते हैं जिसे परमेश्वर ने एक दुष्ट रिपोर्ट कहा। वे दस भेदिए, जिन्हें कनान देश का भेद लेने के लिथे भेजा गया था, यह समाचार लेकर वापस आए:
  • “हम उस देश को नहीं ले सकते। वहां दैत्य हैं।” (गिन. 13:27- 33.) परमेश्वर ने जो कुछ कहा एक बुरी रिपोर्ट कहा। 

परमेश्वर की दृष्टि में परमेश्वर के वचन, या वाचा के विपरीत कही गई कोई भी बात एक बुरी रिपोर्ट है। 

  • दस जासूसों ने बताया कि उन्होंने क्या देखा, महसूस किया और सुना। उनकी रिपोर्ट बुराई थी क्योंकि यह इंद्रिय क्षेत्र पर आधारित थी। 
  • कई चर्च के सदस्य विश्वास के अंगीकार के सिद्धांतों को नहीं समझते हैं। वे कहते हैं, “मैं सच कह रहा हूँ जब मैं ऐसा कहता हूँ: मैं बीमारी ले रहा हूँ; मैं अपने बिलों का भुगतान नहीं कर सकता; मैं बाइबल को नहीं समझ सकता; मेरे पास कभी कुछ नहीं होगा।” 
  • लेकिन इस तरह का कोई भी बयान एक बुरी रिपोर्ट है क्योंकि यह परमेश्वर के कहे वचन के विपरीत है। उसने कहा कि तुम व्यवस्था के श्राप से छुड़ाए गए हो, और इब्राहीम की आशीष तुम्हारी है। 

आप, बहुतायत की आशीषों के वारिस होने को बुलाये गये हो। 

  • ईश्वर किसी भी रिपोर्ट को बुरा मानता है जो उससे असहमत है। 
  • यीशु कहते हैं, मैं तुम से कहता हूं, कि जो निकम्मी बातें मनुष्य कहें, वे न्याय के दिन उसका लेखा दें (मत्ती 12:36)। निष्क्रिय का अर्थ है “गैर-काम करने वाला।” एक बेकार शब्द आपके द्वारा बोला गया कोई भी शब्द है, जो आपके काम है। 
  • बेकार के शब्द आमतौर पर परमेश्वर के वचन का खंडन करते हैं या शैतान को जगह देते हैं। यदि आप इस तरह के बयान देते हैं, “मैंने प्रार्थना की है, लेकिन यह काम नहीं कर रहा है,” या “हम कभी भी कर्ज से बाहर नहीं निकलेंगे!” आपको इस दुनिया में या आने वाले दुनिया में नहीं छोड़ा जाएगा क्योंकि आप शास्त्रों के विपरीत शब्द बोल रहे हैं। भजन संहिता 1:3 में वचन कहता है, जो कुछ वह करेगा वह सफल होगा। 
  • जब हम स्वर्ग में पहुंचेंगे, तो ऐसे लोग होंगे जिन्होंने पुरस्कार खो दिया है, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के वचन को उन चीजों को प्राप्त करने के लिए नहीं माना जो परमेश्वर ने उन्हें इस जीवन में प्रदान की थी। वे कहेंगे, “प्रभु, मेरे पास उस मिशनरी को देने के लिए पैसे नहीं थे क्योंकि मैं कभी नौकरी नहीं कर सकता था। मैंने जो भी किया, मैंने हमेशा अपनी नौकरी खो दी। मेरे पास देने के लिए कभी भी पर्याप्त नहीं था।” 

यीशु कहेगा, “जब तुम पृथ्वी पर थे, तब तुम्हारी यही समस्या थी। जो वचन तुम कह रहे हो वही तुम्हारे विरुद्ध गवाही देंगे।” 

  • आप हिसाब देंगे और उन शब्दों को कहने का इनाम खो देंगे जो परमेश्वर के वचन नहीं थे! 
  • वह कहेगा, “तुम इस तरह की बातें कह सकते थे: जो कुछ मैं करता हूं वह समृद्ध होगा। मेरे खिलाफ कोई हथियार समृद्ध नहीं होगा। मैं अंधेरे की शक्तियों से मुक्त हो गया हूं। मैंने दुनिया, मांस और शैतान को जीत लिया है, क्योंकि बड़ा मुझ में वास करता है, मेरा परमेश्वर अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु के द्वारा मेरी आवश्यकता को पूरा करता है।” 
  • “परन्तु, हे प्रभु, ऐसा नहीं लग रहा था कि यह सच था।” 
  • “ओह, तो तुम दृष्टि से चले और विश्वास से नहीं।” 
  • जब कई लोग होगें, जिन की आंखों से सभी आंसू पोंछने जा रहा है, देखें कि उनके पास क्या हो सकता था, और उन्हें क्या मिलेगा, वे रोएंगे! परमेश्वर आंसू पोंछ देंगे और जो कुछ आपने याद किया है उस ज्ञान का क्या, लेकिन न्याय के दिन आप अपने द्वारा बोले गए हर बेकार शब्द का लेखा देंगे। 
  • मत्ती 12:35 अच्छा मनुष्य मन के भले भण्डार से अच्छी बातें निकालता है, और बुरा मनुष्य बुरे भण्डार में से बुरी बातें निकालता है।

मत्ती 12:36 परन्तु मैं तुम से कहता हूं, कि जो निकम्मी बातें मनुष्य कहें, वे न्याय के दिन उसका लेखा दें।

  • जब तक आप राज्य की भाषा नहीं सीखते तब तक आपके मुंह पर एक पैबंध रखना सीखिये। मौन की शब्दावली से कई लड़ाइयाँ जीत सकते हैं। 
  • मैं ऐसी स्थितियों में रहा हूँ जिसमें मैं कुछ भी अच्छा नहीं कह सकता था, इसलिए मैंने बस अपने दाँत पीस लिए और कुछ नहीं कहा . तुम सब अकर्मण्य वचनों का लेखा दोगे। हर एक वचन को इस रीति से बोलना सीखो जो तुम्हारे काम आए। 
  • मत्ती 12:37 क्‍योंकि तू अपने वचनों से धर्मी ठहरेगा, और अपने  वचनों से तू दोषी ठहरेगा।
  • आप जिस प्रकार के शब्दों को बोलने का निर्णय लेते हैं, उसके आधार पर न्यायोचित या निंदा की जाएगी। बोलने से बीज बोया जाता है। 
  • याद रखें, विश्वास का कानून भी काम करता है उलटे हुए।बोला गया प्रत्येक बेकार शब्द आपके विरुद्ध है, या कि आपके लिए नहीं। 

धार्मिकता की व्यवस्था 

  • रोम 10:5 क्योंकि मूसा उस धार्मिकता का वर्णन करता है जो व्यवस्था की है, कि जो मनुष्य उन कामों को करता है वह उनके द्वारा जीवित रहेगा।
  • रोम 10:6 परन्‍तु जो धर्म विश्‍वास से होता है, वह इसी से बोलता है, अपके मन में न कह, कि स्‍वर्ग पर कौन चढ़ेगा? (अर्थात मसीह को ऊपर से नीचे लाने के लिए 🙂
  • रोम 10:7 या, गहिरे में कौन उतरेगा? (अर्थात्, मसीह को मृतकों में से फिर से जीवित करना।)
  • रोम 10:8  लेकिन यह क्या कहता है? वचन तेरे निकट है, यहां तक ​​कि तेरे मुंह में, और तेरे हृदय में: अर्थात्, विश्वास का वचन, जिसका हम प्रचार करते हैं;
  • रोम 10:9 कि यदि तू अपने मुंह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करे, और अपने मन से विश्वास करे, कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू उद्धार पाएगा।
  • रोम 10:10 क्‍योंकि धर्म पर मन से विश्‍वास करता है; और मुंह से उद्धार के लिथे अंगीकार किया जाता है।
  • रोम 10:11 क्योंकि पवित्रशास्त्र कहता है, कि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह लज्जित न होगा।
  • रोम 10:12 क्‍योंकि यहूदी और यूनानी में कोई भेद नहीं; क्‍योंकि एक ही प्रभु सब पर अपना धनी है, जो उसे पुकारता है।
  • रोम 10:13 क्‍योंकि जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा।

कुछ लोग कहते हैं, “मेरा मानना ​​है कि अगर मैं अच्छी बातें कहूं तो मैं जो कह सकता हूं वह हो सकता है।

  • निश्चय ही परमेश्वर मरकुस 11:23 को उल्टा काम नहीं करने देगा!” 
  • इसका सिद्धांत आपको बताता है कि यह आपकी कार के आगे और पीछे के गियर की तरह ही किसी भी तरह से काम करेगा। 
  • जब आप कार को उल्टा करते हैं, तो कार पीछे की ओर जाती है। यदि आप आगे बढ़ना चाहते थे, तो आपको पता चल जाएगा कि आपने ऐसा क्यों नहीं किया जब आप देखेंगे कि संकेतक “रिवर्स” की ओर इशारा कर रहा है। 
  • जब हम आगे बढ़ना चाहते हैं तो हम जानबूझकर एक कार को रिवर्स में नहीं रखेंगे, फिर भी बहुत से लोग इसी तरह विश्वास सिद्धांत को संचालित करते हैं।
  • वे समस्या के बारे में प्रार्थना करते हैं, समस्या के बारे में बात करते हैं, और इसे दिन और रात से पहले रखते हैं, यहां तक ​​कि आधी रात को भी इसके बारे में सोचते हुए जागते हैं। फिर उन्हें आश्चर्य होता है कि वे कभी भी समस्या का समाधान क्यों नहीं खोज पाते। वे सिद्धांत को उल्टा करके आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं! 

मूर्खतापूर्ण बातें आत्मा को भ्रमित करती हैं

  • अपने मन को पूरी लगन से बनाए रखना; क्योंकि इसमें से जीवन के मुद्दे हैं। अपने मुंह को बुराई से दूर कर, और टेढ़े-मेढ़े होंठ तुझ से दूर कर। नीतिवचन 4:23,24 
  • विकृत होठों का अर्थ है “जानबूझकर और विपरीत भाषण।” परमेश्वर के वचन के विपरीत भाषण में विकृत होंठ, जैसे: “मैं कुछ भी करूँ, अब कुछ भी काम नहीं करता है!” यह बात परमेश्वर के वचन के विपरीत है; यह एक बुरी रिपोर्ट है। 
  • परमेश्वर उस व्यक्ति के बारे में कहता है जो परमेश्वर के वचन से प्रसन्न होता है: वह जो कुछ भी करेगा वह समृद्ध होगा, और जो कुछ वह कहता है उसके पास होगा। (भज. 1:3; मरकुस 11:23,24।) हमारे पास परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ और क्षमताएँ हैं। हम इन क्षमताओं का उपयोग उसके वचन को पूरा करने के लिए हैं, हम कर सकते हैं। 

जब आप मजाक करें, तो सावधान रहें! 

  • जो आप अपने दिल में डालते हैं, उससे सावधान रहें। मजाक में कही गई बातें भी आपके रूह में आ जाएंगी। 
  • बहुत से लोग सच के विपरीत बोलकर अपने भीतर के आदमी को भ्रमित कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, कोई कह सकता है, “यार, क्या आज कितनी ठंड है? या कि गर्मी नहीं है!” जब कि इसके उलटे हो रहा हो।
  • मनुष्य की आत्मा में भ्रम के कारण आपका विश्वास कम प्रभावी होगा। आप जो बोल रहे हैं और जो विश्वास कर रहे हैं, उसके बीच निरंतरता होनी चाहिए।
  • गाली देने से, भोंकने से बचें।  “क्या वह बड़ा कुत्ता नहीं है!” जब यह एक छोटा कुत्ता है, इतने अभद्र शब्दों से बचें, इन जैसे बयान देने का विरोध करें। ।
  • ये कथन दिल को भ्रमित कर सकते हैं और अंततः आपके विश्वास को पंगु बना सकते हैं। यह कहना कि बाहर गर्मी है जब वास्तव में ठंड होती है, एक छोटे कुत्ते को बड़ा कहना, यह कहना कि आपके लिए कुछ भी काम नहीं करता है – सभी विकृत होंठों के साथ बोलने के उदाहरण हैं।

अपनी शब्दावली पर नियंत्रण रखें।  

  • लोग जो छोटी-छोटी बातें कहते हैं और करते हैं, वे उन्हें परेशानी में डाल देती हैं। वे गलत किस्म का बीज दिखाकर अपने विश्वास में बाधा डाल रहे हैं। 

परमेश्वर का वचन आपके लिए उसकी इच्छा है।

  • आपका वचन परमेश्वर के प्रति आपकी इच्छा होना चाहिए। अपने मुंह से कभी भी ऐसा कुछ न बोलें जो आपकी मर्जी न हो। आप जो चाहते हैं उसे बोलने के लिए डिज़ाइन किया गया था। 
  • अधिकांश लोगों को उनकी बातों पर विश्वास नहीं होता है। अपनी शब्दावली को नियंत्रित करने के लिए आपको खुद को विकसित करना होगा। यदि तुम नित्य हर प्रकार की मूर्खता की बातें करते रहो और विकृत बातें करते रहो, तो तुम्हें अपनी बातों पर विश्वास नहीं होगा! 
  • जब आपके लिए विश्वास का एक शब्द बोलने का समय आएगा, तो कुछ नहीं होगा।

जो तुम विश्वास करते हो, उसे बार बार कहो, कहो केवल वो पूरा होगा, विकसित करें

  • अपने शब्दों पर परिश्रम करना, विश्वास के नियम को गति प्रदान करता है। यदि तुम में से कोई धार्मिक प्रतीत होता है, और अपनी जीभ पर लगाम नहीं लगाता है, लेकिन अपने ही दिल को धोखा देता है, तो इस आदमी का धर्म व्यर्थ है।  याकूब 1:26 
  • यदि तुम अपनी जीभ पर लगाम नहीं लगाओगे, तो यह तुम्हारे हृदय को धोखा देगा कि तुम विश्वास करो कि जो तुम कहते हो, वास्तव में अनजाने ही वही तुम चाहते हो। एक बार जब आप विश्वास करने में अत्यधिक विकसित हो जाते हैं कि आप क्या कहते हैं, और आप मजाक में कुछ कहते हैं, तो आपकी आत्मा एक ऐसा रास्ता खोजेगी, जिसके कारण आपने जो कहा था वह हो जाएगा – भले ही आप नहीं चाहते थे कि वह ऐसा होना चाहिए। 
  • यदि आप हमेशा कहते हैं, “हम निश्चित रूप से दिवालिया होने जा रहे हैं!” आपकी आत्मा परमेश्वर के ज्ञान की खोज करेगी ताकि उसे पूरा करने का रास्ता खोजे। आपका दिल (आत्मा) आपके शब्दों को अंतिम अधिकार के रूप में लेता है। आपके शब्द आपके दिल को यह विश्वास करने के लिए धोखा देंगे, कि दिवालियापन वही है जो आपने आदेश दिया था। बीज बोया गया है। 

याद रखने योग्य बातें।  

  • जब आप शब्द बोलते हैं—चाहे अच्छे हों या बुरे—आप परमेश्वर के राज्य के एक ईश्वरीय सिद्धांत का संचालन कर रहे हैं। 
  • शब्द आत्मिक संसार में बीज हैं, और वे बोले जाने वाली बातों को पूरा करेंगे। 
  • शब्द शक्तिशाली हैं क्योंकि आपकी जीभ आपके दिल को नियंत्रित करती है। किसी भी क्षेत्र में समृद्ध होने के लिए, आपको जीभ पर नियंत्रण का अभ्यास करना चाहिए। 
  • परमेश्वर का वचन में अलौकिक क्षमता है! 
  • परमेश्वर के वचन के विरुद्ध बोलना पवित्र आत्मा के विरुद्ध बोलना है! परमेश्वर किसी भी ऐसे कथन को जो एक बुरी रिपोर्ट है,परमेश्वर असहमत रहते हैं, और जो उसके वचन के अनुसार सही, उचित है, उसे वे मानते हैं, पूरा करते हैं। 
  • निष्क्रिय शब्द आमतौर पर परमेश्वर के वचन का खंडन करते हैं। 
  • आप जो बेकार शब्द बोलते हैं, उसका हिसाब आप देंगे। 
  • कभी भी ऐसा कुछ न बोलें जो आपकी मर्जी न हो।
  • आप जो शब्द बोलते हैं उस पर परिश्रम करें। मौन की शब्दावली सीखें!

https://youtu.be/DMo7G2bMfjU

परमेश्वर की स्थापित वाचा और स्थापित हृदय (The Established Covenant And The Established Heart)

https://youtu.be/77AX–jpoO8

https://www.biblegateway.com/passage/?search=Colossians+1%3A13&version=ESV

https://www.biblegateway.com/passage/?search=Matthew+3%3A2&version=ESV

Book Summary Of Healing Your Emotional Self

Book Summary Of Healing Your Emotional Self

Book Summary Of Healing Your Emotional Self. Our Parents as Mirrors. Perfectionism is self-abuse of the highest order. —ANN WILSON SCHARF.  I avoid looking in the mirror as much as I possibly can. When I do look, all I see are my imperfections—my long nose, my crooked teeth, my small breasts. Other people tell me I’m attractive, but I just don’t see it. —Kristin, age twenty-six 

Healing your emotional self summary

I’m what you would call a perfectionist, especially when it comes to my work. It takes me twice as long as it does other people to get something done because I have to go over it a dozen times to make sure I haven’t made any mistakes. My boss complains about my being so slow, but I’d rather have him complain about that than have him find a mistake. That would devastate me. —Elliot, age thirty-one 

There’s a voice inside my head that constantly chastises me with “Why did you do that?” “Why did you say that?” The criticism is relentless. Nothing I ever do is right. I’m never good enough. Sometimes I just feel like screaming—Shut up! Leave me alone! —Teresa, age forty-three 

I don’t know what it will take for me to finally feel good about myself. I keep thinking I need to do more, achieve more, be a better person, and then I’ll like myself. Other people are impressed with how much I’ve achieved in my life, but it doesn’t seem to matter how much I do; I’m never good enough for myself. —Charles, age fifty-five 

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DO YOU RELATE TO ANY of these people? 

  • Do you have a difficult time looking in the mirror because you never like what you see? 
  • Do you find that you are never pleased with yourself, no matter how much effort you put into making yourself a better person, no matter how much work you do on your body? 
  • Do you constantly find fault in yourself? 

Are you a perfectionist? 

  • Are you plagued by an inner critic who constantly berates you or finds something wrong with everything you do? Or are you like Charles, who believes that the way to feel good about yourself is through your accomplishments—yet no matter how much you accomplish it is never enough? 
  • Many of us focus a great deal of time and attention on improving our bodies and making ourselves more attractive.
  • Yet, despite all the time and money spent on dieting, exercise, clothes, and cosmetic surgery, many still do not like who they see in the mirror. 
  • There is always something that needs to be changed or improved. People who are critical of how they look are usually critical of other aspects of themselves as well. 
  • They tend to focus on their flaws rather than their assets, and they are seldom pleased with their performance—whether at work, at school, or in a relationship. 
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They chastise themselves mercilessly when they make a mistake. 

  • There is nothing wrong with wanting to improve yourself; everyone suffers from time to time from self-critical thoughts. But some people have such low self-esteem that they are never satisfied with their achievements, their physical appearance, or their performance. 
  • They have a relentless inner critic who constantly tears them down and robs them of any satisfaction they might temporarily feel when they have reached a goal. 

The following questionnaire will help you determine whether you are suffering from low self-esteem and an unhealthy inner critic. 

  • 1. Do you suffer from insecurity or a lack of confidence? 
  • 2. Do you focus more on what you do wrong or what you fail at than what you do right or well? 
  • 3. Do you feel less than or not as good as other people because you are not perfect in what you do or how you look? 
  • 4. Do you believe you need to do more, be more, or give more in order to earn the respect and love of other people? 
  • 5. Are you aware of having a critical inner voice that frequently tells you that you did something wrong? 
  • 6. Are you constantly critical of your performance—at work, at school, or in sports? 
  • 7. Are you critical of the way you interact with others? For example, do you frequently kick yourself for saying the wrong thing or for behaving in certain ways around others? 
  • 8. Do you feel like a failure—in life, in your career, in your relationships? 
  • 9. Are you a perfectionist? 
  • 10. Do you feel like you do not deserve good things? Do you become anxious when you are successful or happy? 
  • 11. Are you afraid that if people knew the real you, they wouldn’t like you? Are you afraid people will find out you are a fraud? 
  • 12. Are you frequently overwhelmed with shame and embarrassment because you feel exposed, made fun of, or ridiculed? 
  • 13. Do you constantly compare yourself to others and come up short? 
  • 14. Do you avoid looking in the mirror as much as possible, or do you tend to look in the mirror a lot to make sure you look okay? 
  • 15. Are you usually critical of what you see when you look in the mirror? Are you seldom, if ever, satisfied with the way you look? 
  • 16. Are you self-conscious or embarrassed about the way you look? 
  • 17. Do you have an eating disorder—compulsive overeating, bingeing and purging, frequent dieting or starvation, or anorexia? 
  • 18. Do you need to drink alcohol or take other substances to feel comfortable or less self-conscious in social situations? 
  • 19. Do you fail to take very good care of yourself through poor diet, not enough sleep, or too little or too much exercise? 
  • 20. Do you tend to be self-destructive by smoking, abusing alcohol or drugs, or speeding? 
  • 21. Have you ever deliberately hurt yourself, that is, cut yourself? 
  • If you answered yes to more than five of these questions, you need the special help this book provides to raise your self-esteem, quiet your inner critic, heal your shame, and begin to find real joy and satisfaction in your achievements and accomplishments.
  • Even if you only answered yes to one of these questions, this book can help you because it isn’t natural or healthy to experience any of those feelings. 
  • You were born with an inherent sense of goodness, strength, and wisdom that you should be able to call upon in moments of self-doubt. Unfortunately, you may have lost touch with this inner sense because of the way you were raised and the messages you received to the contrary. 
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Self-Esteem

  •  Defined Let’s start by defining self-esteem and differentiating it from self-image and self-concept. Self-esteem is how you feel about yourself as a person—your overall judgment of yourself. 
  • Your self-esteem may be high or low, depending on how much you like or approve of yourself. If you have high self-esteem, you have an appreciation of the full extent of your personality. 
  • This means that you accept yourself for who you are, with both your good qualities and your so-called bad ones. It can be assumed that you have self-respect, self-love, and feelings of self-worth. You don’t need to impress others because you already know you have value. 

If you are unsure whether you have high self-esteem, ask yourself: 

  • “Do I believe that I am lovable?”
  •  “Do I believe I am worthwhile?”
  •  Our feelings of self-worth form the core of our personality. Nothing is as important to our psychological well-being. 

The level of our self-esteem affects virtually every aspect of our lives. 

  • It affects how we perceive ourselves and how others perceive us, and how they subsequently treat us. 
  • It affects our choices in life, from our careers to whom we befriend or get involved romantically. 
  • It influences how we get along with others and how productive we are, as well as how much use we make of our aptitudes and abilities. 
  • It affects our ability to take action when things need to be changed and our ability to be creative. 
  • It affects our stability, and it even affects whether we tend to be followers or leaders.
  • It only stands to reason that the level of our self-esteem, and the way we feel about ourselves in general, would also affect our ability to form intimate relationships. 

Many people use the words self-esteem and self-concept interchangeably, but these terms have different meanings. 

  • Our self-concept, or self-image, is the set of beliefs or images we have about ourselves. 
  • Our self-esteem is the measure of how much we like and approve of our self-concept. 
  • Another way of thinking about it is that self-esteem is how much respect you have for yourself, while self-image is how you see yourself.
  • Still another way of differentiating between self-esteem and self-image is to think of self-esteem as something you give to yourself (that’s why it is called self-esteem) and self-image is usually based on how you imagine others perceive you. 
  • Our self-image is made up of a wide variety of images and beliefs.
  • Some of these are self-evident and easily verifiable (for example, “I am a woman,” “I am a therapist”). But there are also other, less tangible aspects of the self (for example, “I am intelligent,” “I am competent”).

Many of the ideas we have about ourselves were acquired in childhood from two sources: how others treated us and what others told us about ourselves.

  • How others defined us has thus become how we now perceive ourselves.
  • Your self-image—who you think you are—is a package that you have put together from how others have seen and treated you, and from the conclusions, you drew in comparing yourself to others. 
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The Real Cause of Your Low Self-Esteem or Negative Self-Image 

  • The primary cause of your low self-esteem or negative self-image probably goes back to your childhood.
  • No matter what has happened to you in your life, your parents (or the people who raised you) have the most significant influence on how you feel about yourself. 

Negative parental behavior and messages can have a profound effect on our self-image and self-esteem. 

  • This is especially true of survivors of emotional abuse, neglect, or smothering as a child. Inadequate, unhealthy parenting can affect the formation of a child’s identity, self-concept, and level of self-esteem. 
  • Research clearly shows that the single most important factor in determining the amount of self-esteem a child starts with is his or her parents’ style of child-rearing during the first three or four years of the child’s life. 
  • When parents are loving, encouraging, and fair-minded, and provide proper discipline and set appropriate limits, the children they shape end up being self-confident, self-monitoring, and self-actualized. 
  • But when parents are neglectful, critical, and unfair, and provide harsh discipline and inappropriate limits, the children they shape are insecure and self-critical, and they suffer from low self-esteem. 
  • When I first met Matthew I was struck by his dark good looks. He resembled a younger, taller, more exotic-looking Tom Cruise, with his chiseled features, his large, dark, almond-shaped eyes, and his straight dark hair. Because he was so strikingly good-looking I expected him to speak to me with confidence, but instead, he spoke in a reticent, almost apologetic way.
  • As he explained to me why he had come to therapy, I discovered that he felt extremely insecure. Although he was an intelligent, talented, attractive young man, he was tormented with self-doubt and was extremely critical of himself. 
  • Why would a young man with so much going for him feel so badly about himself? 

As Matthew told me the story of his life,

  • I discovered his father was never pleased with him. No matter what Matthew did, it was never enough. He told me about a time when he got on the honor roll in school and was excited to tell his father about it.
  • Instead of congratulating Matthew and being proud of him, his father told him that since the school was so easy for him he needed to get a job after school. So Matthew did as his father suggested. But this didn’t seem to please him, either.
  • Instead, his father complained that he wasn’t helping out enough with yard work and that he needed to quit his job.
  •  “You’re just working so you can make money to waste on girls,” his father criticized, somehow not remembering that he had been the one to pressure Matthew into getting a job in the first place.

Matthew had an interest in music and was a very talented piano player.

  • But his father wasn’t happy about his taking lessons. “You’re already too effeminate,” he scoffed. “Why don’t you go out for sports as I did in school?”
  •  When Matthew followed his father’s advice and tried out for the track team, his father complained, “It just doesn’t have the same prestige as playing football or basketball. Why don’t you try out for one of those teams?”
  • Because his father was never proud of him and never acknowledged his accomplishments, Matthew became very hard on himself. He became very self-critical; no matter what he accomplished he found something wrong with it. If someone did try to compliment him, he pushed their praise away with statements such as “Oh, anyone could have done that,” or “Yeah, but you should have seen how I messed up yesterday.”
  • By not acknowledging Matthew and by never being pleased, Matthew’s father had caused him to be self-conscious and fearful. 

Many parents undermine their children’s self-esteem and create in them a sort of “self anxiety” by treating them in any or all of the following ways:

  • with a lack of warmth and affection, acknowledgment, respect, or admiration, as well as with unreasonable expectations, domination, indifference, belittling, isolation, or unfair or unequal treatment.

Healing your inner child

“Inner Critic” 

  • Defined Having a strong inner critic is another factor in creating low self-esteem, and it usually goes hand in hand with low self-esteem. 
  • Your inner critic is formed through the normal socialization process that every child experiences. Parents teach their children which behaviors are acceptable and which are unacceptable, dangerous, or morally wrong. 
  • Most parents do this by praising the former and discouraging the latter.
  • Children know (either consciously or unconsciously) that their parents are the source of all physical and emotional nourishment, so parental approval feels like a matter of life or death to them. 
  • Therefore, when they are scolded or spanked they feel the withdrawal of parental approval very acutely because it carries with it the horrible risk of losing all support.
  • All children retain conscious and unconscious memories of those times when they felt wrong or bad because of the loss of their parent’s approval. 
  • This is where the inner critic gets his start. (I use “he” when referring to the inner critic because many people, including women, think of their inner critic as being male. Feel free to substitute “she” if it feels more appropriate for you.) 
  • Even as an adult there is still a part of you that believes you are “bad” whenever someone gets angry with you or when you make a mistake. 
  • Your inner critic’s voice is the voice of a disapproving parent—the punishing, forbidding voice that shaped your behavior as a child. If your early experiences were mild and appropriate, your adult critic may only rarely attack, but if you were given very strong messages about your “badness” or “wrongness” as a child, your adult critic will attack you frequently and fiercely. 

Emotional Abuse and Neglect Defined

  •  Abuse is a very emotionally powerful word. It usually implies intent or even malice on the part of the abuser. But parents who emotionally abuse or neglect their children seldom do so intentionally. 
  • Most are simply repeating the way they were treated as a child—doing to their children what was done to them. Many do not realize that the way they are treating their children is harmful to them; few do so out of malice—an intentional desire to hurt their children. Low self-esteem is not usually instilled in children through conscious or deliberate efforts on the part of the parents. 
  • Typically, parents of children with low self-esteem had low self-esteem themselves. And those parents who emotionally abuse, neglect, or smother their children usually do not recognize the tremendous power they have in shaping their children’s sense of self. We need to be very specific when we use the words emotional abuse. 

Emotional abuse of a child is a pattern of behavior—meaning that it occurs continuously, over time. 

  • Occasional negative attitudes or actions are not considered emotional abuse. Even the best of parents have occasions when they have momentarily lost control and said hurtful things to their children, failed to give them the attention they wanted, or unintentionally scared them by their actions. 
  • Every parent undoubtedly treats their children in some of these ways from time to time, but emotionally abusive parents regularly treat their children in some or all of these ways. 
  • Emotional abuse of a child is a pattern of behavior that attacks a child’s emotional development and sense of self-worth. Because emotional abuse affects a child’s sense of self, the victim comes to view himself or herself as unworthy of love and affection. 
  • Emotional abuse includes both acts and omissions by parents or caretakers, and it can cause serious behavioral, cognitive, emotional, or mental disorders in a child. 

This form of maltreatment includes: 

  • Verbal abuse (including constant criticism, ridiculing, blaming, belittling, insulting, rejecting, and inappropriate teasing) 
  • Placing excessive or unreasonable demands on a child that is beyond his or her capabilities 
  • Being overly controlling 
  • Emotionally smothering a child (including being overprotective or unwilling to allow the child to create a separate life from her parents) 
  • Rejecting or emotionally abandoning a child (including being cold and unresponsive and withholding love)
  • Neglect is an even more misunderstood word and can manifest itself physically and emotionally. 
  • Physical neglect includes failure on the part of a parent or primary caregiver to provide for the child’s basic physical needs (food, water, shelter, attention to hygiene) as well as his or her emotional, social, environmental, and medical needs. It also includes failure to provide adequate supervision. 
  • Emotional neglect includes failure to provide the nurturing and positive support necessary for a child’s emotional and psychological growth and development—providing little or no love, support, or guidance. 
  • This includes inattention to a child’s needs for acknowledgment, affection, and emotional support (being uninterested in a child’s feelings, activities, and problems). 
  • The following questionnaire will further help you to understand emotional abuse and neglect and to determine whether you experienced them as a child. 

Questionnaire: Were You Emotionally Abused, Neglected, or Smothered as a Child? 

  • 1. Was one or both of your parents overly critical of you? 
  • Were you frequently criticized for saying the wrong things or behaving in the wrong way? 
  • Did one or both of your parents often criticize the way you looked? 
  • 2. Was it impossible to please your parents? 
  • Did you get the impression that no matter what you did, your parents would never approve of you? 
  • 3. Were your parent’s perfectionists? 
  • Were you chastised or punished unless you did things in a certain way? 
  • 4. Did your parents tell you that you were bad, worthless, or stupid, or that you would never amount to anything? Did they call you insulting names? 
  • 5. Did your parents belittle you, make fun of you, or make you the object of malicious or sadistic jokes? 
  • 6. Did your parents ignore your physical needs, for example, failing to provide adequate clothing such as a warm coat in the winter, or not providing adequate medical care?
  • 7. Did your parents force you to live in dangerous or unstable environments (such as exposure to domestic violence or parental conflict)? 
  • 8. Were your parents so preoccupied or busy with their own needs or problems that they didn’t take time to be with you? 
  • 9. Did your parents frequently leave you alone to fend for yourself? Were you deprived of physical nurturing (for example, being held or comforted when you were upset) or affection when you were a child? 
  • 10. Was one of both of your parents distant or aloof toward you as a child? 
  • 11. Did one or both of your parents have a drinking problem or an addiction to drugs or gambling, or any other addiction that caused one or both to neglect you? 
  • 12. Were you ever abandoned as a child (were you ever sent away to live with someone else as a punishment or because a parent was sick or could not take care of you)? 
  • 13. Was one or both of your parents overly protective of you or overly fearful that harm would come to you (for example, not allowing you to participate in sports or normal childhood activities for fear of your getting hurt)? 
  • 14. Did one or both of your parents isolate you from others or refuse to allow you to have friends over or to go over to other children’s homes? 
  • 15. Was one or both of your parents overly possessive of you (that is, did he or she appear jealous if you paid attention to anyone else or if you had a friend or romantic partner)? 
  • 16. Did one or both parents treat you as a confidante or seek emotional comfort from you? Did you often feel as if you were the parent and your parents were the children? 

These questions describe various forms of emotional abuse and neglect. 

  • If you answered yes to any of questions 1 through 5, you were emotionally abused through verbal abuse or unreasonable expectations. If you answered yes to any of questions 6 through 12, you were neglected or abandoned as a child. If you answered yes to any of questions 13 through 16, you suffered from emotional smothering or emotional incest.

 Psychological Maltreatment

  •  Although most emotional abuse and neglect are unintentional on a parent’s part, sometimes parents deliberately inflict harm on their children in these ways.
  • Psychological maltreatment is a term used by professionals to describe a concerted attack by an adult on a child’s development of self and social competence—a pattern of psychically destructive behavior. 

Sometimes coming under the category of emotional abuse, there are five major behavioral forms: 

  • Rejecting—behaviors that communicate or constitute abandonment of the child, such as a refusal to show affection 
  • Isolating—preventing the child from participating in normal opportunities for social interaction 
  • Terrorizing—threatening the child with severe or sinister punishment, or deliberately developing a climate of fear or threat 
  • Ignoring—where the caregiver is psychologically unavailable to the child and fails to respond to the child’s behavior 
  • Corrupting—caregiver behavior that encourages the child to develop false social values that reinforce antisocial or deviant behavioral patterns such as aggression, criminal acts, or substance abuse. 

How Children Are Affected by Emotional Abuse and Neglect

  • The primary way that children are affected by emotional abuse and neglect is that their self-image becomes distorted, they lack a strong sense of self, they develop extremely low self-esteem, and their emotional development is thwarted. Emotional abuse and neglect create a distorted view of oneself as unacceptable, unlovable, or “less than” others.

Emotional abuse, neglect, and smothering can also create self-hatred in a child.

  • Many children who are emotionally abused or neglected exhibit extremes in either passivity or aggressiveness.
  • Children who are constantly shamed, humiliated, terrorized, or rejected suffer at least as much as, if not more than if they had been physically assaulted.
  • Studies have found that neglect can be more damaging than outright abuse.
  • A survey of maltreated children found that neglected children were the most anxious, inattentive, and apathetic and that they often tended to be alternatively aggressive and withdrawn. There are various reasons for this outcome. 

Neglect and abandonment communicate to a child that he or she is not worthy of love and care. 

  • Early emotional deprivation often produces babies who grow into anxious and insecure children who are slow to develop or who have low self-esteem.
  • This is particularly true of babies who were given inadequate amounts of physical touch and holding. 
  • Researchers have found that the healthiest children are those who were frequently held and caressed by their parents. Children who were deprived of touch became what is called “touch avoidant.” By the age of six, these children would refuse nurturing touch. 
  • Emotional abuse often includes communicating to a child, either verbally or nonverbally, that he or she is unlovable, ugly, stupid, or wicked. Both neglect and emotional abuse can cause children to search within themselves for the faults that merit their parents’ bad treatment. 
  • Such internalized rejection can take a heavy toll on a child’s developing self, leading to poor self-image and low self-esteem. 
  • Children who are shown little empathy and given little praise and acceptance often exhibit not only poor self-esteem but also self-destructive behavior, apathy, and depression. 
  • Children who experience a chaotic environment with little security and safety tend to exhibit anxiety, fear, and night terrors. If they are threatened with the withdrawal of love from their parents or primary caretakers, they often experience severe anxiety, excessive fear, and dependency. 

A literature review of the effects of emotional abuse on children conducted by Marti Tamm Loring, author of Emotional Abuse, revealed the following:

  • Those who internalize the abuse become depressed, suicidal, and withdrawn. They manifest self-destructiveness, depression, suicidal thoughts, passivity, withdrawal (avoidance of social contacts), shyness, and a low degree of communication with others.
  • They are likely to have low self-esteem and may suffer from feelings of guilt and remorse, depression, loneliness, rejection, and resignation. 
  • Perceiving themselves as unworthy and the world as a hostile place in which they are bound to fail, many are unwilling to try new tasks or develop new skills. 
  • People who externalize the abuse frequently become anxious, aggressive, and hostile, may suffer from constant fear, and are always ready to “hit back.” 

As Louise M. Wisechild, the author of The Mother I Carry, a wonderful memoir about healing from emotional abuse, so eloquently wrote: 

  • Emotional abuse is like water dripping every day on a stone, leaving a depression, eroding the personality by an unrelenting accumulation of incidents that humiliate or ridicule, or dismiss. 
  • Emotional abuse is air and piercing vibration. 
  • Emotional abuse can feel physical even though no hand has been raised. The perpetrator may seem fragile and pathetic but still, be vicious. 
  • Childhood emotional abuse can define us when we are young, debilitate us as we grow older, and spread like a virus as we take its phrases and turn them on others. Note that emotional abuse is typically associated with and a result of other types of abuse and neglect. 
  • Emotional abuse is the core of all forms of abuse, and the long-term effects of child abuse and neglect generally stem from the emotional aspects of abuse.

The Role of Shame in Creating Low Self-Esteem and Perfectionism

  •  Shame is a feeling deep within us of being exposed and unworthy. When we feel shame we want to hide. We hang our heads, stoop our shoulders, and curve inward as if trying to make ourselves invisible.
  • Emotional abuse and neglect are very shaming experiences, and those who are victimized in any way feel humiliated and degraded by the experience. 
  • In addition, most children blame themselves for the way their parents treated them, feeling that somehow they deserved to be treated in such a way and thinking, “If I’d only minded my mother, she wouldn’t have belittled and yelled at me in front of my friends.” 

This is an attempt to regain some sense of power and control. 

  • To blame oneself and assume one could have done better or could have prevented an incident is more tolerable than to face the reality of utter helplessness. 
  • Children raised by parents who frequently scolded, criticized, or spanked them whenever they did the slightest thing the wrong end up feeling that their very being is wrong—not just their actions. 
  • Some people fight against shame by striving for perfection. This is a way of compensating for an underlying sense of defectiveness. 
  • The reasoning (although subconscious) goes like this: “If I can become perfect, I’ll never be shamed again.” This quest for perfection is, of course, doomed to fail.
  • Since the person suffering shame already feels inherent, not good enough, nothing he or she does will ever be perceived as good enough.
  • Therefore, continuing to expect perfection in yourself will cause you to constantly be disappointed and constantly damage your self-esteem. 

How Emotional Abuse and Neglect Affect Your Sense of Self 

  • I’ve used lots of words so far to identify different aspects of the self, such as self-image, self-concept, and self-esteem, but as yet I haven’t defined the concept of self.
  • There are many definitions, but for our purposes, we’ll define it as your inner core. It is the sense you have of yourself as a separate person—the sense of where your needs and feelings leave off and others begin. 

There is another “self” phrase that needs defining: a sense of self. 

  • This is your internal awareness of who you are and how you fit into the world. The ideal is what is referred to as “a coherent sense of self,” which is having an internal feeling of solidarity. 
  • You experience yourself as a person who has a place in the world, who has a right to express yourself, and who has the power to affect and participate in what happens to you. 
  • Unfortunately, people who were emotionally abused or neglected in childhood possess a sense of self that is often characterized by feelings that are anything but empowering. Instead, they feel helpless, ashamed, enraged, terrified, and guilty, leading to feelings of insecurity. 
  • We are not necessarily in touch with our sense of self until something happens to make us pay attention to it. If someone dismisses your accomplishments or rejects you, your focus will turn inward. You will begin to question whether you are worthy or loveable. 
  • The reverse can also be true. If someone compliments you, you might turn inward to congratulate yourself. Being self-conscious means that for whatever reason, you have become preoccupied with how you are doing or how you are coming across to other people. 
  • This self-evaluation can become obsessive and can cause you either to feel inhibited in the company of others or to put on a show for them. Either way, self-consciousness interferes with your ability to be your authentic self. When we feel ignored or rejected by others (especially our parents), we often begin to worry about what we might have done to warrant this reaction. 

This begins early in life. 

  • Children are egocentric—meaning they assume everything centers around them and therefore they must be the cause of others’ reactions—and so they tend to blame themselves for the way others treat them. 
  • As we grow older we become self-conscious and we feed our self-consciousness with a lot of self-deprecating assumptions. To develop a strong sense of self, you needed to be raised in an environment where positive psychological nourishment was available. 

Positive psychological nourishment consists of the following: 

  • Empathetic responses. When we say that someone can empathize, we generally mean she has the space inside to listen and respond to another person without getting caught up, or stuck, in her point of view. She can put herself in the other person’s place—to imagine how the other person feels. Unfortunately, many parents are so caught up in themselves that they have no room for anyone else’s needs or views—even their own children’s. 
  • A typical nonempathetic response from a parent may take the form of getting impatient with a baby who soils his pants when the parent is busy trying to get ready for a party. 
  • An empathetic parent will take a deep breath, pick up her toddler lovingly, and remind herself that the baby can’t help it. She’ll talk sweetly to the child and caress him gently as she changes his diaper. A nonempathetic parent may blame the child for causing a delay, handle the child roughly, and communicate displeasure toward him. 
  • Having your perceptions validated. One of the primary ways of encouraging a healthy sense of self is for parents to validate a child’s experience, such as when a parent agrees that something is sad when the child feels sad. 
  • This kind of validation usually causes the child to experience a feeling of being all right. She feels that she is “on target” with her feelings and probably also feels less alone in the world. If, on the other hand, a parent tells the child that a sad thing is a happy thing, the child might suddenly feel off-balance or that something is wrong with her. She will also probably feel very alone. 
  • Having your uniqueness respected. When a child’s uniqueness as an individual is respected, he learns to tolerate differences in himself and others. He learns that it is interesting to discover differences and to deal with them constructively. Unfortunately, in many families, it isn’t considered normal for people in the same family to have different preferences. 
  • Instead, there is an assumption that when a child has a different preference or disagrees, he is trying to control his caretakers or is involved in a power struggle. 
  • Some are even punished or blamed for being different from other family members. This is translated, in the child’s mind, to the message “I am bad.” When a child’s individual preferences are respected, on the other hand, he tends to feel, “I am all right.”

 This in turn promotes a sense of self characterized by feeling worthwhile and loved.

How Parents Act as Mirrors

  •  Infants have no “sense of self,” that is, no internal knowledge of who they are as a person separate from everyone else. If an infant were to look in the mirror, she would not recognize herself. You’ve no doubt watched the reaction of infants or toddlers who look in a mirror.
  • They often react as if they were seeing another child. Parents act as a mirror to show a child who he is. If a baby’s parents smile at him, he learns that he is delightful and adorable. If a baby is held and comforted, he learns that he is safe.
  • If his parents respond to his crying, he learns that he is important and effective. But if a baby is not held, spoken to, comforted, rocked, and loved, he learns other lessons about his worth.
  • If his cries are not responded to, he learns helplessness; he learns he is not important.
  • Later, as the child grows, his parents will act as a mirror in other ways. If they overprotect him, he will learn he is incompetent. If they are overly controlling, he will learn he cannot be trusted. 
  • Throughout childhood, there will be other mirrors that will show a child who he is.
  • Teachers, friends, and caregivers will all perform this role, but a child will inevitably return to the reflection in the mirror that his parents held up for him to determine his goodness, importance, and self-worth. 

I focus on helping you to create a new mirror, one that reflects who you are as opposed to how your parents or other primary caretakers defined you. 

  • Through a process, I call Mirror Therapy you will be able to raise your self-esteem, improve your self-image (including your body image), quiet your inner critic, and heal your shame. 
  • Although this program is called Mirror Therapy, it involves a lot more than looking in the mirror. 
  • Certainly, it is not based on the overly simplistic idea, depicted in an old Saturday Night Live skit, of looking into a mirror and repeating affirmations like “I’m good enough,” “I’m smart enough,” and “People like me.” Instead, it is a holistic approach based on important psychological concepts, techniques, and beliefs.

 I call my program Mirror Therapy for several reasons: 

  • The mirror symbolizes our identity.
  • Parental neglect, emotional abuse, and smothering all have a negative (mirroring) effect on a child’s developing identity—his or her self-concept, sense of self, and self-esteem. 
  • Parental emotional abuse and deprivation also hurt a child’s body image and body awareness. 
  • Thus, what the child (and later, the adult) sees when he or she looks in the mirror is distorted. 
  • Parental emotional abuse creates in a child a negative internal judge or critic, which acts as a warped lens that distorts reality. 
  • The practice of mirroring is a fundamental aspect of parenting and is necessary if a child is to grow into a healthy adult with a strong sense of self and high self-esteem. 
  • Mirror Therapy involves exercises and practices using mirrors as aids to reducing shame and raising self-esteem. 
  • Children mirror their parents’ behavior. 
  • This method focuses on how the negative view or judgment of an emotionally abusive parent defines a child’s self-image; how neglect causes a child to feel worthless and unlovable; and how emotional smothering causes a child to be unable to establish a separate self from his or her parents. 
  • Even though I created Mirror Therapy, especially for the many who were emotionally abused or neglected as children, it can work for anyone who suffers from low self-esteem, a poor self-image, a powerful inner critic, or is riddled with unhealthy shame. 
  • This includes people who were physically or sexually abused. By taking in the information in this book and by completing the exercises, you have an opportunity to reject the distorted images you received from your emotionally abusive or neglectful parents once and for all. 
  • You have the opportunity to replace these distorted images with a more accurate reflection of who you are. I call these two processes “Shattering Your Parental Mirror” and “Creating a New Mirror.” 
  • I encourage you to take this opportunity. 
  • While you cannot reverse all the damage caused by abusive or neglectful parents, you can regain much of the sense of goodness, strength, and wisdom that is your birthright.

Mirror Therapy Assignments

  •  In addition to various exercises throughout the book, I also offer you Mirror Therapy assignments at the end of each chapter. 
  • These assignments will help you to focus on important feelings and issues that may arise as you read the book. 

Mirror Therapy Assignment #1 

  • This week take the time to notice how often you criticize yourself—whether it is because you did not perform the way you expected or because you are not happy with the way you look. 
  • Also notice how often you feel exposed, unworthy, or fearful that others will discover how flawed you are. If you like, record how often you are self-critical, the types of criticism you notice, how often you feel shame, and what triggers that shame.

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परमेश्वर की बुद्धि और राज्य का ज्ञान (Parmeshwar Ki Buddhi Aur Rajya Ka Gyan) 

परमेश्वर की बुद्धि और राज्य का ज्ञान (Parmeshwar Ki Buddhi Aur Rajya Ka Gyan) 

परमेश्वर की बुद्धि और राज्य का ज्ञान (Parmeshwar Ki Buddhi Aur Rajya Ka Gyan)। राज्य का ज्ञान ले हे मेरे पुत्र, यदि तू मेरे वचनों को ग्रहण करे, और मेरी आज्ञाओं को अपने साथ छिपाए, तो तूताकि तू बुद्धि की ओर कान लगाए, और समझ की बात मन लगाकर लगाए; वरन यदि तू ज्ञान की दोहाई दे, और समझ के लिथे अपना शब्द बढ़ाए; यदि तू उसे चान्दी के समान ढूंढ़ता, और छिपा हुआ धन मान कर उसकी खोज करता है; तब तुम यहोवा के भय को समझोगे, और परमेश्वर का ज्ञान पाओगे। नीतिवचन 2:1-5 

1. परमेश्वर की बुद्धि: सोने से भी अधिक मूल्यवान है।

यदि किसी ने आपसे कहा कि आपकी संपत्ति पर सोने की डली और हीरे पाए गए हैं, तो आप उस खजाने की तलाश में, गंदगी को छानने के लिए मेहनती होंगे! 

बुद्धि यहोवा ही देता है

परमेश्वर का वचन आपके लिए दुनिया के सभी सोने और हीरे से अधिक मूल्यवान है। लेकिन कई लोग इसकी दौलत के पन्ने कभी नहीं बदलते। यहोवा बुद्धि देता है: उसके मुंह से ज्ञान और समझ निकलती है (नीतिवचन 2:6)। परमेश्वर के मुख से निकलती है बुद्धि: बुद्धि ही परमेश्वर का वचन है! 

वह धर्मियोंके लिथे खरा बुद्धि ठहराता है; जो सीधा चलता है, वह उनके लिथे बन्धन है। 

वह न्याय के मार्ग पर चलता है, और पवित्र लोगों के मार्ग की रक्षा करता है। तब तू धर्म, और न्याय, और समानता को समझ सकेगा; हाँ, हर अच्छा रास्ता। नीतिवचन 2:7-9 

यदि तुम परमेश्वर की बुद्धि के अनुसार चलो, तो हर एक अच्छे मार्ग को समझोगे।

2. परमेश्वर चाहता है कि आप उसकी बुद्धि को प्राप्त करें।  

बुद्धि बिना चिल्लाए; वह सड़कों पर अपनी आवाज कहती है: वह सभा के मुख्य स्थान में, फाटकों के द्वार में चिल्लाती है: शहर में वह अपने शब्दों को कहती है, हे सरलों, तुम कब तक सादगी से प्यार करते हो? और ठट्ठा करनेवाले अपनी ठट्ठा करने से प्रसन्न होते हैं, और मूढ़ लोग ज्ञान से बैर रखते हैं? 

देख, मैं अपक्की आत्मा तुझ पर उण्डेलूंगा, मैं अपक्की बातें प्रगट करूंगा तुम। नीतिवचन 1:20-23 

जब बुद्धि तुम्हारे हृदय में प्रवेश करती है, और ज्ञान —यह ज्ञान कि परमेश्वर तुम्हें जीवन के हर क्षेत्र में समृद्ध चाहता है—भाता है। (नीति. 2:10), तब: विवेक तेरी रक्षा करेगा, समझ तुझे बनाए रखेगी: तुझे दुष्ट मनुष्य के मार्ग से, और उस मनुष्य से जो भद्दी बातें कहता है, छुड़ाए। नीतिवचन 2:11,12 

परमेश्वर की बुद्धि तुम्हारे लिए उपलब्ध है | 

आज का पवित्र बाइबल वचन

3. राज्य का ज्ञान: बुद्धि का ज्ञान सफलता लाती है।  

परमेश्वर चाहता है कि आपके पास ज्ञान हो ताकि आप धन्य और समृद्ध हों: धन्य है वह व्यक्ति जो ज्ञान पाता है, और वह व्यक्ति जो समझ प्राप्त करता है। क्योंकि उसका माल चाँदी के व्यापार से, और उसका लाभ बढ़िया सोने से उत्तम है। 

वह माणिकों से भी अधिक अनमोल है; और जितनी वस्तुएँ तू चाह सकता है, वे सब उस से न मिलें। उसके दाहिने हाथ में दिनों की लंबाई है, और उसके बाएं हाथ धन और सम्मान है। नीतिवचन 3:13-16 

बुद्धि आपके हृदय में कैसे प्रवेश करती है? यह भगवान के मुंह से आता है! तब तुम्हें उस पर विश्वास करना चाहिए और उसे अपने मुंह से बोलना चाहिए। दाऊद ने कहा, मेरी जीभ तैयार लेखक की कलम है (भजन 45:1)। 

बुद्धि के लिए प्रार्थना

याद रखिए।  

ईश्वर के मुख से ज्ञान निकलता है। 

परमेश्वर चाहता है कि आपके पास बुद्धि हो ताकि आप धन्य और समृद्ध रहें। परमेश्वर के वचन पर विश्वास करने और उसे अपने मुंह से बोलने से आप अपने हृदय में ज्ञान प्राप्त करते हैं।

राज्य का ज्ञान 

परमेश्वर हमेशा चाहता था कि उसका राज्य पृथ्वी पर हो। तू अनन्तकाल तक स्वर्ग में नहीं, परन्तु पृथ्वी पर अर्थात् नई पृथ्वी पर व्यतीत करेगा। 

परमेश्वर ने आदम को पृथ्वी पर परमेश्वर होने के लिए, उस पर शासन करने के लिए बनाया। वह मनुष्य परमेश्वर के अधीन था, परन्तु उसे पृथ्वी पर प्रभुत्व रखना था। 

उत्पत्ति 1:28

परमेश्वर ने आदम को बताया कि कैसे समृद्ध होना है। उस ने कहा, पृय्वी में भर दे, और उसको अपने वश में कर ले; और पृय्वी पर रेंगनेवाले सब जन्तुओं पर अधिकार रख (उत्प0 1:28)। परमेश्वर ने आदम को वह अधिकार दिया, केवल एक ही शर्त के साथ: अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का, तुम न खाना। (उत्प. 2:17)। 

परमेश्वर की इच्छा थी कि पृथ्वी स्वर्ग के अनुरूप हो। पृथ्वी को आदम के हवाले करने के बाद, परमेश्वर ने आदम को वह करने दिया जो उसने चुना था। जब आदम परमेश्वर की अवज्ञा करके पाप करने वाला था, तो परमेश्वर ने यह नहीं कहा, “नहीं, आदम, तुम ऐसा नहीं कर सकते।” उसने आदम को पूर्ण अधिकार दिया था। जब आदम ने सर्प (शैतान) द्वारा चढ़ाए गए वर्जित फल को खाकर शैतान को बेच दिया, तो परमेश्वर ने उसे रोकने के लिए एक भी उंगली नहीं उठाई। क्यों? क्योंकि ऐसा करना परमेश्वर की जिम्मेदारी नहीं थी; यह आदम की जिम्मेदारी थी। 

किसी ने सुझाव दिया है कि आदम बगीचे में घास काटने वाले से ज्यादा कुछ नहीं था। लेकिन वह नहीं हो सकता था – बगीचे में कोई मातम नहीं था। आदम पृथ्वी पर परमेश्वर था। 2 कुरिन्थियों 4:4 में, पॉल शैतान को इस दुनिया के देवता के रूप में संदर्भित करता है जिसने विश्वास नहीं करने वालों के दिमाग को अंधा कर दिया है। शैतान को यह उपाधि आदम से मिली थी। 

1. परमेश्वर ने अपना राज्य स्थापित किया ।  

आदम के पाप करने और शैतान को दुनिया का देवता बनने की अनुमति देने के बाद, परमेश्वर ने अपने राज्य को पृथ्वी पर पुनर्स्थापित करने के लिए एक और साधन का उपयोग किया: उसने अब्राहम के साथ एक रक्त वाचा स्थापित की। वाचा का अर्थ था कि जो कुछ भी अब्राहम परमेश्वर का था और जो कुछ परमेश्वर अब्राहम का था। उनकी लहू की वाचा कितनी दृढ़ थी। 

जब आप इस वाचा का अध्ययन करेंगे, तो आप पाएंगे कि इब्राहीम अत्यधिक धनी था क्योंकि परमेश्वर ने उसे धनी बनाया था। 

जब अब्राम नब्बे वर्ष और नौ वर्ष का हुआ, तब यहोवा ने अब्राम को दर्शन देकर उस से कहा, मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूं; मेरे आगे चल, और तू सिद्ध बन।

और मैं अपके और तेरे बीच अपक्की वाचा बान्धूंगा, और तुझे बहुत बढ़ाऊंगा। और अब्राम मुंह के बल गिर पड़ा: और परमेश्वर ने उस से बातें कीं। उत्पत्ति 17:1-3 

परमेश्वर ने इब्राहीम से कहा, “मैं एल शद्दै (सर्वशक्तिमान परमेश्वर) हूं।” हिब्रू में, शब्द सर्वशक्तिमान या एल शद्दाई का अर्थ है सर्व-पर्याप्त, ईश्वर जो पर्याप्त से अधिक है। 

प्रका. 21:21. 

कुछ लोगों को लगता है कि भगवान ने कहा, “मैं एल चेपो हूं।” उनके लिए भगवान और गरीबी साथ-साथ चलते हैं। लेकिन यह सच नहीं है! तुम प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में पढ़ते हो कि स्वर्ग की सड़कें चोखे सोने की हैं। स्वर्ग में एक मोती से बने द्वार भी हैं! (प्रका. 21:21.) 

परमेश्वर ने इब्राहीम से कहा कि वह उसे बहुत सी जातियों का पिता बनाएगा: न तो तेरा नाम फिर अब्राम कहलाएगा, परन्तु तेरा नाम इब्राहीम होगा; क्योंकि मैं ने तुझे बहुत सी जातियों का पिता बनाया है। 

उत्पत्ति 17:5,7 

और मैं अपके और तेरे और तेरे बाद तेरे वंश के बीच उनकी पीढ़ी पीढ़ी में सदा की वाचा बान्धूंगा, जिस से तेरा और तेरे बाद तेरे वंश का परमेश्वर ठहरूंगा। उत्पत्ति 17:5,7 

हम निम्नलिखित धर्मग्रंथों में वर्णित वाचा की आशीषों से देख सकते हैं कि परमेश्वर का इरादा इब्राहीम या उसके वंशजों के लिए गरीबी से पीड़ित होने का नहीं था। वादा इब्राहीम और उनकी पीढ़ी में उसके वंश के लिए था। 

यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की वाणी को यत्न से सुनेगा, और उसकी सब आज्ञाओं को जो मैं आज तुझे सुनाता हूं, मानना, और उनका पालन करना, कि तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे देश की सब जातियोंके ऊपर ऊंचे पर ठहराएगा। पृथ्वी और यदि तू अपके परमेश्वर यहोवा की बात सुनेगा, तो ये सब आशीषें तुझ पर आएंगी, और तुझ पर आ जाएंगी। 

व्यवस्थाविवरण 28:1-3,5,6 

तू नगर में धन्य होगा, और तू मैदान में धन्य होगा। धन्य है तेरी टोकरी और तेरा भण्डार। जब तू भीतर आएगा तो तू धन्य होगा, और जब तू निकलेगा, तब तू धन्य होगा। व्यवस्थाविवरण 28:1-3,5,6 

2. परमेश्वर की सशर्त प्रतिज्ञाएं।  

यहोवा तुझे सिर बनाएगा, न कि पूंछ, और तू केवल ऊपर होगा, और तू नीचे नहीं होगा; यदि तू अपके परमेश्वर यहोवा की उन आज्ञाओं को जो मैं आज तुझे सुनाता हूं, मानने को, और उन पर चलने को सुनो।  व्यवस्थाविवरण 28:13 

यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की वाणी को यत्न से माने, तो ये सब आशीषें तुझ पर आ कर तुझ पर आ जाएंगी। व्यवस्थाविवरण 28:1,2 

यह अंतिम शास्त्र कहता है कि हमें सुनना परमेश्वर के वचन शब्द सुनना का अर्थ है “बुद्धिमानी से सुनना, आज्ञाकारी होना, घोषित करना और बताना।”शब्द लगन का अर्थ है “पूरी तरह से और पूरी तरह से, जोर से और जोर से घोषित करना।” तो आइए इसे इस अर्थ के साथ पढ़ें: यदि आप अपने परमेश्वर यहोवा की वाणी को ध्यान से सुनें, बुद्धिमानी से सुनें, आज्ञाकारी हों, और जो कुछ परमेश्वर ने कहा है उसे उच्च और उच्च स्वर में कहें या कहें- तो ये सभी आशीर्वाद आप पर आएंगे . 

परमेश्वर ने अपने वचन को बोलने के लिए कहा; लेकिन जिस तरह से कुछ लोग बात करते हैं, आपको लगता है कि उसने सभी श्रापों की घोषणा करने के लिए कहा था, यह बात करने के लिए कि यह कैसे काम नहीं करेगा और पिछली बार कोशिश की गई थी कि यह कैसे विफल हुआ। 

3. आशीर्वाद चुनो, शाप नहीं।  

और यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा को भूलकर पराये देवताओं के पीछे चलकर उनकी उपासना करे, और उनकी उपासना करे, तो मैं आज तेरे विरुद्ध गवाही देता हूं, कि तू निश्चित रूप से नष्ट। 

जिन जातियों को यहोवा तुम्हारे साम्हने से नाश करेगा, वैसे ही तुम भी नाश हो जाओगे; क्योंकि तुम अपने परमेश्वर यहोवा की बात नहीं मानोगे। व्यवस्थाविवरण 8:19,20 

परमेश्वर अपनी वाणी की अवज्ञा करने के परिणामों और उन लोगों पर आने वाले श्रापों की चेतावनी दे रहा है जिन्होंने प्रभु को त्याग दिया और अन्य देवताओं की सेवा की। 

व्यवस्थाविवरण, अध्याय 28 में,

परमेश्वर गरीबी के अभिशाप का वर्णन करता है: क्योंकि तू ने अपने परमेश्वर यहोवा की उपासना आनन्द और मन के आनन्द के साथ नहीं की, क्योंकि तू ने सब वस्तुओं की बहुतायत के कारण; इसलिये तू अपने शत्रुओं की सेवा करेगा, जिन्हें यहोवा तेरे विरुद्ध भेजेगा ; 47,48)। 

परमेश्वर इस्राएल के बच्चों को वचन के प्रति आज्ञाकारी होने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था, लेकिन वे आज्ञाकारी होने में असफल रहे और उन पर शाप आ गया। 

आशीर्वाद की वाचा इब्राहीम के वंश पर उसी तरह लागू होती है जैसे यह इस्राएल के बच्चों पर लागू होती है। यदि हम परमेश्वर की वाणी को लगन से सुनेंगे तो आशीषें हम पर हावी हो जाएंगी। 

यहोवा हमारी सहायता कर

परमेश्वर ने इब्राहीम से कहा, मैं पक्की वाचा अपने और तेरे बीच बान्धूंगा, और मैं तुझे बहुत बढ़ाऊँगा, देख, मेरी वाचा तेरे साथ है (उत्प0 17:2,4)। 

पॉल का कहना है कि वादा यह था कि इब्राहीम को दुनिया का वारिस होना चाहिए। (रोमि. 4:13.) 

4. वाचा राज्य को फिर से स्थापित करती है । 

जब आदम ने परमेश्वर के खिलाफ उच्च राजद्रोह किया, शैतान को इस दुनिया का देवता बनने की अनुमति दी, तो भूमि पर गरीबी, बीमारी और आध्यात्मिक मृत्यु का अभिशाप आया। (उत्प. 3:17,18.) परमेश्वर ने अपने लोगों को इस श्राप से मुक्त करने के लिए वाचा की स्थापना की। 

व्यवस्थाविवरण 28:15 में,

परमेश्वर ने कहा, परन्तु यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की बात न माने, तो उसकी सब आज्ञाओं और विधियोंको जो मैं आज तुझे सुनाता हूं मानने को न मानें; कि ये सब शाप तुझ पर आ पड़ेंगे, और तुझ पर आ पड़ेंगे, तब उस ने शापों की सूची दी। 

इस शास्त्र को पढ़ने के बाद, कुछ लोग परमेश्वर की एक बुरी छवि बनाते हैं, यह मानते हुए कि वह बुरे काम करता है। परन्तु परमेश्वर अपने लोगों को चेतावनी दे रहा था। वह उन्हें बता रहा था कि अगर वे श्रापों से मुक्त हो गए तो क्या होगा। वह कह रहा था कि शाप मौजूद थे, लेकिन लोगों को श्रापों को प्रभावित नहीं होने देना था। 

5. अब्राहम की आशीषें हमारी हैं! 

उत्पत्ति 17:7 में, परमेश्वर ने कहा, मैं अपके और तेरे और तेरे बाद तेरे वंश के बीच उनकी पीढ़ी पीढ़ी में सदा की वाचा बान्धूंगा, जिस से तेरा और तेरे बाद तेरे वंश का परमेश्वर ठहरूंगा। 

इसहाक के द्वारा इब्राहीम और उसके वंशजों को उस वंश के आने तक वाचा में काम करना था। 

आइए वंश पर करीब से नज़र डालें: अब अब्राहम और उसके वंश से किए गए वादे थे। वह नहीं कहता, और बीज से, बहुतों के समान; लेकिन एक के रूप में। (गला. 3:16)। 

यह किस “बीज” की बात कर रहा है?

और तेरे वंश को, जो मसीह है। हम सब परमेश्वर की सन्तान और इब्राहीम के वंश हैं। गलातियों 3:26-29 इसे बहुत स्पष्ट करता है: क्योंकि तुम सब मसीह यीशु पर विश्वास करने के द्वारा परमेश्वर की सन्तान हो।

क्योंकि तुम में से जितनों ने मसीह में बपतिस्मा लिया है, उन्होंने मसीह को पहिन लिया है। न यहूदी है, न यूनानी, न बन्धन है, न स्वतन्त्र, न नर है, न नारी; क्योंकि मसीह यीशु में तुम सब एक हो। और यदि तुम मसीह के हो, तो इब्राहीम के वंश और प्रतिज्ञा के अनुसार वारिस भी हो। पौलुस कहता है, अब तुम मसीह की देह हो (1 कुरिं. 12:27)। जब हम नया जन्म लेते हैं, तो हम मसीह में बपतिस्मा लेते हैं। मसीह बीज है; और चूँकि हम मसीह की देह के अंग हैं, इसलिए हम बीज हैं। इसलिए, परमेश्वर ने अब्राहम से जो वादा किया था, वह आज हमारा है। 

क्‍योंकि यदि निज भाग व्‍यवस्‍था का हो, तो फिर प्रतिज्ञा का नहीं: परन्‍तु परमेश्वर ने प्रतिज्ञा के द्वारा इब्राहीम को दिया। 

फिर कानून की सेवा क्यों करते हैं? वह तो अपराधों के कारण तब तक जोड़ा गया, जब तक कि वह वंश न आ जाए, जिस से प्रतिज्ञा की गई थी; और वह एक मध्यस्थ के हाथ में स्वर्गदूतों द्वारा ठहराया गया था।

परन्तु विश्वास के आने से पहिले, हम व्यवस्था के आधीन रहे, और उस विश्वास के लिथे बन्द रहे, जो बाद में प्रगट हो। 

इसलिये कि व्यवस्था हमें मसीह के पास लाने के लिथे हमारा शिक्षक थी, कि हम विश्‍वास के द्वारा धर्मी ठहरें। 

लेकिन उस विश्वास के आने के बाद, हम अब एक स्कूल मास्टर के अधीन नहीं हैं। गलातियों 3:18,19,23-26 

अब हम व्यवस्था के अधीन नहीं हैं। इसका अर्थ है कि हम अब व्यवस्था के अभिशाप के अधीन नहीं हैं। परमेश्वर की महिमा, मसीह ने हमें श्राप से छुड़ाया, आशीष नहीं—आशीर्वाद अभी भी हमारा है! 

गलातियों 3:13,14 

मसीह ने हमें व्यवस्था के श्राप से छुड़ाया, और हमारे लिये श्राप ठहराया; क्योंकि लिखा है, शापित है वह सब जो वृक्ष पर लटका है: कि इब्राहीम की आशीष यीशु के द्वारा अन्यजातियों पर आए मसीह; कि हम विश्वास के द्वारा आत्मा की प्रतिज्ञा को ग्रहण करें। गलातियों 3:13,14 

बहुत से लोग मानते हैं कि आत्मा की प्रतिज्ञा पवित्र आत्मा को भेजने की परमेश्वर की प्रतिज्ञा है, परन्तु यह वाचा के संबंध में अब्राहम से आत्मा की प्रतिज्ञा है। परमेश्वर कह रहा था कि क्योंकि मसीह ने हमें व्यवस्था के श्राप से छुड़ाया, तो अब्राहम की आशीषें हम पर हैं। 

6. वाचा सदा के लिए है ।  

भाइयों की है, मैं मनुष्यों की रीति के अनुसार बोलता हूं; यद्यपि यह केवल एक मनुष्य की वाचा है, तौभी यदि यह दृढ़ हो, तो कोई भी व्यक्ति इसे अस्वीकार नहीं करता है, या इसे जोड़ता है और मैं यह कहता हूं, कि वह वाचा, जो मसीह में परमेश्वर के सामने दृढ़ थी, वह कानून, जो चार सौ तीस साल बाद था , अस्वीकृत नहीं कर सकता, कि उसे किसी भी प्रभाव का वादा नहीं करना चाहिए। गलातियों 3:15,17

परमेश्वर द्वारा अब्राहम के साथ वाचा बान्धने के बाद व्यवस्था लागू हुई।

जबकि व्यवस्था के अधीन और उसके शाप के अधीन, इस्राएली मिस्र में गुलामी के लिए बेच दिए गए थे और उन्हें उन सभी वर्षों में वहीं रहना पड़ा। परन्तु परमेश्वर ने कहा कि व्यवस्था अभी भी वाचा को रद्द नहीं कर सकती क्योंकि वह एक चिरस्थायी वाचा थी।

इस वाचा में जिसे परमेश्वर ने कहा था कि वह इब्राहीम के वंश के साथ स्थापित करेगा, उनकी पीढ़ियों में वाक्यांश है। इसका मतलब है कि सभी तरह से नीचे! यह एक चिरस्थायी वाचा है। यह युगों के अंत तक जारी रहेगा।

एक रक्त वाचा इतनी बाध्यकारी थी कि अजन्मे बच्चे भी तब तक शामिल थे जब तक कि वे स्वयं निर्णय नहीं कर लेते कि वे उस वाचा के अधीन आएंगे या नहीं।

प्रत्येक विश्वासी जो आज उस वाचा में आना चाहता है, उस पर दावा कर सकता है और इसके लाभों में चल सकता है जैसे अब्राहम ने किया था! वास्तव में, वे इसमें इब्राहीम से बेहतर चल सकते हैं क्योंकि वह पुरानी वाचा के अधीन था।

नई वाचा बेहतर वादों पर स्थापित है। 

यदि पुरानी वाचा सिद्ध होती, तो नई वाचा की कोई आवश्यकता नहीं होती; परन्तु दोष ढूंढ़ते हुए, परमेश्वर ने एक नई वाचा बनाई—एक ऐसी वाचा जिस पर यीशु ने अपने लहू से हस्ताक्षर किए और मुहर लगाई। ध्यान दें कि यह वाचा चिरस्थायी थी। यह पुरानी वाचा के पूरा होने के साथ समाप्त नहीं हुआ। 

7. अपने आप को इस वाचा के अधीन रखें।  

जब मैंने उत्पत्ति 17:7 में सच्चाई देखी—कि हम उस वाचा में रहने के हकदार हैं—मैंने स्वयं को वाचा के अधीन रखने का निश्चय किया। मैंने इसे ज़ोर से कहा: “सर्वशक्तिमान परमेश्वर और उसके पुत्र, यीशु मसीह के नाम पर, मैं अब उस वाचा के अधीन आने का निर्णय लेता हूँ! मैं इसमें ऑपरेशन करने जा रहा हूँ! हे पिता, मैं अब अपने आप को खोलता हूं, कि आप इसे मेरी पीढ़ी में मेरे साथ स्थापित करें!” 

उस वाचा के अधीन आने और उस पर चलने का निश्चय करो। तुम्हारा परमेश्वर के साथ वाचा है। 

परन्तु तू अपने परमेश्वर यहोवा को स्मरण रखना, क्योंकि वही तुझे धन प्राप्त करने का अधिकार देता है, कि वह अपनी वाचा को जो उस ने तेरे पितरों से शपय खाकर बान्धी या, वैसा ही आज के दिन को पूरा करे। व्यवस्थाविवरण 8:18 

याद रखने योग्य बातें 

  • परमेश्वर ने मनुष्य को पृथ्वी पर प्रभुता करने के लिए बनाया। 
  • आदम के पाप ने शैतान को संसार का देवता बनने दिया। 
  • परमेश्वर ने इब्राहीम के साथ एक रक्त वाचा स्थापित की। 
  • इब्राहीम के पास जो कुछ था वह सब परमेश्वर का था।
  • परमेश्वर के पास जो कुछ भी था वह सब इब्राहीम का था। 
  • परमेश्वर के वचन की वाणी को लगन से सुनें। 
  • यदि तुम मसीह के हो, तो इब्राहीम के वंश और प्रतिज्ञा के अनुसार वारिस भी हो। 
  • अपने आप को इस वाचा के तहत रखें। 
  • परमेश्वर के साथ चलने का फैसला करें। 
  • आपके पास उसके साथ एक चिरस्थायी वाचा है!

परमेश्वर की स्थापित वाचा और स्थापित हृदय (The Established Covenant And The Established Heart)

https://youtu.be/P1akF78QeNI

God’s Wisdom Is Available To You | Knowledge of the Kingdom  

God’s Wisdom Is Available To You | Knowledge of the Kingdom 

God’s Wisdom Is Available To You | Knowledge of the Kingdom, My son, if thou wilt receives my words, and hide my commandments with thee; so that thou incline thine ear unto wisdom, and apply thine heart to understanding; Yea, if thou criest after knowledge, and liftest up thy voice for understanding; If thou seekest her as silver, and searchest for her as for hid treasures; Then shalt thou understand the fear of the Lord, and find the knowledge of God. Proverbs 2:1-5 

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1. God’s Wisdom: More Valuable Than Gold

If someone told you that gold nuggets and diamonds had been found on your property, you would be diligent to sift through the dirt, searching for that treasure! 

The Word of God is worth more to you than all the gold and diamonds in the world. But many never turn the pages for its riches. The Lord giveth wisdom: out of his mouth cometh knowledge and understanding (Prov. 2:6). Wisdom comes out of the mouth of God: Wisdom is the Word of God! 

He layeth up sound wisdom for the righteous; he is a buckler to them that walk uprightly. 

He keepeth the paths of judgment, and preserveth the way of saints. Then shalt thou understand righteousness, and judgment, and equity; yea, every good path. Proverbs 2:7-9 

If you follow the wisdom of God, you will understand every good path.

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2. God Wants You To Have His Wisdom 

Wisdom crieth without; she uttereth her voice in the streets: she crieth in the chief place of concourse, in the openings of the gates: in the city she uttereth her words, saying, How long, ye simple ones, will ye love simplicity? and the scorners delight in their scorning, and fools hate knowledge? 

Behold, I will pour out my spirit unto you, I will make known my words unto you. Proverbs 1:20-23 

When wisdom entereth into thine heart, and knowledge —the knowledge that God wants you prosperous in every area of your life—is pleasant unto thy soul. (Prov. 2:10), then: Discretion shall preserve thee, understanding shall keep thee: To deliver thee from the way of the evil man, from the man that speaketh froward things. Proverbs 2:11,12 

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3. Wisdom Brings Success 

God wants you to have wisdom so that you will be blessed and prosperous: Happy is the man that findeth wisdom, and the man that getteth understanding. For the merchandise of it is better than the merchandise of silver, and the gain thereof than fine gold. 

She is more precious than rubies: and all the things thou canst desire are not to be compared unto her. Length of days is in her right hand, and in her left-hand riches and honor. Proverbs 3:13-16 

How does wisdom get into your heart? It comes from the mouth of God! Then you must believe it and speak it out your mouth. David said, My tongue is the pen of a ready writer (Ps. 45:1). 

Remember 

Wisdom comes out of the mouth of God. 

God wants you to have wisdom so you will be blessed and prosperous. You get wisdom into your heart by believing God’s Word and speaking it out of your mouth.

Knowledge of the Kingdom 

God always intended for His Kingdom to be on earth. You will not spend eternity in heaven but on earth— the new earth. 

God created Adam to be god over the earth, to rule it. The man was subordinate to God, but he was to have dominion over the earth. 

Gen. 1:28

God told Adam how to prosper. He said, replenish the earth, and subdue it: and have dominion over every living thing that moveth upon the earth (Gen. 1:28). God gave that authority to Adam, with only one stipulation: of the tree of the knowledge of good and evil, thou shalt not eat. (Gen. 2:17). 

God’s will was that the earth is patterned after heaven. After turning the earth over to Adam, God let Adam do as he chose. When Adam was about to sin by disobeying God, God didn’t say, “No, Adam, you can’t do that.” He had given Adam total authority. When Adam sold out to Satan by eating the forbidden fruit the serpent (Satan) offered, God did not lift a finger to stop him. Why? Because it was not God’s responsibility to do so; it was Adam’s responsibility. 

Someone has suggested that Adam was nothing more than a weed puller in the Garden. But he couldn’t have been— there were no weeds in the Garden. Adam was god over the earth. In 2 Corinthians 4:4, Paul refers to Satan as the god of this world who has blinded the minds of those who believe not. Satan got this title from Adam. 

God’s Wisdom Is Available To You | Knowledge of the Kingdom
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1. God Establishes His Kingdom 

After Adam sinned and allowed Satan to become the god of the world, God used another means to restore His Kingdom to earth: He established a blood covenant with Abraham. The Covenant meant that whatever Abraham had belonged to God and whatever God had belonged to Abraham. That’s how strong their blood covenant was. 

As you study this Covenant, you will find that Abraham was exceedingly rich because God made him rich. 

When Abram was ninety years old and nine, the Lord appeared to Abram and said unto him, I am the Almighty God; walk before me, and be thou perfect.

And I will make my covenant between me and thee and will multiply thee exceedingly. And Abram fell on his face: and God talked with him. Genesis 17:1-3 

God said to Abraham, “I am El Shaddai (Almighty God).” In Hebrew, the word almighty or El Shaddai means the all-sufficient One, the God Who is more than enough. 

Rev. 21:21. 

Some seem to think that God said, “I am El Cheapo.” To them, God and poverty run hand in hand. But that’s not true! You read in the book of Revelation that the streets of heaven are pure gold. There are even gates in heaven made out of a single pearl! (Rev. 21:21.) 

God told Abraham that He would make him the father of many nations: Neither shall thy name any more be called Abram, but thy name shall be Abraham; for a father of many nations have I made thee. 

Genesis 17:5,7 

And I will establish my covenant between me and thee and thy seed after thee in their generations for an everlasting covenant, to be a God unto thee, and to thy seed after thee. Genesis 17:5,7 

We can see from the blessings of the Covenant described in the following scriptures that God didn’t intend for Abraham or his descendants to be poverty-stricken. The promise was to Abraham and his seed in their generation. 

It shall come to pass, if thou shalt hearken diligently unto the voice of the Lord thy God, to observe and to do all his commandments which I command thee this day, that the Lord thy God will set thee on high above all nations of the earth: 

And all these blessings shall come on thee, and overtake thee if thou shalt hearken unto the voice of the Lord thy God. 

Deuteronomy 28:1-3,5,6 

Blessed shalt thou be in the city, and blessed shalt thou is in the field. Blessed shall be thy basket and thy store. Blessed shalt thou be when thou comest in, and blessed shalt thou be when thou goest out. Deuteronomy 28:1-3,5,6 

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2. Conditional Promises 

And the Lord shall make thee the head, and not the tail, and thou shalt be above only, and thou shalt not be beneath; if that thou hearkens unto the commandments of the Lord thy God, which I command thee this day, to observe and to do them.  Deuteronomy 28:13 

It shall come to pass if thou shalt hearken diligently unto the voice of the Lord thy God all these blessings shall come on thee and overtake thee. Deuteronomy 28:1,2 

This last scripture says we are to hearken diligently to God’s Word. The word hearken means “to hear intelligently, be obedient to, declare and tell.” The word diligently means “to declare wholly and completely, louder and louder.” So let’s read it with that meaning: If thou shalt hearken diligently unto the voice of the Lord thy God—to hear intelligently, be obedient to, and declare or speak louder and louder what God has said—then all these blessings shall come on thee. 

God said to speak out His Word; but from the way some people talk, you would think He said to declare all the curses, to talk about how it won’t work and how it failed the last time it was tried. 

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3. Choose Blessings, Not Curses 

And it shall be, if thou do at all forget the Lord thy God, and walk after other gods, and serve them, and worship them, I testify against you this day that ye shall surely perish. 

As the nations which the Lord destroyeth before your face, so shall ye perish; because ye would not be obedient unto the voice of the Lord your God. Deuteronomy 8:19,20 

God is warning of the consequences of disobeying His voice and of the curses that would come upon the people who forsook the Lord and served other gods. 

In Deuteronomy, chapter 28,

God describes the curse of poverty: Because thou served not the Lord thy God with joyfulness, and with gladness of heart, for the abundance of all things; 

Therefore shalt thou serve thine enemies which the Lord shall send against thee, in hunger, and in thirst, and in nakedness, and in want of all things: and he shall put a yoke of iron upon thy neck until he has destroyed thee (Vv. 47,48). 

God was encouraging the children of Israel to be obedient to the Word, but they failed to be obedient and the curses did come on them. 

The Covenant of Blessing applies to the seed of Abraham in the same way it applied to the children of Israel. The blessings will overtake us if we hearken diligently to God’s voice. 

Gen. 17:2,4

God said to Abraham, I will make my covenant between me and thee, and will multiply thee exceedingly As for me, behold, my covenant is with thee (Gen. 17:2,4). 

Paul says the promise was that Abraham should be heir of the world. (Rom. 4:13.) 

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4. The Covenant Re-establishes The Kingdom

When Adam committed high treason against God, allowing Satan to become the god of this world, a curse of poverty, sickness, and spiritual death came upon the land. (Gen. 3:17,18.) God established the Covenant to relieve His people from this curse. 

In Deuteronomy 28:15,

God said, But it shall come to pass, if thou wilt not hearken unto the voice of the Lord thy God, to observe to do all his commandments and his statutes which I command thee this day; that all these curses shall come upon thee, and overtake thee, Then He listed the curses. 

After reading this scripture, some people form a bad image of God, believing that He does evil things. But God was warning His people. He was telling them what would happen if they got over the curses. He was saying that the curses existed, but that the people didn’t have to let the curses affect them. 

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5. Abraham’s Blessings Are Ours! 

In Genesis 17:7, God said, I will establish my covenant between me and thee and thy seed after thee in their generations for an everlasting covenant, to be a God unto thee, and to thy seed after thee. 

Abraham and his descendants through Isaac were to operate in the Covenant until that Seed came. 

Let’s take a closer look at the seed: Now to Abraham and his seed were the promises made. He saith not, And to seeds, as of many; but as of one. (Gal. 3:16). 

What “seed” is this talking about?

And to thy seed, which is Christ. We are all the children of God and the seed of Abraham. Galatians 3:26-29 makes this very plain: For ye are all the children of God by faith in Christ Jesus.

For as many of you as having been baptized into Christ have put on Christ. There is neither Jew nor Greek, there is neither bond nor free, there is neither male nor female: for ye is all one in Christ Jesus. And if ye be Christ’s, then are ye Abraham’s seed, and heirs according to the promise. Paul says, Now ye are the body of Christ (1 Cor. 12:27). When we are born again, we are baptized into Christ. Christ is the seed; and since we are part of the Body of Christ, we are the seed. Therefore, the promise God made to Abraham belongs to us today. 

For if the inheritance be of the law, it is no more of promise: but God gave it to Abraham by promise. 

Wherefore then serveth the law? It was added because of transgressions, till the seed should come to whom the promise was made; and it was ordained by angels in the hand of a mediator.

But before faith came, we were kept under the law, shut up unto the faith which should afterward be revealed. 

Wherefore the law was our schoolmaster to bring us unto Christ, that we might be justified by faith. 

But after that faith comes, we are no longer under a schoolmaster. Galatians 3:18,19,23-26 

We are no longer under the Law. That means we are no longer under the curse of the Law. Glory to God, Christ redeemed us from the curse, not the blessing—the blessing is still ours! 

Galatians 3:13,14 

Christ hath redeemed us from the curse of the law, being made a curse for us: for it is written, Cursed is everyone that hangeth on a tree: That the blessing of Abraham might come on the Gentiles through Jesus Christ; that we might receive the promise of the Spirit through faith. Galatians 3:13,14 

Many believe that the promise of the Spirit is God’s promise to send the Holy Spirit, but it is the promise of the Spirit to Abraham in regard to the Covenant. God was saying that because Christ redeemed us from the curse of the Law, then the blessings of Abraham belong to us. 

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6. The Covenant Is Everlasting 

Brethren, I speak after the manner of men; Though it is but a man’s covenant, yet if it is confirmed, no man disannulleth, or addeth thereto And this I say, that the covenant, that was confirmed before of God in Christ, the law, which was four hundred and thirty years after, cannot disannul, that it should make the promise of none effect. Galatians 3:15,17

The Law came into effect after God had made the Covenant with Abraham.

While under the Law and under the curse of it, the Israelites were sold into slavery in Egypt and had to stay there all those years. But God said the Law still could not disannul the Covenant because He was an everlasting Covenant.

In this Covenant which God said He would establish with Abraham’s seed, there is the phrase in their generations. That means all the way down! It is an everlasting Covenant. It will continue to the end of the ages.

A blood covenant was so binding that even unborn children were involved until they could decide for themselves whether or not they would come under that covenant.

Every believer who wants to come into that Covenant today can claim it and walk in the benefits of it just like Abraham did! In fact, they can walk in it better than Abraham for he was under the Old Covenant.

The New Covenant is established on better promises. 

If the Old Covenant had been perfect, there would have been no need for a new covenant; but finding fault, God made a new covenant—one that was signed and sealed by Jesus with His own blood. Notice this covenant was everlasting. It did not pass away with the Old Covenant being fulfilled. 

7. Place Yourself under This Covenant 

When I saw the truth in Genesis 17:7—that we are entitled to be in that Covenant—I decided to place myself under the Covenant. I spoke this out loud: “In the name of Almighty God and His Son, Jesus Christ, I decide now to come under that Covenant! I’m going to operate in it! I open myself now, Father, to let You establish it with me in my generation!” 

Make a decision to come under that Covenant and walk in it. You have a covenant with God. 

But thou shalt remember the Lord thy God: for it is he that giveth thee power to get wealth, that he may establish his covenant which he sware unto thy fathers, as it is this day. Deuteronomy 8:18 

Things To Remember 

  • God created man to have dominion over the earth. 
  • Adam’s sin allowed Satan to become the god of the world. 
  • God established a blood covenant with Abraham. 
  • Everything Abraham had belonged to God.
  • Everything God had belonged to Abraham. 
  • Hearken diligently to the voice of God’s Word. 
  • If ye be Christ’s, then are ye Abraham’s seed, and heirs according to the promise. 
  • Place yourself under this Covenant. 
  • Make the decision to walk with God. 
  • You have an everlasting Covenant with Him!

https://youtu.be/P1akF78QeNI

परमेश्वर की स्थापित वाचा और स्थापित हृदय (The Established Covenant And The Established Heart)

ज़िग जिगलर के अनमोल विचार (Amazing Quotes Of Zig Ziglar) 

ज़िग जिगलर के 100+ अनमोल विचार (Amazing Quotes Of Zig Ziglar) 

ज़िग जिगलर (Zig Ziglar) की जीवनी : तीन दशकों से अधिक समय से Zig Ziglar को उनके साथियों ने आशा और आशावाद के अमेरिका के सबसे सुसंगत संदेशवाहक के रूप में मान्यता दी है। राष्ट्रपति फोर्ड, रीगन और बुश, जनरलों नॉर्मन श्वार्जकोफ और कॉलिन पॉवेल, डॉ नॉर्मन विन्सेंट पील, पॉल हार्वे और डॉ रॉबर्ट शूलर के साथ मंच साझा करने के बाद, वह दुनिया में सबसे अधिक व्यक्तिगत विकास प्रशिक्षकों में से एक है। ज़िग जिगलर (Ziglar) की क्लाइंट सूची अमेरिकी और वैश्विक व्यापार में कौन है की तरह पढ़ता है। उनकी तेईस पुस्तकों में से नौ बेस्टसेलर सूची में रही हैं और उनके शीर्षकों का अड़तीस से अधिक भाषाओं और बोलियों में अनुवाद किया गया है। हम यहाँ ज़िग जिगलर के 100+ अनमोल विचार (Amazing Quotes Of Zig Ziglar) के बारे में पढ़ रहे हैं।

ज़िग ने जीवन के हर क्षेत्र के लोगों को जितना संभव हो सके उससे कहीं अधिक हासिल करने के लिए प्रेरित किया है। 

शीर्ष पर मिलते हैं। 

ज़िग जिगलर के अनमोल विचार 

“आपके पास जीवन में वह सब कुछ हो सकता है जो आप चाहते हैं यदि आप अन्य लोगों को वह सब कुछ प्राप्त करने में मदद करेंगे जो वे चाहते हैं।” 

  • मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि मेरा पसंदीदा उद्धरण या कहावत क्या है। सच कहूँ तो, सैकड़ों प्रेरक कहावतें हैं जो हममें से प्रत्येक के पास मौजूद अविश्वसनीय क्षमता को स्पष्ट करने में मदद करती हैं। मुझे उम्मीद है कि ये उद्धरण आपको प्रेरित, प्रोत्साहित और प्रेरित करके , आशा प्रदान करेंगे और कभी-कभी मुस्कान भी देंगे। 
  • मुझे विश्वास है कि आप उन्हें व्यावहारिक और किसी संदर्भ में उपयोगी पाएंगे। मुझे आशा है कि वे आपको सोचने पर मजबूर करेंगे, आपको नए विचार देंगे, और आप में और अधिक संभावनाएं निकालेंगे। 
  • मुझे यह भी उम्मीद है कि वे सामूहिक रूप से एक दर्शन को प्रकट करेंगे। अनिवार्य रूप से स्वर्ण नियम की व्याख्या में, यह मेरा सच्चा विश्वास है कि आप जीवन में वह सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं जो आप चाहते हैं यदि आप अन्य लोगों को वह प्राप्त करने में पर्याप्त मदद करेंगे जो वे चाहते हैं। 

महत्वाकांक्षा के बारे में ज़िग जिगलर के अनमोल विचार 

  1. आपका व्यवसाय वास्तव में कभी भी “बाहर” अच्छा या बुरा नहीं होता है। आपका व्यवसाय या तो अच्छा है या बुरा , ठीक आपके दोनों कानों के बीच। 
  2. सफलता का वास्तविक अवसर व्यक्ति के भीतर होता है न कि नौकरी में। 
  3. नीचे की भीड़ से निकलने के बाद शीर्ष पर पहुंचना आसान होता है। 
  4.  सफलता कोई मंजिल नहीं, एक यात्रा है। 
  5. दुनिया में सबसे व्यावहारिक, सुंदर, व्यावहारिक दर्शन काम नहीं करेगा – यदि आप नहीं करेंगे। 
  6. आवश्यक ईंधन है मानव इंजन को चालू रखने के लिएअपने आप को उन चीजों को करने के लिए अनुशासित करें जो आपको करने की आवश्यकता है जब आपको उन्हें करने की आवश्यकता होती है, और वह दिन आएगा जब आप उन चीजों को करने में सक्षम होंगे जो आप करना चाहते हैं जब आप उन्हें करना चाहते हैं! 

महत्वाकांक्षा के बारे में ज़िग जिगलर के अनमोल विचार 

  1. अपनी मंजिल पर पहुंचकर आपको क्या मिलता है, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि आप अपनी मंजिल पर पहुंचकर क्या बन जाएंगे। 
  2. प्रेरणा आपको प्रेरित करती है और आदत आपको वहां ले जाती है। प्रेरणा को एक आदत बनाएं और आप वहां तेजी से पहुंचेंगे और यात्रा में अधिक मजा आएगा। 
  3. मूल लक्ष्य तक पहुँचने का सिद्धांत यह समझना है कि जहाँ तक आप देख सकते हैं आप जाते हैं, और जब आप वहाँ पहुँचते हैं तो आप हमेशा आगे देखने में सक्षम होंगे। 

 आप अकेले हैं जो अपनी क्षमता का उपयोग कर सकते हैं।

  •  यह एक शानदार जिम्मेदारी है। 
  • महत्वाकांक्षा- करुणा, ज्ञान और सत्यनिष्ठा से प्रेरित, अच्छे के लिए एक शक्तिशाली शक्ति है जो उद्योग के पहियों को बदल देगी और आपके और अनगिनत अन्य लोगों के लिए अवसर के द्वार खोल देगी। 
  • यदि हम शुरू नहीं करते हैं, तो यह निश्चित है कि हम कहीं नहीं पहुंच सकते। 
  • जाहिर है, कुछ न करने से आप बहुत कम सीख सकते हैं।

रवैया के बारे में ज़िग जिगलर के अनमोल विचार 

सकारात्मक सोच आपको अपनी क्षमताओं, प्रशिक्षण और अनुभव का उपयोग करने देगी। 

  1. सकारात्मक सोच आपको कुछ करने नहीं देगी, लेकिन यह आपको नकारात्मक सोच से बेहतर सब कुछ करने देगी। 
  2. बदबूदार ‘सोच’ से बचने के लिए हम सभी को गर्दन से ऊपर की ओर दैनिक जांच की आवश्यकता होती है, जो अंततः दृष्टिकोण को सख्त कर देता है। 
  3. आपके साथ क्या होता है यह, यह निर्धारित नहीं करता है कि आप जीवन में कितनी दूर जाएंगे; आपके साथ जो होता है उसे आप किस तरह से हैंडल करते हैं। 
  4. ये दृष्टिकोण बना सकते हैं कि उन स्थितियों के उत्पन्न होने से पहले उनके अनुकूल होने  का रवैया  प्राप्त कर सकते हैं, उनमें से निश्चित रूप से कृतज्ञता का रवैया सबसे महत्वपूर्ण है और अब तक का सबसे अधिक जीवन बदलने वाला है। 
  5. जब आप दूसरों के साथ व्यवहार करने के तरीके में सुखद और सकारात्मक होना चुनते हैं, तो आपने भी चुना है, ज्यादातर मामलों में, दूसरों के द्वारा आपके साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा। 
  6. आप असहमत हुए बिना असहमत हो सकते हैं। 
  7. मुझे अच्छे को ना कहना है ताकि मैं अच्छे को हां कह सकूं। 
  8. प्रतिक्रिया देना सकारात्मक है, प्रतिक्रिया करना नकारात्मक है। 

प्रोत्साहन के बारे में ज़िग जिगलर के अनमोल विचार 

  1. अपने बच्चे के दिन की शुरुआत प्यार और प्रोत्साहन से करें और उसी तरह दिन का अंत करें। 
  2. यदि आप उन्हें पहचानते हैं, दावा करते हैं, विकसित करते हैं और उनका उपयोग करते हैं तो आपके पास सफलता के लिए आवश्यक हर विशेषता पहले से ही है। 
  3. आप इसे एक भटकती हुई व्यापकता नहीं बना सकते। आपको एक सार्थक विशिष्ट बनना चाहिए। 
  4. नकारात्मक दुनिया में सकारात्मक बच्चों की परवरिश करने का सबसे अच्छा तरीका – पिता हैं जो उन्हें बिना शर्त प्यार करते हैं और उत्कृष्ट रोल मॉडल के रूप में सेवा करते हैं। 
  5. आप किसी और को घटिया बना देंगे, लेकिन आप अस्तित्व में सर्वश्रेष्ठ “आप” होंगे। 
  6. किसी और की अगुवाई करने से पहले आपको खुद को मैनेज करना होगा।  
  7. प्रोत्साहन जब हम जिसे प्यार करते हैं उसे कठिनाई हो रही है और हमें बुरा समय दे रहा है, तो इसका कारण तलाशना बेहतर है कार्रवाई की आलोचना करने के बजाय। 

चुप रहने के लिए समय निकालें। 

  1. बाधाएं वे चीजें हैं जो हम देखते हैं जब हम अपने लक्ष्य से हमारी नजर हटा लेते हैं । 
  2. एक माता-पिता अपने बच्चे के लिए सबसे अच्छी बात यह कर सकते हैं कि वह अपने जीवनसाथी से प्यार करे। 
  3. तेरा साथी केवल रोटी से नहीं जीता; उसे समय-समय पर “मक्खन” करने की आवश्यकता होती है। 
  4. अन्य लोग और चीजें आपको अस्थायी रूप से रोक सकती हैं। आप अकेले हैं जो इसे स्थायी रूप से कर सकते हैं। 

मार्गदर्शन के बारे में ज़िग जिगलर के अनमोल विचार 

  1. यदि आप सच्चे हैं, तो प्रशंसा प्रभावी होती है। 
  2. यदि आप निष्ठाहीन हैं, तो यह जोड़-तोड़ है। 
  3. सब कहते हैं कि वे आजाद होना चाहते हैं। ट्रेन को पटरी से उतारो और यह मुफ़्त है-लेकिन यह कहीं नहीं जा सकती। 
  4. कई शादियां बेहतर होंगी यदि पति और पत्नी स्पष्ट रूप से समझ लें कि वे एक ही तरफ हैं। 
  5. आपके पास जो कुछ है उसके लिए जितना अधिक आप कृतज्ञता व्यक्त करेंगे, उतना ही अधिक आपको कृतज्ञता व्यक्त करनी होगी। 
  6. बच्चे वहीं जाते हैं जहां उत्साह होता है। 
  7. वे वहीं रहते हैं जहां प्यार होता है। 
  8. कर्तव्य हमें चीजों को अच्छी तरह से करने के लिए प्रेरित करता है, लेकिन प्यार हमें उन्हें खूबसूरती से करने के लिए मजबूर करता है। 

मार्गदर्शन के बारे में ज़िग जिगलर के अनमोल विचार 

  1. यह स्थिति नहीं है, लेकिन क्या हम महत्वपूर्ण स्थिति पर प्रतिक्रिया (नकारात्मक) या प्रतिक्रिया (सकारात्मक) करते हैं। 
  2. आप राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के बारे में बहुत कुछ नहीं कर सकते हैं लेकिन अपनी व्यक्तिगत अर्थव्यवस्था के बारे में आप बहुत कुछ कर सकते हैं। 
  3. दिशा की कमी, समय की कमी नहीं, समस्या है। 
  4. हम सभी के पास चौबीस घंटे के दिन होते हैं। आप स्कूल खत्म कर सकते हैं, और इसे आसान भी बना सकते हैं – लेकिन आप कभी भी अपनी शिक्षा पूरी नहीं करते हैं, और यह शायद ही कभी आसान होता है। 
  5. अपने जीवनसाथी और बच्चों को सुरक्षित महसूस कराने का सबसे अच्छा तरीका बैंक खातों में बड़ी जमा राशि के साथ नहीं, बल्कि सोच-समझकर जमा राशि के साथ है और “प्रेम खाते” में स्नेह। 
  6. आपके करने से पहले आपको होना चाहिए, और आपके पास होने से पहले करना चाहिए। 

मार्गदर्शन के बारे में ज़िग जिगलर के अनमोल विचार 

  1. हम सभी बेहतर और अधिक स्वेच्छा से प्रदर्शन करते हैं जब हम जानते हैं कि हम वह क्यों कर रहे हैं जो हमें बताया गया है या करने के लिए कहा गया है। 
  2. पैसे से आपको बिस्तर तो मिलेगा, लेकिन रात की अच्छी नींद नहीं, घर नहीं बल्कि घर, साथी लेकिन दोस्त नहीं। 
  3. अधिकांश एक्स-रेटेड फिल्मों को “वयस्क मनोरंजन” के रूप में “परिपक्व वयस्कों” के लिए विज्ञापित किया जाता है, जब वास्तव में वे अपरिपक्व और असुरक्षित लोगों के लिए किशोर मनोरंजन होते हैं। 
  4. तुम पानी में गिरकर नहीं डूबते; तुम तभी डूबोगे जब तुम वहां रहोगे। 
  5. जब आप किसी व्यक्ति को एक दौलत देते हैं तो आप उसे उसकी गरिमा से वंचित करते हैं, और जब आप उसे उसकी गरिमा से वंचित करते हैं तो आप उसका भाग्य लूट लेते हैं। 
  6. याद रखें, आप अधिक पैसा कमा सकते हैं, लेकिन जब समय व्यतीत होता है तो वह हमेशा के लिए चला जाता है। 
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खुशी के बारे में ज़िग जिगलर के अनमोल विचार 

  1. मैं इतना आशावादी हूं कि मैं एक नाव में मोबी डिक के पीछे जाऊंगा और अपने साथ टैटार सॉस ले जाऊंगा। 
  2. यदि हम पर “मूर्खतापूर्ण” होने का आरोप लगाया जाए तो हममें से अधिकांश लोग परेशान होंगे। लेकिन शब्द “मूर्खतापूर्ण” पुराने अंग्रेजी शब्द “सेलिग” से आया है, और इसकी शाब्दिक परिभाषा ” धन्य, खुश, स्वस्थ और समृद्ध होना” है। 
  3. असफलता और अप्रसन्नता का मुख्य कारण व्यापार है अब आप जो चाहते हैं उसके लिए आप सबसे ज्यादा क्या चाहते हैं। 
  4. मददगार रहें, जब आप किसी व्यक्ति को बिना मुस्कान के देखते हैं, तो उसे अपना दें। 

आशा के बारे में ज़िग जिगलर के अनमोल विचार 

  1. हमारे बच्चे भविष्य के लिए हमारी एकमात्र आशा हैं, लेकिन हम उनके वर्तमान और उनके भविष्य के लिए उनकी एकमात्र आशा हैं। 
  2. जब आप विश्वास, आशा और प्यार को एक साथ रखते हैं 
  3. तो आप नकारात्मक दुनिया में सकारात्मक बच्चों की परवरिश कर सकते हैं। 
  4. असफलता एक घटना है, व्यक्ति नहीं। 
  5. बीती रात, कल खत्म हुआ। 
  6. शायद ही कभी, कोई निराशाजनक स्थिति होती है, लेकिन कई लोग ऐसे होते हैं जो कुछ स्थितियों के सामने आशा खो देते हैं। 
  7. आप किसी समस्या का समाधान तब तक नहीं कर सकते जब तक आप यह स्वीकार नहीं करते कि आपके पास एक समस्या है और इसे हल करने की जिम्मेदारी स्वीकार नहीं करते हैं। 
  8. चरित्र आपको बिस्तर से बाहर कर देता है; प्रतिबद्धता आपको कार्रवाई के लिए प्रेरित करती है। विश्वास, आशा और अनुशासन आपको पूरा करने के लिए अनुसरण करने में सक्षम बनाता है। 
  9. एक संतुलित सफलता का द्वार आशा और प्रोत्साहन के आधार पर व्यापक रूप से खुलता है। 

सत्यनिष्ठा चरित्र के बारे में ज़िग जिगलर के अनमोल विचार 

  1. यदि जीवन स्तर आपका प्रमुख उद्देश्य है, 
  2. तो जीवन की गुणवत्ता लगभग कभी नहीं सुधरती है, लेकिन यदि जीवन की गुणवत्ता आपका नंबर एक उद्देश्य है, तो आपके जीवन स्तर में लगभग हमेशा सुधार होता है। 
  3. अगर लोग आपको पसंद करते हैं तो वे आपकी बात सुनेंगे, लेकिन अगर उन्हें आप पर भरोसा है तो वे आपके साथ व्यापार करेंगे। 
  4. क्षमता आपको शीर्ष पर ले जा सकती है, लेकिन आपको वहां बनाए रखने के लिए चरित्र की आवश्यकता होती है। 
  5. किसी व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता उत्कृष्टता के प्रति उसकी प्रतिबद्धता के सीधे अनुपात में होती है, चाहे उसके चुने हुए क्षेत्र का प्रयास कुछ भी हो। 
  6. अपनी सोच सही रखें और आपका व्यवसाय सही रहेगा। 
  7. जब कोई कंपनी या कोई व्यक्ति एक बार समझौता करता है, चाहे वह कीमत या सिद्धांत पर हो, तो अगला समझौता कोने के आसपास होता है। 
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ईमानदारी और चरित्र के बारे में ज़िग जिगलर के अनमोल विचार 

  1. आप नौकरी से क्या करते हैं यह निर्धारित करने वाला कारक है कि आप नौकरी पर कितनी दूर जाएंगे। 
  2. आप अपने प्रयास के क्षेत्र की परवाह किए बिना एक सफल करियर का निर्माण करते हैं, दर्जनों छोटी-छोटी चीजें जो आप नौकरी के दौरान और बाहर करते हैं। 
  3. जब आप अपने आप को निम्नतम स्तर पर व्यक्त करने की स्वतंत्रता का प्रयोग करते हैं, तो आप अंततः उस स्तर पर जीने के लिए स्वयं की निंदा करते हैं। 
  4. ईमानदारी से आपको डरने की कोई बात नहीं है, क्योंकि आपके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है। 
  5. तुम सत्यनिष्ठा के साथ सही काम करोगे, इसलिए तुम्हें कोई दोष नहीं होगा। 
  6. भय और अपराध बोध को दूर करके आप अपना सर्वश्रेष्ठ करने और करने के लिए स्वतंत्र हैं। 
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सत्यनिष्ठा और चरित्र के बारे में ज़िग जिगलर के अनमोल विचार 

  1. जब मैं अपने आप को ठीक से खाने, नैतिक रूप से जीने, नियमित रूप से व्यायाम करने, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से विकसित होने, और अपने शरीर में कोई ड्रग्स या शराब नहीं डालने के लिए अनुशासित करता हूं, तो मैंने खुद को अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने, अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की स्वतंत्रता दी है, और इसके साथ जाने वाले सभी पुरस्कारों को प्राप्त करें। 
  2. जब हम जितना भुगतान करने के लिए काम करते हैं, और उससे अधिक करते हैं, अंततः हम जो करते हैं उसके लिए हमें अधिक भुगतान किया जाएगा। 
  3. आपके मुंह से जो निकलता है वह इस बात से तय होता है कि आपके दिमाग में क्या चल रहा है। 
  4. आप सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं कि पैसे बिना किसी चरित्र के खरीदेंगे, लेकिन आप किसी भी चीज़ को नहीं खरीद सकते हैं, जिसमें कोई भी पैसा नहीं है, जो कि चरित्र, खुशी, मन की शांति, रिश्तों को जीतना, आदि, बिना चरित्र के नहीं है।

सेल्फ़-इमेज/आत्म छवि के बारे में ज़िग जिगलर के अनमोल विचार 

  1. अगर आपको यह पसंद नहीं है कि आप कौन हैं और आप कहां हैं, तो इसके बारे में चिंता न करें क्योंकि आप जो हैं या जहां हैं, उससे आप चिपके नहीं हैं। आप बढ़ सकते हैं। यदि आप ऐसा नहीं करते हैं कि आप कौन हैं और आप कहां हैं, तो इसके बारे में चिंता न करें क्योंकि आप या तो आप कौन हैं या आप कहां हैं, इसके साथ अटक नहीं गए हैं। आप बढ़ सकते हैं। तुम बदल सकते हो। आप जितना हो सकता है उससे अधिक हो सकता है। कुछ लोगों को दोष लगता है जैसे इसके लिए एक इनाम है।
  2. बहुत से लोगों को इस बात का कोई अंदाजा नहीं है कि वे क्या कर सकते हैं क्योंकि उन्हें बताया गया है कि वे क्या नहीं कर सकते।
  3. वे नहीं जानते कि वे क्या चाहते हैं क्योंकि वे नहीं जानते कि उनके लिए क्या उपलब्ध है।
  4. आदमी को उपलब्धि के लिए डिज़ाइन किया गया था, सफलता के लिए इंजीनियर, और संपन्न किया गया था महानता के बीज के साथ।
  5. आप जीतने के लिए पैदा हुए थे, लेकिन आप जिस विजेता के लिए पैदा हुए थे, वह आपको जीतने और जीतने के लिए तैयार करने की योजना बनानी चाहिए। तब और उसके बाद ही आप वैध रूप से जीतने की उम्मीद कर सकते हैं।
  6. जब आपकी छवि में सुधार होता है, तो आपका प्रदर्शन सुधार होता है।

स्व-छवि के बारे में ज़िग जिगलर के अनमोल विचार  

  1. खराब आत्म-छवि का सबसे बड़ा एकल कारण बिना शर्त प्यार की अनुपस्थिति है। 
  2. यह वह नहीं है जो आप जानते हैं, यह वह है जो आप उपयोग करते हैं इससे फर्क पड़ता है। 
  3. सफलता इस बात से नहीं मापी जाती कि आप दूसरों की तुलना में क्या करते हैं, यह इस बात से मापा जाता है कि आप उस क्षमता से क्या करते हैं जो ईश्वर ने आपको दी है। 
  4. इससे पहले कि आप अपनी सोच बदलें, आपको अपने दिमाग में जो चल रहा है उसे बदलना होगा। 
  5. आप वही हैं जो आप हैं और आप जहां हैं, उसके कारण जो आपके दिमाग में चला गया है। आप जो हैं और जहां हैं, उसे अपने दिमाग में बदलने से आप बदल सकते हैं। 
  6. आलोचना से विचलित न हों। याद रखें – कुछ लोगों की सफलता का स्वाद केवल तभी होता है जब वे आपसे काट लेते हैं। 

सफलता के बारे में ज़िग जिगलर के अनमोल विचार 

  1. बहुत से लोग इस बात की योजना बनाने में अधिक समय व्यतीत करते हैं कि नौकरी कैसे प्राप्त करें, उस नौकरी में उत्पादक और सफल कैसे बनें। 
  2. आप सफलता के अवसरों को बढ़ाते हैं जब आप समझते हैं कि आपकी तड़प शक्ति आपकी कमाई की शक्ति से अधिक महत्वपूर्ण है। 
  3. सफलता की कीमत असफलता की कीमत से बहुत कम होती है। 
  4. जब प्रबंधन और श्रम (नियोक्ता और कर्मचारी) दोनों यह समझ लें कि वे सभी एक ही पक्ष में हैं, तो प्रत्येक अधिक समृद्ध होगा। 
  5. जब हम स्पष्ट रूप से समझते हैं कि कोई बेहतर सेक्स या बेहतर दौड़ नहीं है, तो हमने दरवाजा खोला होगा, संचार की और नींव रखी, साथ जीतने वाले संबंधों के निर्माण के लिए। 
  6. हमारे इस वैश्विक दुनिया में सभी लोग। तट का एकमात्र रास्ता पहाड़ी से नीचे है। 

सफलता के बारे में ज़िग जिगलर के अनमोल विचार 

  1. याद रखें कि शीर्ष पर बहुत जगह है – लेकिन बैठने के लिए पर्याप्त नहीं है। 
  2. बेचना अनिवार्य रूप से भावना का हस्तांतरण है। 
  3. यदि आप काफी देर तक पंप करेंगे, काफी कठिन, और उत्साहपूर्वक पर्याप्त, जल्दी या बाद में प्रयास प्रतिफल लाएगा। 
  4. आप सफलता के लिए “कीमत नहीं चुकाते” – आप सफलता के लाभों का आनंद लेते हैं। 
  5. सफलता एक ऐसी चीज है जिसके लिए आप भुगतान नहीं कर सकते। 
  6. आप इसे किस्त योजना पर खरीदते हैं और हर दिन भुगतान करते हैं। 
  7. हमारी सफलता की तलाश में क्षमता महत्वपूर्ण है, लेकिन निर्भरता महत्वपूर्ण है। 

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परमेश्वर की स्थापित वाचा और स्थापित हृदय (The Established Covenant And The Established Heart)

https://www.achhikhabar.com/2017/12/12/zig-ziglar-quotes-in-hindi/

मनः स्थिति बदलिये | Change Your Mindset for Earning

मनः स्थिति बदलिये | Change Your Mindset for Earning

मनः स्थिति बदलिये | Change Your Mindset For Earning: आपको जल्दी ही पैसिव इनकम के बारे में सोचना चाहिये, ताकि आप लंबी छुट्टी लेकर अपने परिवार के साथ खुशियों को मना सकें। सारी बात नज़रिये की है, सोच की है। नज़रिया बदलिये, नज़ारे खुद बदल जाएँगे। नौकरी की बात उस समय ठीक थी, जब भारत गुलाम था, मानसिकता बड़ी, और अच्छी थी, पर संसाधनों की कमी और बन्दिशें इंसान को गुलामी की जंजीरों में जकड़ कर रखे रही।

मनः स्थिति बदलिये| ChangeYour Mindset for Earning
मनः स्थिति बदलिये| ChangeYour Mindset for Earning

मनः स्थिति बदलिये | Change Your Mindset for Earning

दौर, समय, सोच, राय और परिस्थिति में बदलाव होते हैं।

हमने 1960-1970 के बीच जन्में बच्चों की मानसिकता का नौकरी वाले परिवारों में हुया और हमने बहुत हद तक उसमें सफलता भी पायी। परंतु आज अगर आपके घर पर अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर, मुकेश अंबानी, बिल गेट्स, या मोदी जी, जैसी प्रतिभा का धनी बच्चा है, तो उसे नौकरी की सलाह देकर बेमानी नहीं कर रहे हो? नहीं आप ऐसा नहीं करोगे, क्योंकि हालत, बदल गये, सोच बदल गयी, मानसिकता का दायरा बड़ा हो गया।

बच्चों की काबिलियत पर शक हो तो-सुनिये आपके बच्चे के बोल-छोटा बच्चा जान के हमको ना समझना रे।

अगर आज की युवा पीढ़ी 9-5 के नॉकरी वाले सिस्टम को 35 साल के लिये ग्रहण करती है, तो भारत के दुबारा से सोने की चिड़िया बन जाने का सपना मात्र सपना रह जायेगा।

मनः स्थिति बदलिये| ChangeYour Mindset for Earning

मनः स्थिति बदलिये | Change Your Mindset for Earning

मनः स्थिति बदलिये।

आज का युवा 20-50 हज़ार का स्मार्ट फोन लेकर अगर बिना स्मार्ट फोन और लालटेनों में पढ़े लोगों की तरह ही बंधक मानसिकताओं के सहारे अपनी आराम परस्ती की जिंदगी चाहता है, तो संभव है, आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे श्रापित पीढ़ी कहलायेगी।

DON’T UNDERESTIMATE THE POWER OF COMMAN MAN

क्योंकि इतनी संभावनाएँ 2000 सन से पूर्व नहीं थीं और संभवतः 2030-2040 में दुनिया कहाँ से कहाँ पहुंचेगी, इसका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता।

मनः स्थिति बदलिये| ChangeYour Mindset for Earning

कारण- क्यों? मनः स्थिति बदलिये | Change Your Mindset For Earning

मैं तो एक बात कहती हूँ, 25 वर्ष की उम्र में नॉकरी की आस लगाए बैठे हो तो एक बार मेरे इस गणित को समझो मेरे दोस्त, हो सकता है आज ही तुम केवल 2 से 5 वर्ष का काम करके पैसिव इनकम के द्वारा 30 वर्ष की आयु में नॉकरी के लिए नहीं घूमने के लिए विदेश जाना।

पैसे कमाने के लिये मात्र 84000-1,00,000 घंटे हैं; सोच समझ के खर्च करो

  • 25 वर्ष की उम्र  : नॉकरी लगी
  • रोज 9-5 काम के 8-10 घंटे
  • 8 घंटे × 300 दिन साल के, 65 दिनों अवकाश मिला।
  • 60 की उम्र रिटायर, तय
  • सेवा के मात्र 35 वर्ष मिले थे,
  • इस कार्यकाल में कमाये गये पैसों से ही अमीर बनना है|
  • 8×300=2400 घंटे सालाना।
  • 35×2400=84000 घंटे कुल कमाई के घंटे।

अब प्रति घंटे आय आप खुद हिसाब लगाओ?

  •  स्टार्टअप
  • Skill इंडिया
  • वोमेन एम्पॉवरमेंट
  • मेक इन इंडिया
  • गो डिजिटल
  • Youth Empowerment

https://optimalhealth.in/book-summary-of-change-your-habits-change-your-life/

https://youtu.be/uyVSyKUcKWk

25 Hot Communication Tips!

25 Hot Communication Tips!

Whether you are involved in social media or live streaming, you need to become an expert in the essential social skills to survive and pass your competition. This article will focus on 25 Hot Communication Tips, communication techniques and live communication. Whether you use the network for small meetings, conferences, social events, conferences, lunches, trade shows, fundraisers, sports events, or your local commercial room; the primary goal of interacting with people is to meet people who may be doing business together in the future.

25 Hot Communication Tips!
25 Hot Communication Tips!

I have been working with the network throughout my business.

I find it very exciting to meet new people, find common ground and try to communicate. However, I did have times when my networking experience was frustrating and busy. I value my time and I didn’t want to waste it by attending a social event and arriving empty-handed.

The following HOT network tips are designed for you.

After years of trying the network and mistakes, I used the following strategies to make good impressions first, meet the right people, and follow-through. It is important for you to “shine” on social media because you only have a few moments to please the client or hope for the future, so you want to do it right first, all the time. I know that these 25 tips will help you improve your communication skills. If you go to a lot of events, you will polish your skills quickly.

25 Hot Communication Tips!
Types of communication. 25 Hot Communication Tips!

1. I always like to get to the party 10 minutes early.

That gives me time to meet the people in charge, and they often introduce me to other important people before the event begins. It also gives me time to explore the room and start remembering the words.

2. How you dress is important; it helps to create a good first impression.

Clean, unusual business attire is expected to be worn. No sensual clothing ever! Make sure all your zippers are zipped! Polished shoes, clean teeth, fresh air, clean hair, and clean nails. (Don’t underestimate this!)

3. Put your cell phone on vibration!

4. Always walk around the room, and look first.

Scan the room carefully to see who you would like to meet or contact. Remember that others do the same, so stand up straight, smile, and put your best foot forward.

5. When choosing a new person, I always try to talk to the person alone or not.

Go to that person, look up the name tag, and introduce yourself using that person’s name. Always introduce yourself in a fun, friendly way, and always smile. Be warm, honest, and have a sense of humor. Build strong relationships where you can build relationships. During your discussion try to provide information that they can find important. The first impression is important as people are going to form an opinion about you in the first few seconds-so make it count.

6. If someone you have ever met is involved in a conversation, and you would like to get acquainted again, never interrupt.

It is an insult and will not be appreciated. Find someone else right now or walk to an interested person but stay a few feet. If the person sees you and sees that you want to talk to him, show him politely that he will wait until he has finished talking. You may try to join a group that is involved in the discussion, but your approach should be considerate of others in that group. Similarly, if you are in a group and someone else would like to join, bring them in.

7. Some network events supply alcohol.

That would be very tricky! If you drink alcohol, drink in moderation — or less. Drunkenness, slurred speech, alcoholism, vomiting, and inability to stand up to social events are not acceptable behaviors.

25 Hot Communication Tips!
25 Hot Communication Tips!

8. Never speak ill of yourself or your company.

The words you speak must always be honest and sincere.

9. Treat everyone you meet (including your competitors) with respect, dignity, and dignity.

Never participate in any slanderous remarks about another person. Show respect and dignity to your competitors.

10. Be respectful to those who value themselves by listening to them.

That may help you to remember their names. Shake hands in the right way, and look at them kindly, and respectfully.

11. Be careful not to interrupt others when they speak.

Consider and respect other guests’ right to privacy and confidentiality.

12. Respect the expert opinion of others in their field of expertise.

Never belittle or demean any of the guests.

13. Be especially wary of vulgar language, even when others insult or insult you.

Believe me; someone will hear you, and it will cost you a lot of time. The same goes for dirty or colorless jokes.

14. Never discuss private or confidential matters with anyone.

15. Network is time to meet new people and start the process of building relationships.

With that in mind keep in mind that it is not the first place to sell. You should be selling them.

16. Be aware of sexual harassment.

Also, avoid sexually explicit material or images. You may not be invited again, and it may cost you your job. I have seen this happen several times.

17. At some social events, you may be required to enter a name.

If so, wear yours on the right side as often as people come to you shaking hands with your right hand, and their eyes will be directed to the left (right). It just makes it easier for them to read your tag.

18. Understand and accept that you will not click on everyone,

So do not waste your time with people who seem to “reject” you. Pass on to those who show the best behavior.

19. Always carry your business cards and change them after you have established a relationship with someone.

Business cards will soon disappear but bring them no matter what. Today, when people make contacts they immediately connect to the event on LinkedIn or their mobile phone.

20. When you receive a business card from someone, take the time to read it before putting it away.

When you break up, write down the key points behind their card that will help you remember the key points and build up the relationship after the event.

21. Tracking! Follow! Follow!

Attending a social event is just the beginning; now you have to start developing relationships. Maybe you can start by sending them a small thank-you note or note. Just thank them for the politeness they gave us during the event you attended. A thank you “good” card or note is always handwritten unless you have bad handwriting. Of course, you can always send a short email instead. Also, call them soon after and continue to grow the relationship. Never hide people!

22. Remember:

A social event is about meeting people, building relationships, and getting to know each other by sharing information. The most important information you can share is about your business or company.

23. Always have a positive attitude.

People will always remember you’re good enthusiasm. It is human nature to want to associate with the right people. Wrong people are downers and often not accepted at social events.

24. Communication is an ongoing process; it does not end.

If you do it right, professional and personal rewards will be great.

25. DON’T GIVE UP!

https://youtu.be/srn5jgr9TZo

Network and Non-Network Performance, Communication Obstacles, 13 Deadly Sins of Communication

https://youtu.be/hE6I9apUvrk

What Is The Meaning Of Word POWER? 7 Reasons WHY We Need Power

What Is The Meaning Of Word POWER? 7 Reasons WHY We Need Power

What Is The Meaning Of Word POWER? 7 Reasons We WHY Need Power. What is the meaning of POWER to the average person living and working day in and day out? What is the meaning of POWER? Most of us, by human standards, feel powerless in this world. Most influential people in the world have money and most of us do not have the kind of money that creates significant influence. However, if you know the Lord Jesus Christ, power means more to you than you can ever imagine. 

There is much that God can say on this subject. In a recent Bible study, I found a few of those Truths.

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What Is The Meaning Of Word POWER? 7 Reasons WHY We Need Power
  1. He is strong.
  2. Power walking.
  3. Power speech.
  4. Strength training.
  5. The power of prayer.
  6. Energy foods.
  7. Investing in energy.
  8. This world needs energy.
  9. We publish magazines all about the most powerful people in our communities.

What about Power?

  • What would cause a man to spend millions of dollars to get a job that pays $ 400,000.00 a year?
  • The answer is yes.
  • The president of the United States is paid $ 400,000.00 a year, but he spends tens of millions to get elected. He does not want a salary. 

You want Power. 

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What Is The Meaning Of Word POWER? 7 Reasons WHY We Need Power
  • To be the leader of a free world is the position of unparalleled power in terms of worldly conditions in the present. Power, as well as influence, is tempting and man will do too much to possess it.
  • What are the meaning of power to the average person living and working day in and day out?
Optimal Health - 0004e18440bedbf827a94ed9d96600a5 - Optimal Health - Health Is True Wealth.
What Is The Meaning Of Word POWER? 7 Reasons WHY We Need Power-Romans 1:16, “For I am not ashamed of the gospel of Christ: for it is the power of God unto salvation to everyone that believeth; to the Jew first, and also to the Greek.”

 1. The Power of the Gospel of the Christ.

  • Romans 1:16, “For I am not ashamed of the gospel of Christ: for it is the power of God unto salvation to every one that believeth; to the Jew first, and also to the Greek.” It is the power of the gospel that saves a person from sin.

The gospel of Christ has power over sin and death.

  • There is no other power over sin and death, only the gospel of Jesus Christ. It is this same power that gives us the bold language to proclaim His gospel.
  • Acts 1: 8 declares the power of the Apostles, “But you will receive power when the Holy Spirit has come upon you; to the ends of the earth.
  • A powerful world leader may change someone’s economic situation, or he may change his lifestyle or his laws.
  • But, when we share the gospel, we are sharing something that will change their eternity. Also, you do not need to have the ability to speak or be famous to do it! It is the transforming Word of God, not our ability to quote it.
Optimal Health - 5760 - Optimal Health - Health Is True Wealth.
What Is The Meaning Of Word POWER? 7 Reasons WHY We Need Power. Romans 1:16, “For I am not ashamed of the gospel of Christ: for it is the power of God unto salvation to every one that believeth; to the Jew first, and also to the Greek.”

2. God’s Power is Eternal.

  • Romans 1:20, “For His invisible qualities are clearly seen from the world’s creation onward, because they are perceived by the things made, even his eternal power and Godship, so that they are inexcusable.
  • There is no other eternal power.
  • Only God can do that.
  • All other forces will be gone in time.
  • All the kingdoms will run in its path.
  • The king and the president will come in and go.
  • Only God’s power is eternal. That eternal power belongs to us as His children.
  • Remember, this is the same God Who counted all the hairs of your head.
Optimal Health - 28163 1 - Optimal Health - Health Is True Wealth.
What Is The Meaning Of Word POWER? 7 Reasons WHY We Need Power

3. God-given strength.

  • Romans 9: 7, “For the scripture saith unto Pharaoh, Even for this same purpose have I raised thee up, that I might shew my power in thee, and that my name might be declared throughout all the earth.

No one on earth has the power to do this except God-given.

  • To acknowledge that one’s power is from God is to demonstrate genuine humility.
  • Contrary to popular opinion, or at least the world’s view of reality, true power does not exist in money or in the place of man.
  • It is given to God for His purposes.
  • Colossians 2:10 states, “You are complete in Him, who is the head of all principality and power.”
  • Not only is He the Head of Heavenly power, but your Heavenly Father is the Head of all power.
Optimal Health - 4840 - Optimal Health - Health Is True Wealth.
What Is The Meaning Of Word POWER? 7 Reasons WHY We Need Power. Ephesians 3:20, “To Him who can do exceedingly abundantly above all that we ask or think, according to the power that worketh in us.”

4. God’s Power is at work in us.

  • Ephesians 3:20, “To Him who is able to do exceedingly abundantly above all that we ask or think, according to the power that worketh in us.”
  • Imagine the power of God working in me!
  • That power that works within us is the power that raises Jesus Christ from the dead; the same force that creates the earth out of nothing.
  • Do you feel exhausted?
  • Keep reading.
Optimal Health - Ambitions - Optimal Health - Health Is True Wealth.
What Is The Meaning Of Word POWER? 7 Reasons WHY We Need Power. Philippians 3:10, “That I may know him, and the power of his resurrection, and the fellowship of his sufferings, being made conformable unto his death;”

5. God reveals His power.

  • Philippians 3:10, “That I may know him, and the power of his resurrection, and the fellowship of his sufferings, being made conformable unto his death;”
  • Think of it!
  • The very God of the universe invites us to know Him and the power of His resurrection.
  • The power of resurrection is the only thing our living God has accomplished forever.
  • That power is ours to know because he gave us eternal life through his Son.
  • We share in the power of resurrection because that is the power that saves and preserves us.
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What Is The Meaning Of Word POWER? 7 Reasons WHY We Need Power. 2 Timothy 1: 7, “For God hath not given us the spirit of fear; but of power, and love, and of a sound mind.

6. God’s Power is at work in us.

  • 2 Timothy 1: 7, “For God hath not given us the spirit of fear; but of power, and of love, and of a sound mind.
  • This spirit of power, of love and of sound mind is a free gift from God that we do not have to work for.
  • It’s already ours! In today’s world, as mood-enhancing drugs are rampant in our society, I especially appreciate the power of common sense.
  • Only God’s Word can promise power, love, and a sound mind.
Optimal Health - sword of god - Optimal Health - Health Is True Wealth.
Hebrews 4:12, “For the word of God is quick, and powerful, and sharper than any two-edged sword, piercing even to the dividing asunder of soul and spirit, and the joints and marrow, and is a discerner of the thoughts, and the thoughts of the heart. What Is The Meaning Of Word POWER? 7 Reasons We Need Power.

7. God’s Word has the Power to change our lives.

  • Hebrews 4:12, “For the word of God is quick, and powerful, and sharper than any twoedged sword, piercing even to the dividing asunder of soul and spirit, and of the joints and marrow, and is a discerner of the thoughts, and the thoughts of the heart.
  • “It is not the wisdom of man, nor the next book of a beloved author, that will change your life; As we see the forces at work in our world, it is good to remember who the Author of all power is.
  • Jesus said, “All authority in heaven and on earth has been given to me,” Matthew 28:18. We need not feel powerless or doomed to defeat.
  • If we have Jesus Christ, we have all the power we need. Be courageous if you feel weak. As a believer in Jesus Christ and in His atoning blood, He is far from powerless.

शक्ति के 48 नियम: 22-35 | Book Summary Of The 48 Laws Of Power In Hindi By Robert Greene (Part 3)

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शक्ति के 48 नियम: 22-35 | Book Summary Of The 48 Laws Of Power In Hindi By Robert Greene (Part 3)

 कभी भी गुरु शक्ति के 48 नियम: 22-35 | The 48 Laws Of Power In Hindi By Robert Greene, नियम १: से आगे न बढ़ें कानून २: कभी भी दोस्तों पर बहुत अधिक भरोसा न करें; दुश्मनों का इस्तेमाल करना सीखें कानून 3: अपने इरादों को छुपाएं कानून 4: हमेशा जरूरत से कम बोलें।

  • 48 कानूनों को अतीत की महान हस्तियों की रणनीति, विजय और विफलताओं के माध्यम से चित्रित किया गया है, जिन्होंने सत्ता का शिकार किया है – या सत्ता के शिकार हुए हैं। सत्ता के 3,000 वर्षों के इतिहास से तैयार, पाठकों को अपने लिए क्या हासिल करने में मदद करने के लिए यह निश्चित मार्गदर्शिका है।

शक्ति का नियम 22 – जब आप जीत ना सको तो अपना आत्मसमर्पण कर दें,

  • क्यों कि इससे पहले कि आप हार जाएँ आप अपने आत्मसमर्पण से दुश्मन के नजदीक पहुँच पायेंगे और जानकारी प्राप्त कर सकेंगे, आत्मसमर्पण से आपको अपनी ताकत को फिर से जुटाने का एक और मौका मिलेगा और आप दोबारा तैयार हो सकेंगे।
  • LAW 22: वर्ष सुरक्षा प्रधान का उपयोग करें: जब आप कमजोर होते हैं, तो आप को कभी नहीं लड़ना चाहिए, सम्मान के लिए लड़ने के बजाय आत्मसमर्पण चुनें।
  • आत्मसमर्पण आपको फिर से कवर करने का समय देता है, अपने विजेता को पीड़ा और जलन देता है, इंतजार करने का समय देता है।
  • उसे सत मत दो। दूसरे गाल को घुमा कर आप उसे अलग कर सकते हैं और उसे खोल सकते हैं।
  • समर्पण को एक उपकरण शक्ति बनाएं।

उदाहरण –

  • Athenians और Melians जब Melos टापू के लिए लड़ रहे थे तो Melians की ताकत कमजोर पड़ गयी,
  • इस पर Athenians ने Melians को आत्मसमर्पण करने के लिए कहा लेकिन Melians ने अपना आत्मसमर्पण नहीं किया,
  • और लड़ते रहे, अंत में जब उनके जीतने की कोई गुंजाइश नहीं रही तो उन्होंने अपना आत्मसमर्पण कर दिया,
  • इसके बाद Athenians ने सभी Melians सैनिको को मारकर उनकी औरतो और बच्चो को गुलाम बना लिया |
  • यादि वो पहले ही आत्मसमर्पण कर देते तो एसा नहीं होता |

शक्ति का नियम 23 – आपकी शक्तियों के प्रभावी स्तेमाल के लिए जरूरी है कि आप अपनी शक्तियों को केन्द्रित करें,

  • अगर आप केन्द्रित नहीं हैं तो आप अपनी शक्तियों का उचित प्रयोग नहीं कर सकते।
  • LAW 23 अपने अधिकारों को अपने सबसे मजबूत बिंदु पर केंद्रित रखकर अपने बलों और ऊर्जा का संरक्षण करें।
  • आप एक समृद्ध खदान को खोज कर और अधिक गहराई से खनन करते हैं,
  • जबकि एक उथली खदान से दूसरी तीव्रता वाले डी-बीट्स से अलग होकर।
  • जब आप को ऊंचा करने के लिए शक्ति के स्रोतों की तलाश करते हैं, तो एक प्रमुख संरक्षक, जाट गाय को खोजें, जो आपको दूध जोरा आने वाले लंबे समय तक देगा।

उदाहरण –

  • Romans ने जब आसपास के राज्यों पर कब्ज़ा करने की कोशिश की,
  • तो Barbarian जनजाति पर हमला करने के चक्कर में वो अपना राज्य भी हार गए ।
  • अपनी शक्ति को केन्द्रित करने के लिए जरूरी है कि आप अपने विचारों को केन्द्रित करें,
  • जब आपकी सारी शक्ति व् ध्यान एक ही दिशा में लगते हैं तो वहां पर आपकी जीत निश्चित है,
  • और तभी आप अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं ।

शक्ति का नियम 24-कामयाबी के लिए कुशल दरबारी की भूमिका निभाएं,

  • किसी भी कार्य को अप्रत्यक्ष रूप से करने की कला को सीखें।
  • LAW 24 PLAY THE PERFECT COURTIER:
  • दरबारी एक ऐसी दुनिया में पनपते हैं जहां सब कुछ सत्ता और राजनीति निपुणता के इर्द-गिर्द घूमता है।
  • उन्होंने आर्ट, अप्रत्यक्ष रूप से महारत हासिल की है;
  • वह चपटा है, वरिष्ठों को पैदावार देता है, और सबसे तिरछा और शालीन तरीके से दूसरों पर सत्ता का दावा करता है।
  • कानूनों को जानें और लागू करें, दरबार और अदालत में जार आप कैसे उठ सकते हैं इसकी कोई सीमा नहीं है।

उदाहरण-

  • Talleyrand जो फ्रांस के मशहूर राजनीतिज्ञ थे, उन्होंने राजा Nepoleon Bonapart के दरबार में दरबारी और विदेश मंत्री का काम किया था।
  • Talleyrand को Nepoleon ने बहुत कम जिम्मेदारी दी हुई थी, Talleyrand हमेशा Nepoleon को हमेशा अच्छी सलाह देते और उनके हर फैसले को मंजूर करते।

शक्ति का नियम 25 – यदि आप अभी तक कामयाब नहीं हैं और समाज में आपका महत्व नहीं है तो अपने आप को दोवारा तैयार करें |

  • LAW 25 अपने आप को बनाए रखें उन भूमिकाओं को स्वीकार न करें जो समाज आप पर करता है।
  • एक नई पहचान जॉगिंग करके अपने आप को फिर से बनाएं,
  • जो ध्यान आकर्षित करता है और दर्शकों को कभी परेशान नहीं करता है।
  • दूसरों के लिए इसे ठीक करने के बजाय अपनी खुद की छवि के स्वामी बनें।
  • अपने सार्वजनिक इशारों और कार्यों में नाटकीय उपकरणों को शामिल करें,
  • आपकी शक्ति को बढ़ाया जाएगा और आपका चरित्र जीवन से बड़ा प्रतीत होगा।

उदहारण –

  • Aeurore Dupin जो कि एक फ्रांस की महिला थी, जब वह पेरिस गयी तो उसने समाज की सच्चाई का सामना किया, उसने देखा कि महिलाएं घर से बाहर का काम नहीं करतीं थीं, वो केवल घर का काम करती और पुरुष घर से बहार का काम करते थे ।
  • जब पेरिस में उसने अपना लेख एक एडिटर को दिया तो उस एडिटर ने महिला से कहा कि तुम घर का काम करो लेखन और साहित्य तुम्हारे लिए नहीं है।
  • इसके बाद Aeurore Dupin ने लेखक बनने का फैसला किया, और अपने पति और बच्चों को छोड़कर चली गयी ।
  • उसने कड़ी मेहनत की और अपने आप को दोबारा तैयार किया और एक साल बाद अपना उपन्यास George Sand प्रकाशित किया, उसके बाद उस उपन्यास को उस एडिटर ने स्वीकार भी किया।

शक्ति का नियम 26- अपने हाथ हमेशा साफ रखें, याद रहे कि आपके हाथ कभी भी बुरे कामों और गलतियों से ना रंगे जाएं,

  • आप लोगों के सामने शिष्टाचार की मिशाल बनकर रहें,
  • किसी भी कार्य में अपनी भागीदारी को छुपाने के लिए दूसरों को बली का बकरा बनाएं ।
  • LAW 26 अपने हाथों को साफ करें आप नागरिकता और कार्यकुशलता का एक विरोधी होना चाहिए:
  • आपके हाथों को गलतियों और बुरे कामों से कभी नहीं भागना चाहिए।
  • अपनी भागीदारी को छिपाने के लिए बलि का बकरा और बिल्ली के पंजे के रूप में दूसरों का उपयोग करके ऐसी बेदाग उपस्थिति बनाए रखें।

उदहारण-

  • दूसरी शताब्दी का चीन का सबसे शक्तिशाली नेता Tsao, जब एक शहर की घेराबंदी के दौरान अनाज गणना की गलती के कारण अनाज आपूर्ति की कमी हो गई तो लोग अनाज की कमी के लिए उसे ही दोष दे रहे थे।
  • Tsao को लगा यदि इसी तरह चलता रहा तो शहर में उसके खिलाफ दंगे हो सकते हैं।
  • उसने अनाज सप्लाई मुखिया को मदद के बहाने बुलाया और सारा इल्जाम उसके सर रख दिया और उसका सर काट दिया।

Optimal Health

शक्ति के 48 नियम | Book Summary Of The 48 Laws Of Power In Hindi By Robert Greene

शक्ति का नियम 27- लोगों को कुछ ऐसा चाहिए जिस पर वह भरोसा कर सकें,

  • आप उनकी इच्छाओं की कद्र कर भरोसे का केंद्र बने, उनको कुछ नया बताएं जिस पर वह आप पर भरोसा कर सकें।
  • लोगों में अपना विश्वास जगाकर, भारी मात्रा में अपने प्रशंसक बनाएं।
  • व्यापारी, राजनेता और सफल लोग, लोगों में अपना विश्वास जगाकर लोगों को अपना प्रशंसक बनाते हैं,
  • और अधिक प्रशंसक होने की वजह से लोग अधिक शक्तिशाली और कामयाब होते हैं।
  • LAW 27 साल की उम्र में लोगों को किसी चीज पर विश्वास करने के लिए एक पंक्ति बनाने के लिए आवश्यक होने की जरूरत है।
  • इस तरह की इच्छा का केंद्र बिंदु उन्हें एक कारण, एक नई आस्था का पालन करने के लिए बनें।
  • अपने शब्दों को अस्पष्ट रखें, लेकिन वादे से भरा हुआ; तर्कसंगतता और स्पष्ट सोच पर उत्साह पर जोर दें।
  • अपने नए शिष्यों को अनुष्ठान करने के लिए दें, उन्हें अपनी ओर से बलिदान करने के लिए कहें।
  • संगठित धर्म और भव्य कारणों के अभाव में, आपकी नई विश्वास प्रणाली आपको अनकही शक्ति प्रदान करेगी।

शक्ति का नियम 28- LAW 28 BOLDNESS के साथ कार्रवाई:

  • किसी भी कार्य को अपने पूरे आत्मविश्वास और बहादुरी से करें, यदि किसी कार्य को करने का आप में आत्मविश्वास नहीं है तो आपकी हिचकिचाहट उस कार्य में बाधा पैदा कर सकती है।
  • यदि आप कार्रवाई के एक कोर्स के बारे में अनिश्चित हैं, तो इसका प्रयास न करें।
  • आपकी शंकाएँ और झिझक आपके अमल को संक्रमित करेंगे।
  • समयबद्धता खतरनाक है: साहस के साथ प्रवेश करने के लिए बेहतर है।
  • दुस्साहस के माध्यम से आपके द्वारा की जाने वाली कोई भी गलती अधिक दुस्साहस के साथ आसानी से ठीक हो जाती है।
  • हर कोई बोल्ड की प्रशंसा करता है; डरपोक का कोई सम्मान नहीं करता।

शक्ति का नियम 29- LAW 29 अंत के अंत में सभी योजनाएं समाप्त होती हैं।

  • जीवन में कोई भी लक्ष्य हासिल करने के लिए अंत तक पहुंचने की पूरी योजना बनाएं, जब आपके पास कोई लक्ष्य होता है और उसे पूरा करने के लिए यदि आपके पास उसके लिए कोई अंतिम योजना नहीं है, तो तब आप उस लक्ष्य को आसानी से प्राप्त नहीं कर सकते।
  • यदि आपके पास कोई लक्ष्य है तो उसे पाने के लिए अंतिम योजना बनाएं।
  • इसके लिए सभी तरह की योजना बनाएं, सभी संभावित परिणामों, बाधाओं और भाग्य के मोड़ को ध्यान में रखते हुए जो आपकी कड़ी मेहनत को उलट सकता है और दूसरों को गौरव दे सकता है।
  • अंत तक योजना बनाने से आप परिस्थितियों से अभिभूत नहीं होंगे और आपको पता चल जाएगा कि कब रुकना है।
  • भाग्य का मार्गदर्शन करें और आगे की सोचकर भविष्य को निर्धारित करने में मदद करें।

शक्ति का नियम 30- दूसरों को यह दिखाएं कि आपने अपनी उपलब्धियां सरलता से हासिल की हैं।

  • आपका कार्य लोगों को सरल लगना चाहिए लोगों को यह कभी ना बताएं कि आपने सफलता या किसी कार्य को करने के लिए किस तरकीब का इस्तेमाल किया है।
  • यदि लोगों को आपकी तरकीब या चाल पता चलती है तो वह उसका इस्तेमाल आपके खिलाफ कर सकते हैं।
  • LAW 30 अपने कामों को पूरा करें, आपके कार्यों को स्वाभाविक और आसानी से निष्पादित किया जाना चाहिए।
  • सभी शौचालय और अभ्यास जो उनमें जाते हैं, और सभी चालाक चालें भी छिपी होनी चाहिए।
  • जब आप कार्य करते हैं, तो सहजता से कार्य करें, जैसे कि आप बहुत कुछ कर सकते हैं।
  • खुलासा करने के प्रलोभन से बचें कि आप कितनी मेहनत करते हैं-यह केवल सवाल उठाता है।
  • कोई भी आपके गुर नहीं सिखाएगा या वे आपके खिलाफ इस्तेमाल किए जाएंगे।

शक्ति का नियम 31- LAW 31 नियंत्रणों का पालन करें:

  • विकल्पों को नियंत्रित कर दूसरों को अपने पत्ते खेलने पर मजबूर करें, जब आप दूसरों को विकल्प देते हैं तो आप उनका इस्तेमाल अच्छी तरह से कर सकते हैं।
  • इससे आप के प्रतिद्वंदी को लगता है कि वे अपने नियंत्रण में हैं लेकिन वे कठपुतली की तरह आपके नियंत्रण में होते हैं।
  • उन्हें इस तरह के विकल्प दें जिससे आप उन्हें पूरी तरह नियंत्रण में कर उनका फायदा ले सकें।
  • कार्ड के साथ खेलने के लिए दूसरों को प्राप्त करें, आप सबसे अच्छे धोखे हैं जो दूसरे व्यक्ति को एक विकल्प देते प्रतीत होते हैं: आपके पीड़ितों को लगता है कि वे नियंत्रण में हैं, लेकिन वास्तव में आपके कठपुतलियाँ हैं।
  • उन लोगों को विकल्प दें जो आपके पक्ष में आते हैं जो भी वे चुनते हैं।
  • दो बुराइयों के बीच चयन करने के लिए, दोनों आपके उद्देश्य की पूर्ति करते हैं।
  • उन्हें एक दुविधा के सींगों पर रखो: वे जहां भी मुड़ते हैं, वे गोर होते हैं।
  • लोगों को भविष्यवाणियों के बारे में बताएं।

शक्ति का नियम 32- लोगों की कल्पनाओं का इस्तेमाल अपने उद्देश्य पूर्ति के लिए करें।

  • लोगों की कल्पनाएं उनकी आंखों पर पर्दा डाले रखती हैं और वे जीवन में कठोर सच्चाई को नहीं देख पाते।
  • रॉबर्ट ग्रीन कहते हैं कि सकारात्मक बदलाव धीरे-धीरे होता है,
  • जीवन में सफल होने के लिए आपको कड़ी मेहनत, सब्र, अच्छी किस्मत और बलिदान की जरूरत होती है,
  • लेकिन लोग इन बातों को नजरअंदाज कर आसानी से कामयाब होना चाहते हैं।
  • इस तरह के लोग सफलता के लिए कोई न कोई आसान रास्ता खोजते रहते हैं,
  • इसलिए इस तरह के लोगों को आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है।

LAW 32: सत्य को अक्सर इसलिए टाला जाता है क्योंकि यह बदसूरत और अप्रिय है।

  • सत्य और वास्तविकता के लिए कभी भी अपील न करें जब तक कि आप उस क्रोध के लिए तैयार न हों जो मोहभंग से आता है।
  • जीवन इतना कठोर और व्यथित कर देने वाला है कि जो लोग कल्पना का निर्माण कर सकते हैं या कल्पना कर सकते हैं,
  • वे रेगिस्तान में ओलों की तरह हैं: हर कोई उनके लिए झुंड करता है।
  • जनता की कल्पनाओं में दोहन करने की महान शक्ति है।

शक्ति का नियम 33- लोगों की कमजोरी को ढूंढें, जिन पर उनका अधिकार नहीं और उसे लोगों के खिलाफ इस्तेमाल करें।

  • कुछ लोग आसानी अपनी कमजोरी अपने आप बताते हैं,
  • यदि आपको लोगों की कमजोरी के बारे में पता चल जाए तो आप जरूरत पड़ने पर उसका इस्तेमाल कर सकते हैं।
  • LAW 33 DISCOVER EACH MAN’S THUMBSCREW हर किसी की कमजोरी होती है, महल की दीवार में एक खाई।
  • यह कमजोरी आमतौर पर एक असुरक्षा, एक बेकाबू भावना या आवश्यकता है;
  • यह एक छोटा सा गुप्त सुख भी हो सकता है।
  • किसी भी तरह से, एक बार मिला, यह एक अंगूठे है जिसे आप अपने लाभ के लिए बदल सकते हैं।

उदाहरण-

  • 16 वीं शताब्दी के फ्रांस की रानी कैथरीन जो राजा हेनरी की पत्नी थी। वह पुरुषों की कमजोरी को उसके खिलाफ इस्तेमाल करती थी। वह लोगों की संवेदनशीलता और भावुकता का प्रयोग अपने फायदे के लिए करती थी।
  • दूसरों की कमजोरी जानने के लिए आप लोगों से बात करें, उनके बारे में जाने, उन्हें क्या पसंद है क्या नहीं और क्या करता है।
  • उसकी कमजोरी को आप भविष्य में जरुरत पड़ने पर इस्तेमाल कर सकते हैं।

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शक्ति के 48 नियम | Book Summary Of The 48 Laws Of Power In Hindi By Robert Greene

शक्ति का नियम 34- खुद का सम्मान करें और अपनी नजरों में रॉयल बनकर रहें और एक राजा की तरह नजर आए।

  • आप जिस तरह लोगों को दिखेंगे लोग उसी तरह से आप के साथ व्यवहार करेंगे अगर आप साधारण दिखेंगे तो लोग उसी तरह आप से व्यवहार करेंगे।
  • LAW 34 BE ROYAL IN YOUR OWN फैशन एक राजा स्वयं का सम्मान करता है और दूसरों में उसी भावना को प्रेरित करता है।
  • कानूनी रूप से और अपनी शक्तियों में विश्वास करके, आप खुद को मुकुट पहनने के लिए किस्मत में बनाते हैं।

उदाहरण-

  • Orleans के राजा Louis Philippe जो ताज की जगह अपने सिर पर टोपी और छाता लेकर पेरिस की सड़कों पर निकलते थे, उनका व्यवहार एक राजा के लिए उचित नहीं था।
  • जिसके कारण लोगों के मन में उनके खिलाफ सम्मान कम हो गया, दूसरी तरफ , Columbus अमेरिका की खोज करने वाले अपने व्यवहार और साहसी पन के कारण लोगों का दिल जीत लेते थे, बे खुद का सम्मान करते और एक राजा की तरह जीवन जीते थे, वह जहां भी जाते लोग आसानी से उनकी तरफ आकर्षित हो जाते थे।
  • सबसे पहले आप खुद का सम्मान करो और उस पर यकीन करो, आपको जो भी चाहिए उसे पूरे आत्मविश्वास से मांगो बड़े लोगों से संपर्क बनाओ उन्हें तोहफे दो, उन्हें दिखाएं कि आप उनकी बराबरी कर सकते हैं।
  • अगर आप कम मांगोगे तो आपको हमेशा कम ही मिलेगा, किसी भी कार्य के लिए अपनी कीमत ज्यादा रखें।

Optimal Health

शक्ति के 48 नियम | Book Summary Of The 48 Laws Of Power In Hindi By Robert Greene

शक्ति का नियम 35- समय प्रबंधन की कला को सीखे,

  • सही समय पर सही कार्य करें, हमेशा धीरज से कार्य करें, विश्वास से करें,
  • कार्य में जल्दबाजी करने से आप का खुद पर नियंत्रण नहीं होता, हम कार्य तभी करते हैं जब परिस्थिति हमें उस कार्य को करने के लिए मजबूर करती है,
  • परिस्थिति को देखकर सही वक्त पर सही कार्य करें।
    LAW 35 मास्टर ऑफ टाइमिंग कभी भी जल्दी-जल्दी में नहीं लगता है कि खुद पर और समय के साथ ओजे कंट्रोल में कमी हो।
  • हमेशा धैर्य रखें, जैसे कि आप जानते हैं कि अंततः सब कुछ आपके पास आ जाएगा।
  • सही समय पर जासूस बनें; उस समय की भावना को सूँघा, जो रुझान आपको सत्ता तक ले जाएगा।
  • जब समय अभी तक पका नहीं है, और जब यह पहुंच गया है तब जमकर प्रहार करने के लिए खड़े होने के लिए लेट जाएँ।

The 48 Laws Of Power (The Modern Machiavellian Robert Greene, 1) Paperback – 20 November 2000

The 48 Laws of Power Audio CD – Import, 2 April 2007

शक्ति के 48 नियम: 11-21 | Book Summary Of The 48 Laws Of Power In Hindi By Robert Greene (Part 2)

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शक्ति के 48 नियम: 11-21 | Book Summary Of The 48 Laws Of Power In Hindi By Robert Greene

(Part 2)

शक्ति के 48 नियम: 11-21 | Book Summary Of The 48 Laws Of Power In Hindi By Robert Greene (Part 2). बिजली के इतिहास के 3000 साल से तैयार है, इस में पाठकों की सहायता करने के लिए निश्चित गाइड खुद के लिए लक्ष्य को हासिल क्या महारानी एलिजाबेथ, हेनरी किसिंजर, लुई XIV और मैकियावेली मुश्किल तरीके से सीखा है। शक्ति के 48 नियम एक से दस (1-10) नियम के लिये भाग 1 पढ़िये।  शक्ति के 48 नियम: 1-10 | Book Summary Of The 48 Laws Of Power In Hindi By Robert Greene

शक्ति के 48 नियम: 11-21 | Book Summary Of The 48 Laws Of Power In Hindi By Robert Greene
शक्ति के 48 नियम: 11-21 | Book Summary Of The 48 Laws Of Power In Hindi By Robert Greene.

शक्ति का नियम 11- लोगों को अपने ऊपर निर्भर करना सीखें,

  • लोगों को अपने ऊपर निर्भर करके आप लोगों में अपने बजूद व अहमियत को ताकतवर बनायें ।
    LAW 11: LEARN TO KEEP PEOPLE DEPENDENT ON YOU अपनी आज़ादी को बनाए रखने के लिए आपको हमेशा चाहिए और चाहिए।
  • जितना अधिक आप पर निर्भर होते हैं, उतनी अधिक स्वतंत्रता आपके पास होती है।
  • लोगों को अपनी खुशी और समृद्धि के लिए आप पर निर्भर करें और आपको डरने की कोई बात नहीं है।
  • उन्हें कभी इतना न सिखाएं कि वे आपके बिना कर सकें।

उदाहरण-

  • जर्मनी के एक राजनीतिज्ञ और नेता Von Bismark ने एक Federick William नाम का एक कमजोर राजा खोजा जो Prussia का राजा था ।
  • Bismark ने राजा को पूरी तरह अपने ऊपर निर्भर कर लिया, उसने राज्य में अपनी स्थिति को इतना मजबूत बना लिया कि राज्य में उसकी तरह कोई और निर्णय नहीं ले सकता था ।
  • राजा की मृत्यु के बाद राजा का भाई उसकी जगह गद्दी पर बैठा, वह भी अपने सभी मुख्य कार्यो के लिए Bismark पर निर्भर हुआ ।
  • जब आप लोगों को अपने ऊपर निर्भर करना सीख जाते हैं, तो उनके बीच आपकी स्थिति इतनी मजबूत हो जाती है कि लोग आपको नजरअंदाज नहीं कर सकते, आप उनका इस्तेमाल अपने हिसाब से कर सकते हैं|

शक्ति का नियम 12- अपनी ईमानदारी और उदारता से अपने शिकार को बस में करें,

  • अपनी ईमानदारी से लोगों के सुरक्षा कवच को भेदे |
  • LAW 12: अपने चयन की ईमानदार और उदारता का उपयोग करने के लिए अपनी ईमानदारी का उपयोग करें,
  • एक ईमानदार और ईमानदार कदम दर्जनों बेईमानों को कवर करेगा।
  • ईमानदारी और उदारता के खुले दिल के इशारे यहां तक ​​कि सबसे संदिग्ध लोगों के पहरेदार को नीचे लाते हैं।एक बार जब आपकी चयनात्मक ईमानदारी उनके कवच में छेद खोल देती है, तो आप उन्हें धोखा दे सकते हैं और उन्हें अपनी इच्छा से छेड़छाड़ कर सकते हैं।
  • एक समय पर उपहार-एक ट्रोजन घोड़ा-एक ही उद्देश्य की सेवा करेगा।
  • लोग जल्दी ही किसी पर यकीन नहीं करते, अगर आप उन्हें अपनी उदारता और ईमानदारी दिखायेंगे तो आप जैसे चाहें उस तरह उनका इस्तेमाल कर सकते हैं|

शक्ति का नियम 13- जब आप किसी से मदद लेने जाएँ तो उनकी रूचि को ध्यान में रखें,

  • आपको उनके intrest के बारे में पता होना चाहिए कि वो आपसे क्या चाहते हैं ।
  • LAW 13: जब लोगों की मदद के लिए चुने जाने का समय हो, तो उन लोगों के बारे में बताएं, जो कभी मुरी या विदेश में रहते हैं, अगर आपको मदद के लिए सहयोगी बनने की जरूरत है, तो उन्हें अपने पिछले सहयोग और अच्छे कामों की याद दिलाने की जहमत न उठाएं।
  • वह आपको नजरअंदाज करने का तरीका खोज लेगा।
  • इसके बजाय, अपने अनुरोध में, या उसके साथ अपने गठबंधन में कुछ को उजागर करें, जो उसे लाभान्वित करेगा, और इसे सभी अनुपात से बाहर जोर देगा।
  • जब वह अपने लिए कुछ हासिल करता है, तो वह उत्साह से जवाब देगा।
  • यदि आप किसी से मदद लेने जाते हैं तो यह ध्यान रखें कि उन्हें किस चीज की जरूरत है,
  • और कुछ एसा ऑफर करें जिसकी उन्हें उस समय जरूरत हो तो निश्चित ही वो आपकी मदद के लिए तैयार हो जायेंगे,
  • लोग स्वार्थी होते हैं उन्हें मदद के बदले कुछ ना कुछ चाहिए खासकर जब आपको किसी चीज की जरूरत हो |

शक्ति का नियम 14- दोस्त की तरह दिखें और जासूस की तरह काम करें ।

  • LAW 14: एक दोस्त के रूप में, एक प्रतिद्वंद्वी के रूप में काम करता है अपने प्रतिद्वंद्वी के बारे में जानना महत्वपूर्ण है।
  • बहुमूल्य जानकारी इकट्ठा करने के लिए जासूसों का उपयोग करें जो आपको एक कदम आगे रखेगा।
  • बेहतर अभी भी: अपने आप को जासूस खेलते हैं।
  • विनम्र सामाजिक मुठभेड़ों में, जांच के लिए लीक।
  • लोगों से उनकी कमजोरियों और इरादों को प्रकट करने के लिए अप्रत्यक्ष प्रश्न पूछें।
  • ऐसा कोई अवसर नहीं है जो कला जुल जासूसी का अवसर नहीं है।

उदाहरण-

  • Charies Maurice जो कि फ्रांस के महान राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ थे, वे अपने विचार कभी भी किसी को नहीं बताते थे ।
  • वो सभी को अपने विचार प्रकट करने का मौका हमेशा देते थे, जिससे कि वो लोगों की योजनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकें, वो अपने विचार और योजनाओं को छुपाने में माहिर थे ।
  • Charies Maurice दूसरों से जानकारी प्राप्त करने के लिए लोगों से इस तरह से बातें करते थे, जिससे लोगों को लगता था कि वो उन्हें कोई राज बता रहे हैं, इस तरकीब से लोग उन्हें अपनी जानकारी बताने के लिए उत्सुक हो जाते थे |

शक्ति का नियम 15- अपने दुश्मन को पूरी तरह से खत्म कर दें,

  • कौटिल्य से अनुसार अपने दुश्मन को कभी कमजोर समझकर नजरंदाज मत करें, दुश्मन के अवशेष बीमारी और आग की तरह होते हैं जो समय के साथ साथ और भी खतरनाक बन जाता है|
  • LAW 15 अपने देश को पूरी तरह से तैयार करें, क्योंकि सभी महान नेता मूसा को जानते हैं कि एक भयभीत दुश्मन को पूरी तरह से कुचल दिया जाना चाहिए।
  • कभी-कभी उन्होंने इसे कठिन तरीके से सीखा है।
  • अगर एक अंगारे को छोड़ दिया जाता है, तो चाहे वह कितना भी मंद क्यों न हो, आग अंततः नष्ट हो जाएगी।
  • कुल विनाश से आधे रास्ते को रोकने के माध्यम से अधिक खो गया है: दुश्मन ठीक हो जाएगा, और बदला लेना चाहेगा।
  • न केवल शरीर में बल्कि आत्मा में भी उसे कुचल दें।
  • यहाँ पर आपका असली दुश्मन आपकी परिस्थितियों से है, आपकी परिस्थितियां चाहे कैसी भी हो आप हमेशा उन पर हावी रहें|
  • आप चाहे कहीं भी काम करते हों, अपने कार्यक्षेत्र में हमेशा हमेशा अपनी परिस्थितियों से आगे रहें, जिससे कि आप अपने साथ काम करने वाले लोगों को मात दे सकें |
शक्ति के 48 नियम: 11-21 | Book Summary Of The 48 Laws Of Power In Hindi By Robert Greene.
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शक्ति का नियम 16- अपना आदर और प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए अपनी अनुपस्थि का प्रयोग करें ।

  • अगर आप आसानी से हर जगह लोगों के लिए उपलब्ध हो जाते हैं तो यह लोगों में आपके प्रति सम्मान कम करता है,
  • और उन्हें आपकी कमी महसूस नहीं होती ।
  • LAW 16 USE ABSENCE TO INCREASE RESPECT AND HONOR बहुत ज्यादा सर्कुलेशन के कारण कीमत में गिरावट आती है:
  • जितना अधिक आप देखे और सुने जाते हैं, उतने ही सामान्य दिखाई देते हैं।
  • यदि आप पहले से ही एक समूह में स्थापित हैं,
  • तो इससे अस्थाई निकासी आपको अधिक चर्चा में लाएगी, यहां तक ​​कि अधिक प्रशंसा भी।
  • आपको सीखना चाहिए कि कब छोड़ना है। कमी के माध्यम से मूल्य बनाएँ।

उदहारण-

  • जब Mademe Guillelma जितना अधिक अपने प्रेमी के लिए उपलब्ध रहती,
  • और आगे बढती तो उतनी ही अधिक साधारण लगती,
  • जब उसने अपने प्रेमी से मिलने के लिए मना कर दिया, तब उसके प्रेमी को उसकी कमी का अहसास हुआ,
  • उसके बाद वह उसकी दिल से प्रशंसा करने लगा और उसे बापस लाने के बारे में सोचने लगा ।
  • इसलिए लोगों के बीच अपनी प्रतिष्ठा बढाने के लिए अपनी अनुपस्थि का प्रयोग कीजिये |

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शक्ति के 48 नियम | Book Summary Of The 48 Laws Of Power In Hindi By Robert Greene

शक्ति का नियम 17- अपने आप को अप्रत्याशित बनाएं जिससे कि लोग आपके व्यवहार का फायदा ना उठा पायें,

  • जब लोग आपके व्यवहार से परिचित होते हैं और उन्हें पता होता है कि आप क्या करने वाले हैं तो वे अपनी चाल चल देते हैं ।
  • LAW 17 यात्रियों की संख्या में वृद्धि हुई है: मनुष्यों का निजी एयर इंडिया एक आदत है,
  • जिसे एक अतुलनीय आवश्यकता के साथ अन्य लोगों के धर्मों में परिचित देखने की आवश्यकता है।
  • आपकी पूर्व आहार क्षमता उन्हें नियंत्रण की भावना देती है।
  • तालिकाओं को जूम करें: जानबूझकर अप्रत्याशित हो। ऐसा लगता है कि व्यवहार में कोई निरंतरता या उद्देश्य नहीं है, जो उन्हें संतुलन बनाए रखेगा, और वे आपकी चालों को समझाने का प्रयास करेंगे। एक चरम पर ले जाया गया, यह रणनीति भयभीत और आतंकित कर सकती है।

उदाहरण-

  • जब Picaso एक मशहूर आर्टिस्ट बन गए थे, तब वो एक अमेरिकन संगीतकार Paul के साथ काम कर रहे थे।
  • जब एक दिन अचानक उन्होंने Paul के साथ काम करने से मना कर दिया जिसे Paul को जरा सा भी अंदाजा नहीं था, तो Paul ने Picaso को ज्यादा पैसे देने का फैसला किया |
  • जब लोग आपकी आदतों और व्यवहार से परिचित हो जाते हैं तो वे उसका फायदा उठाते हैं, और आपके खिलाफ षड़यंत्र बना सकते हैं, लेकिन जब आप अपने आपको अप्रत्याशित बना लेते हैं, कभी भी अप्रत्याशित कदम उठाते हैं, जिसकी लोगों को उम्मीद नहीं होती तो लोग आपके खिलाफ कोई षड़यंत्र नहीं बना सकते क्यों कि वो उसके लिए तैयार नहीं होते |

शक्ति का नियम 18- अपने बचाव के लिए अलगाव खतरनाक है,

  • जब आप दोस्तों और घर परिवार से अलग होते हैं तो आपको धोका देना उतना ही आसान है इसलिए अपने बचाव के लिए किले ना बनाएं ।
  • LAW 18 अपने आप को साबित करने के लिए निर्माण न करें- अलगाव खतरनाक है दुनिया खतरनाक है, और दुश्मन हर जगह हैं-हर किसी को अपनी रक्षा करनी होगी।
  • एक किला सबसे सुरक्षित लगता है। लेकिन अलगाव आपको अधिक खतरों से बचाता है क्योंकि यह आपकी रक्षा करता है, यह आपको निर्माण में मूल्यवान से काट देता है, यह आपको विशिष्ट और आसान लक्ष्य बनाता है।
  • लोगों के बीच घूमना, सहयोगियों को ढूंढना बेहतर है। आपको भीड़ द्वारा अपने दुश्मनों से बचा लिया जाता है।

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शक्ति के 48 नियम | Book Summary Of The 48 Laws Of Power In Hindi By Robert Greene

शक्ति का नियम 19 जब आप दोस्त और परिवार के साथ रहते हैं तो आप अपने दुश्मन से बचे रहते हैं,

  • और आपको सभी जरूरी आवश्यक सूचनाएं मिलती रहती हैं,
  • आपके अलग रहने से आपके लिए खतरा और भी बढ़ जाता है, दुश्मन की उपस्थिति हर जगह है ।
  • LAW 19 पता है कि आप गलत लोगों के साथ व्यवहार नहीं करते हैं, दुनिया में कई अलग-अलग प्रकार के लोग हैं, और आप कभी भी यह नहीं मान सकते हैं कि हर कोई आपकी रणनीतियों पर उसी तरह से प्रतिक्रिया देगा।
  • कुछ लोगों को धोखा देना या उन्हें छोड़ देना और वे अपना शेष जीवन बदला लेने के लिए बिताएंगे।
  • वे भेड़ के बच्चे के कपड़ों में भेड़िये हैं।
  • अपने पीड़ितों और विरोधियों को सावधानी से चुनें, फिर कभी गलत व्यक्ति को अपमानित या धोखा न दें।

शक्ति का नियम 20- कभी भी किसी से पक्का वायदा या कमिटमेंट ना करें,

  • यदि आप एसा करते हैं तो आपका नियंत्रण किसी और के हाथ में चला जाता है और आप उस कार्य को करने के लिए प्रतिवद्ध हो जाते हैं, इससे आपकी छवि हल्की होती है।
  • आपको अपनी छवि इस तरह बनानी चाहिए कि लोग आपसे संपर्क करने की कोशिस करें ।
    LAW 20 किसी की भी अवमानना ​​न करें यह वह जूल है जो हमेशा पक्ष लेने के लिए भागता है।
  • किसी भी पक्ष या कारण के लिए प्रतिबद्ध न हों बल्कि स्वयं।अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए, आप एक-दूसरे के खिलाफ खेलने वाले लोगों के स्वामी बन जाते हैं, जिससे वे आपका पीछा करते हैं।

उदाहारण –

  • Alcibiades जो एक ग्रीक का प्रभावी योद्धा और राजनेता था, लोग उससे बहुत प्रभावित थे, उसने किसी को कमिटमेंट ना देकर सभी को प्रभावित किया हुआ था, इसलिए Athenians और Spartans उसका ख़ास ध्यान रखते थे क्यों कि सभी Persianians उससे बहुत ही प्रभावित थे तथा उसका आदर करते थे।
  • किसी से कमिटमेंट का मतलब है खुद को दूसरे के हवाले कर देना, इस तरह से आपका खुद पर नियंत्रण कम हो जाता है और आपका कर्तव्य बढ़ जाता है, इसलिए मजबूत छवि बनाने के लिए आपको जरूरी है कि आप किसी से पक्का वायदा ना करें, और खुद की एक मजबूत छबि बनाएं।

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शक्ति के 48 नियम | Book Summary Of The 48 Laws Of Power In Hindi By Robert Greene

शक्ति का नियम 21- अपने प्रतियोगी को हमेशा अपने से अधिक होशियार समझने का मौका दें,

  • और उसके सामने मूर्ख दिखने का ढोंग रचाएं, यदि एक बार उसे यकीन हो गया कि वो आपसे अधिक बुद्धिमान और शक्तिशाली है तो उसे कभी नहीं लगेगा कि आपके कोई उद्देश्य भी हो सकते हैं ।
  • LAW 21 PLAY A SUCKER TO CATCH A SUCKER-SEEM DUMBER THAN YOUR MARK
  • किसी को भी अगले व्यक्ति की तुलना में Jeeling stupider पसंद नहीं है।
  • चाल, तो, अपने पीड़ितों को स्मार्ट बनाने के लिए है-और सिर्फ स्मार्ट नहीं है, लेकिन आप की तुलना में होशियार हैं।
  • एक बार ओजे को यह समझाने के बाद, उन्हें कभी संदेह नहीं होगा कि आपके पास उल्टे उद्देश्य हो सकते हैं।
  • उसे हमेशा ये दिखाएँ कि आप कुछ नहीं जानते, उनके सामने वेबकूफ बनकर रहने से लोग आपको अपने बारे में खुद बताएँगे, और उन्हें आपकी शक्ति और उद्देश्य के बारे में पता नहीं चलेगा |
  • जब आप लोगों को महशूस करायेगें कि वो आपसे अधिक शक्तिशाली हैं तो इससे आप आसानी से उनके सुरक्षा कवच को तोड़ सकेंगे, और आपको जरूरी जानकारी हांसिल हो सकेगी |

48 कानूनों को अतीत की महान हस्तियों की रणनीति, विजय और विफलताओं के माध्यम से चित्रित किया गया है, जिन्होंने सत्ता का शिकार किया है – या सत्ता के शिकार हुए हैं। सत्ता के 3,000 वर्षों के इतिहास से तैयार, पाठकों को अपने लिए क्या हासिल करने में मदद करने के लिए यह निश्चित मार्गदर्शिका है। 

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https://www.youtube.com/watch?v=u1p4o96Xzak

https://yeshuafoundation.in/

The Power of Goal Setting – Be a S.M.A.R.T | Goal Setting: 5 Important Steps!

The Power of Goal Setting – Be a S.M.A.R.T | Goal Setting: 5 Important Steps!

The Power of Goal Setting – Be a S.M.A.R.T | Goal Setting: 5 Important Steps! How can a person continue, in a way, to better address his personal needs, priorities, goals, ideas, etc., unless/until prioritize, and learn, effectively, apply the processes involved, in setting a purposeful goal?

Choose Your Real Goals
The Power of Goal Setting - Be a S.M.A.R.T | Goal Setting: 5 Important Steps!
The Power of Goal Setting – Be a S.M.A.R.T | Goal Setting: 5 Important Steps!

Choose Your Real Goals

When was the last time, you took the time, and/or, made a concerted effort, to give yourself, the whole, the real, the exploration, from the neck – up, so that, better, understand, what makes you mark, and what you really want, besides life?

A lot of people say they have personal goals, but, far, few – really, really, they go through the necessary and necessary processes, make a complete review, and create your own goals, and your desires! With that in mind, this article will try, briefly, to consider, evaluate, review, and discuss 5 important steps, in setting personal goals.

The Power of Goal Setting - Be a S.M.A.R.T | Goal Setting: 5 Important Steps!
The Power of Goal Setting – Be a S.M.A.R.T | Goal Setting: 5 Important Steps!

1. Examine-up, from the neck-up:

  • Self-examination, from the neck – up, should be more than some kind of empty speech, or clever phrase!
  • However, it requires real commitment to the process, valuable discipline, and a genuine desire to know, and better understand, what you want, want, choose, and priorities, your goals and desires, and a set of personal reasons!

2. Personal strengths and weaknesses:

  • Are you ready, willing, and able, honest, to yourself, and obviously, to identify, both, your own strengths, and weaknesses?
  • This is important, so you can make better use of all your energy, while creating a personal strategy, managing vulnerable areas, and minimising impacts, etc!
  • Does that not make sense, is this an important part of a meaningful personal goal setting?

3. Your priorities (and why?):

  • Why do you set priorities?
  • Do they really matter to you, or do you want them to, because, most people, they do?
  • Remember, as with most other things, there is no such thing as, one size – equal – all, when it comes to personal priorities, and true happiness / satisfaction, etc.

4. How important are your goals ?:

  • What do you wish to achieve, as a result of your goals, and your aspirations?
  • How did you put these, some, and why?
  • Seek to customise all objectives, and do so, in as much detail, as possible!

5. Are you ready, willing, persistent, and committed ?:

  • There are, of course, a few obstacles, and, even if, you turn these into challenges, or see them as problems, in general, that determine how you handle them!
  • If you hope to use your goals effectively, and in a meaningful way, you should be ready, determined, and able to be consistent, persistent, and committed to the best you can be!

Applying goal setting is an important factor, in increasing your personal growth, and using self-help! Are you ready for work?

Read More: 5 Reasons Why Goal Setting Is Important To Succeed? 

We often hear, individuals, speak, set goals, and appropriately, apply them, for the better, etc., but, more often than not, we fail to pay enough attention to how to decide, reason, evaluate, understand, and choose real goals!

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The Power of Goal Setting – Be a S.M.A.R.T | Goal Setting: 5 Important Steps!

How Can You Choose Your Real Goals?

  • After more than forty years of involvement, in various fields, related to personal development, and improvement/success, from mentoring, training, and showing real thousands, and/or, potential leaders, too, driving thousands of people I have come to the conclusion that it is not just this process, is important and important, but, in general, it makes a difference, between being our own best, against, resolving, so far!
  • With that in mind, this article will try to summaries, briefly, consider, evaluate, review, and discuss, using the concept of memory, what this means and what it represents, and why it is important.

1. Guidance; guide; great; real; goal – preparation:

  • One of the most important reasons, quality, goal-setting, is that, when done, completely, it provides sound, personal guidance, which should guide us, on our best, forward path!
  • If, we wish, that, indeed, great, we would take this action, seriously, and move on, wisely, etc., and further, going forward!

2. Open your mind; options; opportunities; real; prepare:

  • Our best performance comes continuously, we are open-minded, and we consider the options available, and alternatives, to the effort, to improve our overall performance, happiness, etc.
  • This process explores a variety of different options and approaches, seeks out practical opportunities, and makes the most of it, and, instead of trying to be, like everyone else, wants to be, the best, first, person, possible,!

3. Attitude; fitness; actions; Attention:

  • In order to be, the best we can be, it requires, requires, continuity, truth, good, what we can do, attitude, combined with discipline, and commitment, learning, and acquisition, skill – set, and quality, fitness, development, our opportunities!
  • When we pay, we pay more attention, and we focus on self-improvement, and our opportunities, opportunities, improve, amazingly!

4. Love/love; listen; read; courses; Level – thematic:

  • Level – thematic, thinking, needs to be based on success, listening, and, consistently, in learning, in all conversations, and knowledge, in order to gain expertise, judgement, and, hopefully, true wisdom!
  • There we see these, as living lessons, help us, by setting very meaningful, personal goals!

5. Strengthen; it is powerful; stable; solutions; services:

  • Our experience, when used, effectively, strengthens, and empowers us.
  • We have to consider the options, in both cases, in a fair and continuous manner, so we consider, and choose, those solutions, which are the best services, our favourites, and the best!
  • Set Goals, use quality, goal – set, and strive, to achieve your best! Only you can decide, by giving yourself a check – up, from the neck – up, and being, obviously – considering, your best way, to follow it!
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The Power of Goal Setting – Be a S.M.A.R.T | Goal Setting: 5 Important Steps!

The Power of Goal Setting – Be a S.M.A.R.T

  • One of the most common complaints many people have about setting goals is that they are too busy to find time for themselves.
  • We become so absorbed in our work that we become responsible for our own family that we spend little time on personal pursuits of any kind.
  • All of these points are valid but if you are going to live a successful life you should learn to use situations that you think are obstacles as motivation and not as excuses.
  • As a family, we have our individual goals, we have family goals and business goals. And they are sent inside our home so we can keep track.

At first, it was difficult to share our personal goals.

  • I think it was very much related to the fear of not achieving the goal because now others know your goals and can hold you accountable.
  • It feels good to be together as a family and to set goals and to have more fun when you reach those goals.
  • If your goal is not important to you or it is not something you deeply desire, you will probably not reach it.
  • On the other hand, if your goal says it all to you, there is no reason in the world to stop you from achieving your goals. Setting a goal should be fun, enjoyable and S.M.A.R.T.

Specific

  • Many people have promotions, promotions, improve relationships, and so on, but these are vague goals. To clarify, you need to enter full details of your terms.
  • Write down something like, “I will be promoted to President of my company by (date)” “I will run 5k an hour” or “I will increase my relationship with my spouse by going on a daily basis every week.”
  • Enter the name, position, value, date and everything else needed to train your mind to start working on that goal.

It is measurable

  • Goals need to be measured so that you can keep track of how well you are doing.
  • For your business or career, you can include certain details such as the number of hours you work, the amount you earn, the employees you manage, etc.
  • For the goal of earning more money, you can enter information like value, you want to earn, save or the number of assets and investments you want to earn.
  • You always have important points and scales to understand how close you are to achieving your goals.

Affordable VS Real

  • It is OK to set goals that are not easy outside of your comfort zone.

Resources

  • Make sure you set goals that you can achieve within a certain amount of time, as long as you have current resources and resources.
  • Some goals can be achieved faster compared to others if you have the right tools and strategies already in place.
  • Always work out a strategy for bigger goals.

Time Limit

  • Set “health lines” to reach your goals. We do not like the word deadline, we prefer the “line of life”.
  • Stay clear when setting timelines and schedules.
  • For example, show things like “Spending at least 1 hour uninterrupted talking positively with my spouse every day from tomorrow (show exact date)”.
  • Setting a specific time and date will encourage you to start working on your goals, instead of procrastinating and procrastinating.
  • Some goals can take years to achieve, so it is wise to break them down into smaller, interdependent steps.

Use these strategies and watch you achieve your goals easily. You have to achieve your goals so always remember to be a S.M.A.R.T while doing it.

Goal Setting For Weight Management

https://youtu.be/dFkc6Z7mOow

https://youtu.be/Cm0CWN55GiI

1. How Can You Choose Your Real Goals?

1. Guidance; guide; great; real; goal – preparation
2. Open your mind; options; opportunities; real; prepare
3. Attitude; fitness; actions; Attention

2. What is The Power of Goal Setting?

At first, it was difficult to share our personal goals.
I think it was very much related to the fear of not achieving the goal because now others know your goals and can hold you accountable.

3. What is the meaning of ‘S.M.A.R.T Goal’

On the other hand, if your goal says it all to you, there is no reason in the world to stop you from achieving your goals. Setting a goal should be fun, enjoyable and S.M.A.R.T.

4. What is the Full form of S.M.A.R.T.?

Specific, Measurable, Affordable, Resources, Time