Ayurveda आयुर्वेद (आयुर्वेद = आयुः + वेद = आयुर्वेद) (Ayurveda = age + Veda = Ayurveda) 

Ayurveda, आयुर्वेद (आयुर्वेद = आयुः + वेद = आयुर्वेद), जीवन (आयु) और विज्ञान (वेद) का संयोग है। यह एक प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति है जिसे लगभग 5000 वर्ष से अधिक का समय हो गया है। आयुर्वेद शरीर, मन और आत्मा के संतुलन को बनाए रखने के लिए विभिन्न प्रकार के उपचार, आहार, ध्यान, योग, ज्योतिष आदि का उपयोग करता है।

आयुर्वेद के मूल दर्शन के अनुसार, स्वास्थ्य सम्पूर्णता और आरोग्य एक संतुलित जीवन शैली के परिणामस्वरूप होता है। यह मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा के संतुलन को बढ़ावा देता है और रोगों की प्राकृतिक रूप से उत्पत्ति को रोकने और उन्हें ठीक करने के लिए विभिन्न उपाय प्रदान करता है।

Ayurveda आयुर्वेद (आयुर्वेद = आयुः + वेद = आयुर्वेद) (Ayurveda = age + Veda = Ayurveda) 
Ayurveda आयुर्वेद (आयुर्वेद = आयुः + वेद = आयुर्वेद) (Ayurveda = age + Veda = Ayurveda) 

आयुर्वेद में शरीर के त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) को महत्वपूर्ण माना जाता है, और यह विभिन्न रोगों और समस्याओं के पीछे के कारणों की गुणवत्ता को विश्लेषण करता है। इसके अनुसार, शरीर में दोषों के संतुलन के लिए उपायों का उपयोग किया जाता है, जैसे कि आहार, जीवनशैली की समायोजन, औषधि, मसाज, प्राकृतिक उपचार आदि।

आयुर्वेद एक होलिस्टिक (पूर्णतावादी) दृष्टिकोण धारण करता है, जिसका मतलब है कि यह शरीर, मन और आत्मा के एक संतुलित सम्बन्ध को प्रशस्त करने का प्रयास करता है। यह रोगों के कारणों को ठीक करने के साथ-साथ स्वास्थ्य की सुरक्षा और संरक्षण के लिए भी संदेश देता है। यह व्यक्ति को स्वस्थ जीवन जीने के लिए निरंतर समानुयोजन की आवश्यकता को प्रोत्साहित करता है।

इस प्रकार, आयुर्वेद एक प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति है जो जीवन, स्वास्थ्य और आत्मा के पूर्णतावादी संतुलन को समर्पित है। इसका मुख्य उद्देश्य शरीर के स्वास्थ्य को प्रशस्त करना है और रोगों को रोकने और उन्हें ठीक करने के लिए प्राकृतिक उपाय प्रदान करना है।

Ayurveda (आयुर्वेद) आयुर्वेद (आयुः + वेद = आयुर्वेदविश्व की प्राचीनतम चिकित्सा प्रणालियों में से एक है।

यह चिकित्सा विज्ञान, कला और दर्शन का मिश्रण है। ‘आयुर्वेद’ नाम का अर्थ है, ‘जीवन से सम्बन्धित ज्ञान’। आयुर्वेद, भारतीय आयुर्विज्ञान है। आयुर्विज्ञान, विज्ञान की वह शाखा है जिसका सम्बन्ध मानव शरीर को निरोग रखने, रोग हो जाने पर रोग से मुक्त करने अथवा उसका शमन करने तथा आयु बढ़ाने से है।

आयुर्वेद के ग्रन्थ तीन शारीरिक दोषों (त्रिदोष = वात, पित्त, कफ) के असंतुलन को रोग का कारण मानते हैं,

और समदोष की स्थिति को आरोग्य। आयुर्वेद को त्रिस्कन्ध (तीन कन्धों वाला) अथवा त्रिसूत्र भी कहा जाता है, ये तीन स्कन्ध अथवा त्रिसूत्र हैं – हेतु, लिंग, औषध। इसी प्रकार सम्पूर्ण आयुर्वैदिक चिकित्सा के आठ अंग माने गए हैं (अष्टांग वैद्यक), ये आठ अंग ये हैं- कायचिकित्सा, शल्यतन्त्र, शालक्यतन्त्र, कौमारभृत्य, अगदतन्त्र, भूतविद्या, रसायनतन्त्र और वाजीकरण।

Ayurveda आयुर्वेद (आयुर्वेद = आयुः + वेद = आयुर्वेद) (Ayurveda = age + Veda = Ayurveda) 

आयुर्वेद की तैयारियों में सीसा, पारा और आर्सेनिक पदार्थ पाए गए हैंं,

जो आधुुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार मनुष्यों के लिए हानिकारक माने जाते हैं। 2008 के एक अध्ययन में, इंटरनेट के माध्यम से बेची जाने वाली अमेरिका और भारतीय निर्मित पेटेंट आयुर्वेदिक दवाओं में से लगभग 21% में भारी धातुओं, विशेष रूप से सीसा, पारा और आर्सेनिक के जहरीले स्तर पाए गए। भारत में ऐसे धातु संदूषकों के सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रभाव अज्ञात हैं।

परिभाषा एवं व्याख्या

  • (1) आयुर्वेदयति बोधयति इति आयुर्वेदः। अर्थात जो शास्त्र (विज्ञान) आयु (जीवन) का ज्ञान कराता है उसे आयुर्वेद कहते हैं।
  • (2) स्वस्थ व्यक्ति एवं आतुर (रोगी) के लिए उत्तम मार्ग बताने वाले विज्ञान को आयुर्वेद कहते हैं।
  • (3) अर्थात जिस शास्त्र में आयु शाखा (उम्र का विभाजन), आयु विद्या, आयुसूत्र, आयु ज्ञान, आयु लक्षण (प्राण होने के चिन्ह), आयु तंत्र (शारीरिक रचना शारीरिक क्रियाएं) – इन सम्पूर्ण विषयों की जानकारी मिलती है वह आयुर्वेद है।
Ayurveda (आयुर्वेद) आयुर्वेद (आयुः + वेद = आयुर्वेद) विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा प्रणालियों में से एक है। यह चिकित्सा विज्ञान, कला और दर्शन का मिश्रण है। ‘आयुर्वेद’ नाम का अर्थ है, ‘जीवन से सम्बन्धित ज्ञान’। आयुर्वेद, भारतीय आयुर्विज्ञान है।

आयुर्वेदिक चिकित्सा के लाभ

  1. आयुर्वेदीय चिकित्सा विधि सर्वांगीण है। आयुर्वेदिक चिकित्सा के उपरान्त व्यक्ति की शारीरिक तथा मानसिक दोनों दशाओं में सुधार होता है।
  2. आयुर्वेदिक औषधियों के अधिकांश घटक जड़ी-बूटियों, पौधों, फूलों एवं फलों आदि से प्राप्त की जातीं हैं। अतः यह चिकित्सा प्रकृति के निकट है।
  3. व्यावहारिक रूप से आयुर्वेदिक औषधियों के कोई दुष्प्रभाव (साइड-इफेक्ट) देखने को नहीं मिलते।
  4. अनेकों जीर्ण रोगों के लिए आयुर्वेद विशेष रूप से प्रभावी है।
  5. आयुर्वेद न केवल रोगों की चिकित्सा करता है बल्कि रोगों को रोकता भी है।
  6. आयुर्वेद भोजन तथा जीवनशैली में सरल परिवर्तनों के द्वारा रोगों को दूर रखने के उपाय सुझाता है।
  7. आयुर्वेदिक औषधियाँ स्वस्थ लोगों के लिए भी उपयोगी हैं।
  8. आयुर्वेदिक चिकित्सा अपेक्षाकृत सस्ती है क्योंकि आयुर्वेद चिकित्सा में सरलता से उपलब्ध जड़ी-बूटियाँ एवं मसाले काम में लाये जाते हैं।
Ayurveda आयुर्वेद (आयुर्वेद = आयुः + वेद = आयुर्वेद) (Ayurveda = age + Veda = Ayurveda) 

इतिहास

मुख्य लेख: आयुर्वेद का इतिहास

पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार संसार की प्राचीनतम् पुस्तक ऋग्वेद है। विभिन्न विद्वानों ने इसका रचना काल ईसा के 3,000 से 50,000 वर्ष पूर्व तक का माना है।

ऋग्वेद-संहिता में भी आयुर्वेद के अतिमहत्त्व के सिद्धान्त यत्र-तत्र विकीर्ण है। चरक, सुश्रुत, काश्यप आदि मान्य ग्रन्थ आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद मानते हैं। इससे आयुर्वेद की प्राचीनता सिद्ध होती है। अतः हम कह सकते हैं कि आयुर्वेद की रचनाकाल ईसा पूर्व 3,000 से 50,000 वर्ष पहले यानि सृष्टि की उत्पत्ति के आस-पास या साथ का ही है।

आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों के अनुसार यह देवताओं कि चिकित्सा पद्धति है,

जिसके ज्ञान को मानव कल्याण के लिए निवेदन किए जाने पर देवताओं द्वारा धरती के महान आचार्यों को दिया गया। इस शास्त्र के आदि आचार्य अश्विनीकुमार माने जाते हैं जिन्होने दक्ष प्रजापति के धड़ में बकरे का सिर जोड़ना जैसी कई चमत्कारिक चिकित्साएं की थी। अश्विनीकुमारों से इंद्र ने यह विद्या प्राप्त की।

इंद्र ने धन्वंतरि को सिखाया। काशी के राजा दिवोदास धन्वंतरि के अवतार कहे गए हैं। उनसे जाकर अलग अलग संप्रदायों के अनुसार उनके प्राचीन और पहले आचार्यों आत्रेय / सुश्रुत ने आयुर्वेद पढ़ा। अत्रि और भारद्वाज भी इस शास्त्र के प्रवर्तक माने जाते हैं।

आयुर्वेद के आचार्य ये हैं— अश्विनीकुमार, धन्वंतरि, दिवोदास (काशिराज), नकुल, सहदेव, अर्कि, च्यवन, जनक, बुध, जावाल, जाजलि, पैल, करथ, अगस्त्य, अत्रि तथा उनके छः शिष्य (अग्निवेश, भेड़, जतुकर्ण, पराशर, सीरपाणि, हारीत), सुश्रुत और चरक। ब्रह्मा ने आयुर्वेद को आठ भागों में बाँटकर प्रत्येक भाग का नाम ‘तन्त्र’ रखा ।

ये आठ भाग निम्नलिखित हैं :

क्रमांकतंत्रआधुनिक चिकित्सा का निकटतम विभाग
1शल्यतन्त्रsurgical techniques
2शालाक्यतन्त्रENT
3कायचिकित्साGeneral medicine
4भूतविद्या तन्त्रPsycho-therapy
5कौमारभृत्यPediatrics
6अगदतन्त्रToxicology
7रसायनतन्त्रrejuvenation and Geriatrics
8वाजीकरणतंत्रVilification, Science of Aphrodisiac and Sexology

इस अष्टाङ्ग (=आठ अंग वाले) आयुर्वेद के अन्तर्गत देहतत्त्व, शरीर विज्ञान, शस्त्रविद्या, भेषज और द्रव्य गुण तत्त्व, चिकित्सा तत्त्व और धातृविद्या भी हैं। इसके अतिरिक्त उसमें सदृश चिकित्सा (होम्योपैथी), विरोधी चिकित्सा (एलोपैथी), जलचिकित्सा (हाइड्रोपैथी), प्राकृतिक चिकित्सा (नेचुरोपैथी), योग, सर्जरी, नाड़ी विज्ञान (पल्स डायग्नोसिस) आदि आजकल के अभिनव चिकित्सा प्रणालियों के मूल सिद्धान्तों के विधान भी 2500 वर्ष पूर्व ही सूत्र रूप में लिखे पाये जाते हैं ।

Ayurveda आयुर्वेद (आयुर्वेद = आयुः + वेद = आयुर्वेद) (Ayurveda = age + Veda = Ayurveda) 
Ayurveda आयुर्वेद (आयुर्वेद = आयुः + वेद = आयुर्वेद) (Ayurveda = age + Veda = Ayurveda) 

आयुर्वेद का अवतरण

चरक मतानुसार (आत्रेय सम्प्रदाय)

आयुर्वेद के ऐतिहासिक ज्ञान के सन्दर्भ में, चरक मत के अनुसार, आयुर्वेद का ज्ञान सर्वप्रथम ब्रह्मा से प्रजापति ने, प्रजापति से दोनों अश्विनी कुमारों ने, उनसे इन्द्र ने और इन्द्र से भारद्वाज ने आयुर्वेद का अध्ययन किया। च्यवन ऋषि का कार्यकाल भी अश्विनी कुमारों का समकालीन माना गया है।

आयुर्वेद के विकास में ऋषि च्यवन का अतिमहत्त्वपूर्ण योगदान है। फिर भारद्वाज ने आयुर्वेद के प्रभाव से दीर्घ सुखी और आरोग्य जीवन प्राप्त कर अन्य ऋषियों में उसका प्रचार किया। तदनन्तर पुनर्वसु आत्रेय ने अग्निवेश, भेल, जतू, पाराशर, हारीत और क्षारपाणि नामक छः शिष्यों को आयुर्वेद का उपदेश दिया। इन छः शिष्यों में सबसे अधिक बुद्धिमान अग्निवेश ने सर्वप्रथम एक संहिता (अग्निवेश तंत्र) का निर्माण किया- जिसका प्रतिसंस्कार बाद में चरक ने किया और उसका नाम चरकसंहिता पड़ा, जो आयुर्वेद का आधार-स्तम्भ है।

सुश्रुत मतानुसार (धन्वन्तरि सम्प्रदाय)

धन्वन्तरि ने भी आयुर्वेद का प्रकाशन ब्रह्मदेव द्वारा ही प्रतिपादित किया हुआ माना है। सुश्रुत के अनुसार काशीराज दिवोदास के रूप में अवतरित भगवान धन्वन्तरि के पास अन्य महर्षिर्यों के साथ सुश्रुत आयुर्वेद का अध्ययन करने हेतु गये और उनसे आवेदन किया।

उस समय भगवान धन्वन्तरि ने उन लोगों को उपदेश करते हुए कहा कि सर्वप्रथम स्वयं ब्रह्मा ने सृष्टि उत्पादन के पूर्व ही अथर्ववेद के उपवेद आयुर्वेद को एक हजार अध्यायों तथा एक लाख श्लोकों में प्रकाशित किया और पुनः मनुष्य को अल्पमेधावी समझकर इसे आठ अंगों में विभक्त कर दिया। पुनः भगवान धन्वन्तरि ने कहा कि ब्रह्मा से दक्ष प्रजापति, उनसे दोनों अश्विनीकुमारों ने, तथा उनसे इन्द्र ने आयुर्वेद का अध्ययन किया।

आयुर्वेद का काल-विभाजन

आयुर्वेद के इतिहास को मुख्यतया तीन भागों में विभक्त किया गया है –

संहिताकाल

संहिताकाल का समय 5वीं शती ई.पू. से 6वीं शती तक माना जाता है। यह काल आयुर्वेद की मौलिक रचनाओं का युग था। इस समय आचार्यो ने अपनी प्रतिभा तथा अनुभव के बल पर भिन्न-भिन्न अंगों के विषय में अपने पाण्डित्यपूर्ण ग्रन्थों का प्रणयन किया। आयुर्वेद के त्रिमुनि – चरक, सुश्रुत और वाग्भट, के उदय का काल भी संहिताकाल ही है। चरक संहिता ग्रन्थ के माध्यम से कायचिकित्सा के क्षेत्र में अद्भुत सफलता इस काल की एक प्रमुख विशेषता है।

व्याख्याकाल

इसका समय 7वीं शती से लेकर 15वीं शती तक माना गया है तथा यह काल आलोचनाओं एवं टीकाकारों के लिए जाना जाता है। इस काल में संहिताकाल की रचनाओं के ऊपर टीकाकारों ने प्रौढ़ और स्वस्थ व्याख्यायें निरुपित कीं। इस समय के आचार्य डल्हण की सुश्रुत संहिता टीका आयुर्वेद जगत् में अति महत्वपूर्ण मानी जाती है।

शोध ग्रन्थ ‘रसरत्नसमुच्चय’ भी इसी काल की रचना है, जिसे आचार्य वाग्भट ने चरक और सुश्रुत संहिता और अनेक रसशास्त्रज्ञों की रचना को आधार बनाकर लिखा है।

विवृतिकाल

इस काल का समय 14वीं शती से लेकर आधुनिक काल तक माना जाता है। यह काल विशिष्ट विषयों पर ग्रन्थों की रचनाओं का काल रहा है। माधवनिदान, ज्वरदर्पण आदि ग्रन्थ भी इसी काल में लिखे गये। चिकित्सा के विभिन्न प्रारुपों पर भी इस काल में विशेष ध्यान दिया गया, जो कि वर्तमान में भी प्रासंगिक है। इस काल में आयुर्वेद का विस्तार एवं प्रयोग बहुत बड़े पैमाने पर हो रहा है।

Ayurveda आयुर्वेद (आयुर्वेद = आयुः + वेद = आयुर्वेद) (Ayurveda = age + Veda = Ayurveda) 
Ayurveda आयुर्वेद (आयुर्वेद = आयुः + वेद = आयुर्वेद) (Ayurveda = age + Veda = Ayurveda) 

स्पष्ट है कि आयुर्वेद की प्राचीनता वेदों के काल से ही सिद्ध है।

आधुनिक चिकित्सापद्धति में सामाजिक चिकित्सा पद्धति को एक नई विचारधरा माना जाता है, परन्तु यह कोई नई विचारधारा नहीं अपितु यह उसकी पुनरावृत्ति मात्र है, जिसका उल्लेख 2500 वर्षों से भी पहले आयुर्वेद में किया गया है जिसके सभी सिद्धांतो का प्रत्येक शब्द आज इतने सालों बाद भी अपने सूक्ष्म और स्थूल हर रूप में सही सिद्ध होता है।

जैसे कुछ समय पूर्व आधुनिक वैज्ञानिकों ने कृत्रिम नाक बनाए जाने का काम किया है और उन वैज्ञानिकों के अनुसार उनका यह काम सुश्रुत संहिता के मूल सिद्धांतों को पढ़कर और उसपर आगे विस्तृत कार्य करने के बाद ही संभव हो पाया है।

उद्देश्य

आयुर्वेद का उद्देश्य ही स्वस्थ प्राणी के स्वास्थ्य की रक्षा तथा रोगी की रोग को दूर करना है –प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं आतुरस्यविकारप्रशमनं च ॥ (चरकसंहिता, सूत्रस्थान ३०/२६)

आयुर्वेद के दो उद्देश्य हैं :

(१) स्वस्थ व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा करना,(२) रोगी (आतुर) व्यक्तियों के विकारों को दूर कर उन्हें स्वस्थ बनाना।

आयुर्वेद के दो उद्देश्य हैं : स्वस्थ व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा करना, रोगी व्यक्तियों के विकारों को दूर कर उन्हें स्वस्थ बनाना.

स्वस्थ व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा करना

इसके लिए अपने शरीर और प्रकृति के अनुकूल देश, काल आदि का विचार करना नियमित आहार-विहार, चेष्टा, व्यायाम, शौच, स्नान, शयन, जागरण आदि गृहस्थ जीवन के लिए उपयोगी शास्त्रोक्त दिनचर्या, रात्रिचर्या एवं ऋतुचर्या का पालन करना;

संकटमय कार्यों से बचना, प्रत्येक कार्य विवेकपूर्वक करना, मन और इंद्रिय को नियंत्रित रखना, देश, काल आदि परिस्थितियों के अनुसार अपने अपने शरीर आदि की शक्ति और अशक्ति का विचार कर कोई कार्य करना, मल, मूत्र आदि के उपस्थित वेगों को न रोकना;

ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, अहंकार आदि से बचना, समय-समय पर शरीर में संचित दोषों को निकालने के लिए वमन, विरेचन आदि के प्रयोगों से शरीर की शुद्धि करना, सदाचार का पालन करना और दूषित वायु, जल, देश और काल के प्रभाव से उत्पन्न महामारियों (जनपदोद्ध्वंसनीय व्याधियों, एपिडेमिक डिज़ीज़ेज़) में विज्ञ चिकित्सकों के उपदेशों का समुचित रूप से पालन करना, स्वच्छ और विशोधित जल, वायु, आहार आदि का सेवन करना और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करना, ये स्वास्थ्यरक्षा के साधन हैं।

रोगी व्यक्तियों के विकारों को दूर कर उन्हें स्वस्थ बनाना

इसके लिए प्रत्येक रोग के

  • हेतु (कारण),
  • लिंग – रोगपरिचायक विषय, जैसे पूर्वरूप, रूप (signs & symptoms), संप्राप्ति (पैथोजेनिसिस) तथा उपशयानुपशय (थिराप्युटिकटेस्ट्स)
  • औषध का ज्ञान परमावश्यक है।

ये तीनों आयुर्वेद के ‘त्रिस्कन्ध’ (तीन प्रधान शाखाएं) कहलाती हैं। इसका विस्तृत विवेचन आयुर्वेद ग्रंथों में किया गया है। यहाँ केवल संक्षिप्त परिचय मात्र दिया जाएगा। किंतु इसके पूर्व आयु के प्रत्येक संघटक का संक्षिप्त परिचय आवश्यक है, क्योंकि संघटकों के ज्ञान के बिना उनमें होनेवाले विकारों को जानना संभव न होगा।

आयु

आयुर्वेद का अर्थ प्राचीन आचार्यों की व्याख्या और इसमें आए हुए ‘आयु’ और ‘वेद’ इन दो शब्दों के अर्थों के अनुसार बहुत व्यापक है। आयुर्वेद के आचार्यों ने ‘शरीर, इंद्रिय, मन तथा आत्मा के संयोग’ को आयु कहा है। संपत्ति (साद्गुण्य) या विपत्ति (वैगुण्य) के अनुसार आयु के अनेक भेद होते हैं, किंतु संक्षेप में प्रभावभेद से इसे चार प्रकार का माना गया है :

(१) सुखायु : किसी प्रकार के शीरीरिक या मानसिक विकास से रहित होते हुए, ज्ञान, विज्ञान, बल, पौरुष, धनृ धान्य, यश, परिजन आदि साधनों से समृद्ध व्यक्ति को “सुखायु’ कहते हैं।

(२) दुखायु : इसके विपरीत समस्त साधनों से युक्त होते हुए भी, शरीरिक या मानसिक रोग से पीड़ित अथवा निरोग होते हुए भी साधनहीन या स्वास्थ्य और साधन दोनों से हीन व्यक्ति को “दु:खायु’ कहते हैं।

(३) हितायु : स्वास्थ्य और साधनों से संपन्न होते हुए या उनमें कुछ कमी होने पर भी जो व्यक्ति विवेक, सदाचार, सुशीलता, उदारता, सत्य, अहिंसा, शांति, परोपकार आदि आदि गुणों से युक्त होते हैं और समाज तथा लोक के कल्याण में निरत रहते हैं उन्हें हितायु कहते हैं।

(४) अहितायु : इसके विपरीत जो व्यक्ति अविवेक, दुराचार, क्रूरता, स्वार्थ, दंभ, अत्याचार आदि दुर्गुणों से युक्त और समाज तथा लोक के लिए अभिशाप होते हैं उन्हें अहितायु कहते हैं।

Ayurveda (आयुर्वेद)

इस प्रकार हित, अहित, सुख और दु:ख, आयु के ये चार भेद हैं। इसी प्रकार कालप्रमाण के अनुसार भी दीर्घायु, मध्यायु और अल्पायु, संक्षेप में ये तीन भेद होते हैं। वैसे इन तीनों में भी अनेक भेदों की कल्पना की जा सकती है।

‘वेद’ शब्द के भी सत्ता, लाभ, गति, विचार, प्राप्ति और ज्ञान के साधन, ये अर्थ होते हैं और आयु के वेद को आयुर्वेद (नॉलेज ऑव सायन्स ऑव लाइफ़) कहते हैं। अर्थात्‌ जिस शास्त्र में आयु के स्वरूप, आयु के विविध भेद, आयु के लिए हितकारक और अप्रमाण तथा उनके ज्ञान के साधनों का एवं आयु के उपादानभूत शरीर, इंद्रिय, मन और आत्मा, इनमें सभी या किसी एक के विकास के साथ हित, सुख और दीर्घ आयु की प्राप्ति के साधनों का तथा इनके बाधक विषयों के निराकरण के उपायों का विवचेन हो उसे आयुर्वेद कहते हैं। किंतु आजकल आयुर्वेद “प्राचीन भारतीय चिकित्सापद्धति’ इस संकुचित अर्थ में प्रयुक्त होता है।

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Harshit Brave

I am a Health Care Advisor, Guide, Teacher, and Trainer. I am also a Life Counselling Coach. I have served in the healthcare field for over three decades. My work has focused on patient care, counselling, teaching, and guiding young professionals. This journey has given me profound insight into health, human behaviour, emotional resilience, and achieving a balanced life. I created Optimal Health to share practical knowledge gained through real experience. My goal is to help you build a healthy body, cultivate a calm mind, develop financial awareness, make informed decisions, and achieve spiritual peace. I believe true health means complete well-being. When your body, mind, purpose, and spirit work together, life becomes meaningful. Through my articles, videos, and guidance, I support you in: • Managing health challenges • Building positive habits • Strengthening mental resilience • Finding life direction • Growing in wisdom and spirituality I walk this path with you, not ahead of you. My role is to guide, teach, and support your journey toward a balanced and fulfilling life. Welcome to Optimal Health.