MUKTI DILAYE YEESHU NAAM

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MUKTI DILAYE YEESHU NAAM

MUKTI DILAYE YEESHU NAAM, SHANTI DILAYE YEESHU NAAM (2)

(1) CHARANI MEN TUNE JANAM LIYA YEESHU (2)

SOOLU PE KIYA VISHRAM (2)

MUKTI DILAYE YEESHU NAAM, SHANTI DILAYE YEESHU NAAM (2)

(2) YEESHU DAYA KA BAHTA SAGAR (2)

YEESHU HAI DAATA MAHAAN (2)

MUKTI…!

(3) HAM SAB KE PAPON KO MITANE (2)

YEESHU HUA BALIDAAN (2) 

MUKTI…!

(4) KROOS PAR APNA KHOON BAHAAYA (2)

SAARA CHUKAYA DAAM (2)

MUKTI…!

(5) HAM PAR BHI YEESHU KRIPA KARNA (2)

HAM HAIN PAAPI NAADAN (2) 

MUKTI…!

हिंदी मसीही गीत | HINDI CHRISTIAN SONG | MUKTI DILAYE YEESHU NAAM | मुक्ति दिलाये यीशु नाम | LYRICS

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PARAM PITA KI HAM STUTI GAAYEN SONG WITH LYRICS 

भजन संहिता 32

1 क्या ही धन्य है वह जिसका अपराध क्षमा किया गया, और जिसका पाप ढ़ाँपा गया हो।
भजन संहिता 32:1

2 क्या ही धन्य है वह मनुष्य जिसके अधर्म का यहोवा लेखा न ले, और जिसकी आत्मा में कपट न हो॥
भजन संहिता 32:2

3 जब मैं चुप रहा तब दिन भर कराहते कराहते मेरी हडि्डयां पिघल गई।
भजन संहिता 32:3

4 क्योंकि रात दिन मैं तेरे हाथ के नीचे दबा रहा; और मेरी तरावट धूप काल की सी झुर्राहट बनती गई॥
भजन संहिता 32:4

5 जब मैं ने अपना पाप तुझ पर प्रगट किया और अपना अधर्म न छिपाया, और कहा, मैं यहोवा के साम्हने अपने अपराधों को मान लूंगा; तब तू ने मेरे अधर्म और पाप को क्षमा कर दिया॥
भजन संहिता 32:5

6 इस कारण हर एक भक्त तुझ से ऐसे समय में प्रार्थना करे जब कि तू मिल सकता है। निश्चय जब जल की बड़ी बाढ़ आए तौभी उस भक्त के पास न पहुंचेगी।
भजन संहिता 32:6

7 तू मेरे छिपने का स्थान है; तू संकट से मेरी रक्षा करेगा; तू मुझे चारों ओर से छुटकारे के गीतों से घेर लेगा॥
भजन संहिता 32:7

8 मैं तुझे बुद्धि दूंगा, और जिस मार्ग में तुझे चलना होगा उस में तेरी अगुवाई करूंगा; मैं तुझ पर कृपा दृष्टि रखूंगा और सम्मत्ति दिया करूंगा।
भजन संहिता 32:8

9 तुम घोड़े और खच्चर के समान न बनो जो समझ नहीं रखते, उनकी उमंग लगाम और बाग से रोकनी पड़ती है, नहीं तो वे तेरे वश में नहीं आने के॥
भजन संहिता 32:9

10 दुष्ट को तो बहुत पीड़ा होगी; परन्तु जो यहोवा पर भरोसा रखता है वह करूणा से घिरा रहेगा।
भजन संहिता 32:10

11 हे धर्मियों यहोवा के कारण आनन्दित और मगन हो, और हे सब सीधे मन वालों आनन्द से जयजयकार करो!
भजन संहिता 32:11

Psalms 32

1 To David himself, understanding. Blessed are they whose iniquities are forgiven, and whose sins are covered.
Psalms 32:1

2 Blessed is the man to whom the Lord hath not imputed sin, and in whose spirit there is no guile.
Psalms 32:2

3 Because I was silent my bones grew old; whilst I cried out all the day long.
Psalms 32:3

4 For day and night thy hand was heavy upon me: I am turned in my anguish, whilst the thorn is fastened.
Psalms 32:4

5 I have acknowledged my sin to thee, and my injustice I have not concealed. I said I will confess against myself my injustice to the Lord: and thou hast forgiven the wickedness of my sin.
Psalms 32:5

6 For this shall every one that is holy pray to thee in a seasonable time. And yet in a flood of many waters, they shall not come nigh unto him.
Psalms 32:6

7 Thou art my refuge from the trouble which hath encompassed me: my joy, deliver me from them that surround me.
Psalms 32:7

8 I will give thee understanding, and I will instruct thee in this way, in which thou shalt go: I will fix my eyes upon thee.
Psalms 32:8

9 Do not become like the horse and the mule, who have no understanding. With bit and bridle bind fast their jaws, who come not near unto thee.
Psalms 32:9

10 Many are the scourges of the sinner, but mercy shall encompass him that hopeth in the Lord.
Psalms 32:10

11 Be glad in the Lord and rejoice, ye just, and glory, all ye right of heart.
Psalms 32:11

https://youtu.be/Iyp4lBOylt4