यीशु मसीह की सेवकाई के दिन और चंगाई व आशीषों की बहुतायत। (Yeeshu Masih Ki Sevkayi Aur Changaayi Ki Aashishen), यीशु मसीह की सेवकाई: चंगाई और आशीषों का संदेश

25) नासरत का यीशु: वादा किया हुआ उद्धारकर्ता

यीशु मसीह ने अपने पृथ्वी पर के जीवन में लोगों पर तरस, प्रेम और दयालुता का उदाहरण प्रस्तुत किया है, और आज वही आधार हमारा भी होना चाहिये। यीशु मसीह की सेवकाई के दिन और चंगाई व आशीषों की बहुतायत। (Yeeshu Masih Ki Sevkayi Aur Changaayi Ki Aashishen) सामर्थ्य और सेवा के लिये यीशु मसीह की रात की प्रार्थना को याद रखें।

यीशु मसीह की सेवकाई: चंगाई और आशीषों का संदेश

यीशु मसीह की सेवकाई के दिन प्रेम, दया और करुणा के अद्भुत उदाहरण हैं। अपने पृथ्वी पर के जीवनकाल में, उन्होंने अनेक चमत्कार और सेवाएं दीं, जो हमारे लिए आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं। उनके जीवन का प्रत्येक कार्य हमें उनके सामर्थ्य, दयालुता और मानवता के प्रति उनके अपार प्रेम को दर्शाता है।

लूका 4:38; मरकुस 1:30; मत्ती 8:15 – चंगाई का चमत्कार

पवित्र शास्त्र में वर्णित है कि यीशु ने कफरनहूम में पतरस के घर में उनकी सास को चंगा किया। वह “बड़े ज्वर” से पीड़ित थीं, और जब उनके बारे में यीशु को बताया गया, तो उन्होंने उसकी स्थिति पर तरस खाया। यीशु ने उसके हाथ को छुआ, और उसका ज्वर तुरंत उतर गया। वह उठ खड़ी हुई और यीशु व उनके चेलों की सेवा करने लगीं।

यह घटना उनके अद्वितीय सामर्थ्य और करुणा को प्रकट करती है। यीशु न केवल शारीरिक रोगों को चंगा करते थे, बल्कि आत्मिक, मानसिक और सामाजिक समस्याओं को भी हल करते थे।

चमत्कार की खबर का प्रसार

इस चमत्कार की खबर शीघ्र ही पूरे नगर में फैल गई। हालांकि यह सब्त का दिन था, और रब्बियों के डर से लोग तुरंत नहीं आए, परंतु सूर्यास्त के बाद, पूरा नगर यीशु के पास उमड़ पड़ा। बीमारों और कमजोरों को खाट पर उठाकर लाया गया। कुछ लोग सहारे से चलकर आए, तो कुछ को उनके मित्रों और परिवारजनों ने उठाकर यीशु के पास पहुंचाया।

नगर का हर कोना, घर, दुकान और बाजार यीशु की करुणा और सामर्थ्य के संदेश से गूंज उठा। यह दृश्य उस समय की सामाजिक और आध्यात्मिक आवश्यकताओं को भी दर्शाता है।

प्रार्थना और सामर्थ्य:


यीशु मसीह अपने कार्यों और चमत्कारों के लिए अक्सर रात को प्रार्थना करते थे। यह उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था और हमें सिखाता है कि ईश्वर से शक्ति और मार्गदर्शन पाने के लिए प्रार्थना कितनी आवश्यक है।

यीशु की सेवकाई केवल उनके समय के लिए नहीं थी; यह आज भी हमारे जीवन को प्रेरित करती है। उनकी चंगाई और आशीषें हर समय और हर पीढ़ी के लिए उपलब्ध हैं। हमें उनके जीवन से प्रेम, करुणा और सेवा का उदाहरण लेना चाहिए और इसे अपने जीवन में लागू करना चाहिए।

समापन विचार:
यीशु मसीह की सेवकाई न केवल चमत्कारों की कहानी है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि कैसे प्रेम और दया से संसार को बदला जा सकता है। आइए, हम भी उनके जीवन से प्रेरणा लेकर दूसरों की सहायता करें और ईश्वर के प्रेम को सभी तक पहुंचाएं।

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चंगाई की सेवा: अनवरत करुणा का परिचय

कफरनहूम के लिए यह दिन अभूतपूर्व था। जब यीशु मसीह ने चंगाई और आशिषों की वर्षा की, तो लोग घण्टों तक उनके पास आते-जाते रहे। किसी को यह भरोसा नहीं था कि चंगाई देने वाला अगली सुबह भी उनके बीच रहेगा या नहीं। शहर की गलियां विजय और उद्धार के नारों से गूंज रही थीं, जो उस समय के सामर्थ्यपूर्ण चमत्कार का सजीव प्रमाण थीं।

अंतिम पीड़ित तक सेवा

“जब तक अंतिम पीड़ित को राहत नहीं मिली, यीशु ने अपना कार्य बंद नहीं किया।”

यह वाक्य मसीह के सेवा-भाव का सार है। रात हो चुकी थी, और भीड़ अब शमौन के घर से लौट गई थी। एक लंबे और व्यस्त दिन के बाद, यीशु ने विश्राम की ओर कदम बढ़ाया। लेकिन उनका विश्राम क्षणिक था। जैसे ही शहर सो गया, यीशु, “दिन से बहुत पहले उठकर,” एकांत में प्रार्थना के लिए चले गए (मरकुस 1:35)।

उनकी प्रार्थना केवल आत्मिक शक्ति का स्रोत नहीं थी; यह उनके मिशन का केंद्र भी थी। यह हमें दिखाती है कि सेवा और सामर्थ्य का आधार गहरी और निरंतर प्रार्थना है।

मसीह का उद्देश्य: पूरे संसार के लिए संदेश

सुबह पतरस और अन्य साथी उन्हें ढूंढते हुए आए। कफरनहूम के लोग पहले ही उनकी तलाश में थे। लेकिन मसीह के शब्द आश्चर्यजनक थे:
“मुझे दूसरे शहरों में भी परमेश्वर के राज्य का प्रचार करना चाहिए: क्योंकि मुझे इसीलिए भेजा गया है।” (लूका 4:43)

यह उत्तर उनके मिशन के असली उद्देश्य को प्रकट करता है। चमत्कारों और चंगाई से कहीं अधिक, यीशु का मुख्य उद्देश्य परमेश्वर के राज्य का संदेश फैलाना था।

खतरा: उत्साह में उद्देश्य न खो जाए

कफरनहूम में व्याप्त उत्साह में एक बड़ा खतरा था। लोगों का ध्यान केवल चमत्कारों और चंगाई पर केंद्रित हो सकता था, जबकि यीशु का उद्देश्य उससे भी गहरा था—उद्धार का संदेश देना और परमेश्वर के राज्य को स्थापित करना।

यह हमें याद दिलाता है कि बाहरी चमत्कारों से परे, यीशु का असली आह्वान आत्मिक पुनर्स्थापना और सत्य का प्रचार था।

यीशु मसीह की सेवकाई हमें सिखाती है कि सेवा और करुणा को आत्मिक उद्देश्य के साथ जोड़ना कितना महत्वपूर्ण है। उनकी अटूट प्रार्थना और उनकी दूरदर्शिता हमें प्रेरित करती है कि हम भी अपने जीवन में उद्देश्यपूर्ण सेवा करें। चंगाई और उद्धार का यह संदेश, जो कफरनहूम से शुरू हुआ, आज भी हर हृदय में गूंजता है।

यीशु मसीह: चमत्कारी से परे एक उद्धारकर्ता

चमत्कारी के रूप में पहचान से परे

यीशु मसीह ने कभी भी स्वयं को केवल एक चमत्कारी या शारीरिक रोगों के उपचारक के रूप में स्थापित करने का प्रयास नहीं किया। उनका उद्देश्य कहीं अधिक गहन और व्यापक था। वह लोगों को सांसारिक चीजों से ऊपर उठाकर अपने सच्चे उद्धारकर्ता के रूप में पहचानने के लिए प्रेरित कर रहे थे।

जबकि लोग यह मानने लगे थे कि वह एक पार्थिव राजा बनकर कोई भौतिक साम्राज्य स्थापित करेंगे, यीशु ने इस सोच को बदलने का प्रयास किया। उन्होंने उनके मन को सांसारिक सुखों और सफलताओं से हटाकर आत्मिक मूल्यों और सत्य की ओर केंद्रित किया।

भीड़ के बीच यीशु का दृष्टिकोण

लापरवाह भीड़ का आश्चर्य और सांसारिक अपेक्षाएं यीशु की आत्मा को झकझोर देती थीं। दुनिया जिस प्रकार सम्मान, धन, और शक्ति को महत्व देती है, वह उनके मिशन के उद्देश्य से बिलकुल विपरीत था। उन्होंने कभी भी लोगों से वफादारी या आदर पाने के लिए दिखावटी साधनों का सहारा नहीं लिया।

यह पहले से ही भविष्यवाणी की गई थी:
“वह न तो रोएगा, और न उठेगा, और न सड़क पर अपना शब्द सुनाएगा। कुचले हुए सरकण्डे को वह न तोड़ेगा, और न बुझे हुए सन को बुझाएगा; वह सत्य का न्याय करेगा।”
(यशायाह 42:2-3)

यीशु ने अपने जीवन से इन शब्दों को साकार किया, अपने कार्यों से दिखाया कि विनम्रता और सत्य का मार्ग ही वास्तविक शक्ति का मार्ग है।

यीशु के विरोधियों के आरोप

फरीसियों ने धर्म की औपचारिकता और दिखावे को प्राथमिकता दी। वे अपने दान और पूजा में दिखावा कर धर्म के प्रति अपने उत्साह का प्रमाण देने की कोशिश करते थे। उन्होंने यीशु के साधारण, शांतिपूर्ण जीवन और उनकी ईश्वर-केन्द्रित शिक्षाओं के विपरीत, शोर-शराबे और प्रदर्शन को ही धर्म का मानदंड मान लिया था।

वे यीशु पर अनौपचारिक और अनुचित आरोप लगाते रहे, ताकि अपने स्वयं के स्वार्थपूर्ण धर्म-पालन को सही ठहरा सकें। परन्तु उनके जीवन और यीशु के जीवन के बीच का अंतर स्पष्ट था।

मसीह का जीवन: शांत और पवित्र

यीशु का जीवन सादगी, विनम्रता, और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का आदर्श था।
उनके जीवन में कभी कोई शोर-शराबा, दिखावटी पूजा, या भीड़ को रिझाने के प्रयास नहीं थे। वे पूरी तरह से परमेश्वर में लीन थे, और उनके जीवन में परमेश्वर की महिमा झलकती थी।

मसीह का यह शांत, विनम्र जीवन उन लोगों के लिए प्रेरणा था, जो अपने भीतर आत्मिक जागृति चाहते थे।

धर्म का सूर्य: चुपचाप उदय

मसीह का आगमन किसी दिखावटी वैभव या चकाचौंध के साथ नहीं हुआ। जैसा कि होशे 6:3 में लिखा है,
“उसका जाना भोर के समान तैयार किया जाता है।”

ठीक वैसे ही जैसे भोर का उजाला धीरे-धीरे अंधकार को मिटाकर प्रकाश फैलाता है, मसीह ने भी अपनी शिक्षाओं और कार्यों के माध्यम से दुनिया को जागृत किया।

मलाकी 4:2 में कहा गया है:
“उसके पंखों में चंगाई के साथ धार्मिकता का सूर्य उदय हुआ।”

यह चुपचाप और स्थिरता से आने वाला प्रकाश मसीह के मिशन की गहराई और शक्ति को दर्शाता है।

यीशु मसीह का जीवन केवल चमत्कारों और दिखावटी उपलब्धियों का प्रदर्शन नहीं था। वह सच्ची आत्मिकता, प्रेम और सत्य का उदाहरण थे। उनका मिशन था—लोगों को सांसारिक बंधनों से मुक्त करना और उन्हें ईश्वर के निकट लाना।

उनकी शिक्षाएं और जीवन हमें याद दिलाते हैं कि सत्य, करुणा, और ईश्वर में निहित विनम्रता ही वास्तविक शक्ति और उद्धार का मार्ग है।

यीशु मसीह की सेवकाई के दिन और चंगाई व आशीषों की बहुतायत। (Yeeshu Masih Ki Sevkayi Aur Changaayi Ki Aashishen) 

यीशु मसीह: अनुग्रह और चमत्कार के जीवंत प्रतीक

“देख, मेरा दास, जिसे मैं थामे रखता हूं”

यशायाह 42:1 में यीशु मसीह के विषय में यह भविष्यवाणी की गई थी:
“देख, मेरा दास, जिसे मैं थामे रखता हूं; मेरा चुना हुआ, जिससे मेरी आत्मा प्रसन्न होती है।”
यह पद मसीह के दिव्य चरित्र और उनके पृथ्वी पर अनुग्रह और करुणा के अद्वितीय मिशन को दर्शाता है।

उद्धार और प्रकाश का संदेश

यशायाह 42:5-7 में लिखा है:
“मैं तुझे धर्म से बुलाऊंगा, तेरा हाथ थामूंगा, और तुझे अन्यजातियों के लिए प्रकाश बनाऊंगा। मैं अंधों की आंखें खोलूंगा और कैदियों को बंधन से मुक्त करूंगा।”
यीशु का यह मिशन न केवल शारीरिक चंगाई, बल्कि आत्मिक स्वतंत्रता और सत्य का प्रकाश फैलाने पर केंद्रित था। उनके जीवन और शिक्षाएं अंधकार में बैठे लोगों को नई आशा और दिशा प्रदान करने के लिए थीं।

मसीह का आह्वान: “मैं तुम्हें एक नया मार्ग दिखाऊंगा”

यशायाह 42:16 के अनुसार,
“मैं अंधों को ऐसा मार्ग दिखाऊंगा जिसे वे नहीं जानते; मैं उनके सामने अंधकार को उजाला और टेढ़े रास्तों को सीधा करूंगा।”
मसीह का हर कार्य, उनकी हर शिक्षा, और उनके हर चमत्कार का उद्देश्य मानवता को उस मार्ग पर चलाना था जो शांति, प्रेम और सत्य की ओर ले जाता है।

यूहन्ना बपतिस्मादाता और मसीह का उत्तर

शंका और सत्यापन

जब यूहन्ना बपतिस्मादाता, जो हेरोदेस की कालकोठरी में बंद थे, को यीशु के कार्यों के बारे में सुनने का अवसर मिला, तो उन्होंने अपने शिष्यों को यह पूछने के लिए भेजा:
“क्या तू वह है जो आने वाला था, या हमें किसी और की तलाश करनी चाहिए?” (मत्ती 11:3)

मसीह का उत्तर: कार्यों के माध्यम से सत्यापन

यीशु ने सीधे जवाब देने के बजाय, अपने चमत्कार और शिक्षाओं को यूहन्ना के शिष्यों के सामने प्रस्तुत किया। पीड़ित लोग उनके पास आए—अंधे, बहरे, लकवाग्रस्त, और पाप से बंधे हुए। मसीह के शब्द और उनके हाथ के स्पर्श ने उन्हें शारीरिक और आत्मिक चंगाई दी।
“धन्य है वह, जो मुझमें विश्वास रखता है और नाराज नहीं होगा।” (मत्ती 11:6)

भविष्यवाणी का पूरा होना

यूहन्ना को मसीहा के बारे में यशायाह 61:1-2 में की गई भविष्यवाणी याद आई:
“यहोवा ने नम्र लोगों को शुभ समाचार सुनाने के लिए मेरा अभिषेक किया है; उसने मुझे भेजा है कि टूटे मन वालों को बान्धूं और बंदियों को स्वतंत्रता का प्रचार करूं।”
यीशु के कार्य इस भविष्यवाणी को साकार करते थे। उनका उद्देश्य न केवल शारीरिक चंगाई था, बल्कि आत्मिक पुनर्स्थापना और मानवता को बंधनों से मुक्त करना भी था।

मसीह के कार्य: चमत्कार और अनुग्रह का दिन

  • अंधों को दृष्टि: उनकी चमत्कारकारी शक्ति ने अंधकार को मिटाया और लोगों को नई दृष्टि दी।
  • मृतकों को जीवन: मसीह की आवाज मरते हुए लोगों तक पहुंचती और उन्हें जीवन और ऊर्जा देती।
  • गरीबों के लिए आशा: वह गरीब किसानों और मजदूरों के बीच जाकर, जिन्हें समाज ने ठुकरा दिया था, अनन्त जीवन का संदेश देते।

यीशु मसीह का जीवन प्रेम, चंगाई और उद्धार का आदर्श उदाहरण है। उनकी सेवकाई, भविष्यवाणियों को पूरा करते हुए, शारीरिक और आत्मिक चंगाई के माध्यम से मानवता को प्रकाश और आशा प्रदान करती है।

उनके कार्यों ने न केवल तत्काल पीड़ा को दूर किया, बल्कि सच्चे विश्वास और अनुग्रह के माध्यम से हर पीढ़ी के लिए उद्धार का मार्ग खोल दिया। उनकी शिक्षा आज भी हमें एक नया जीवन, एक नई दिशा, और ईश्वर के प्रति सच्चे समर्पण की प्रेरणा देती है।

तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है

नासरत का यीशु: वादा किया हुआ उद्धारकर्ता

दिव्यता और कृपालुता का प्रतीक

यीशु मसीह के कार्यों और उनकी सेवकाई में उनकी दिव्यता स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी महिमा उनके विनम्र स्वभाव और मानवता के प्रति करुणा में प्रकट हुई। पीड़ितों की सेवा करते हुए, उन्होंने यह प्रमाणित किया कि वह वही वादा किया हुआ मसीहा थे, जिनकी प्रतीक्षा की जा रही थी।

मसीह के कार्य और उनके राज्य की स्थापना

दया और विनम्रता के माध्यम से परिवर्तन

यीशु ने अपने कार्यों से यह दिखाया कि उनका राज्य बाहरी शक्ति या आडंबर के आधार पर नहीं, बल्कि दया, त्याग और प्रेम के माध्यम से स्थापित होगा। यह सत्य यूहन्ना के लिए वैसा ही स्पष्ट हुआ, जैसा कि एलिय्याह ने अनुभव किया था।
जैसा कि 1 राजा 19:11-12 में लिखा है:
“यहोवा आँधी, भूकंप, या आग में नहीं था, परन्तु आग के बाद एक धीमी, शांत आवाज में परमेश्वर ने नबी से बात की।”
इसी प्रकार, मसीह ने अपने संदेशों और कार्यों के माध्यम से लोगों के हृदयों को छुआ, न कि किसी दिखावटी शक्ति प्रदर्शन से।

परमेश्वर का राज्य: एक आंतरिक अनुभव

मसीह ने सिखाया कि परमेश्वर का राज्य किसी बाहरी दिखावे के साथ नहीं आता।
“यह राज्य उसके वचन की शक्ति, आत्मा के आंतरिक कार्य, और उसके साथ आत्मिक संगति के माध्यम से प्रकट होता है।”
इसकी पूर्णता मानव स्वभाव में तब देखी जाती है, जब व्यक्ति मसीह के चरित्र में ढल जाता है।

मसीह के अनुयायियों की जिम्मेदारी

संसार की ज्योति बनना

मसीह के अनुयायियों को “जगत की ज्योति” बनने के लिए कहा गया है। लेकिन यह ज्योति दिखावा करने से नहीं, बल्कि स्वर्ग के सिद्धांतों से प्रेरित जीवन से प्रकट होती है।

  • उनकी निष्ठा और ईश्वर-प्रेरित कार्य ही उनकी ज्योति का माध्यम बनते हैं।
  • उनका प्रकाश दुनिया में उनके स्वभाव और आचरण से झलकता है।

सांसारिक प्रदर्शन बनाम आत्मिक मूल्य

मसीह ने सिखाया कि धन, पद, या बाहरी प्रदर्शन, चाहे कितना भी भव्य क्यों न हो, परमेश्वर के राज्य में कोई महत्व नहीं रखता।

  • “सांसारिक प्रदर्शन का मूल्य केवल उतना है, जितना वह शाश्वत सत्य को व्यक्त करता है।”
  • परमेश्वर दृश्य और लौकिक से अधिक अनदेखे और शाश्वत चीजों को महत्व देते हैं।

निष्कर्ष

नासरत का यीशु न केवल वादा किया हुआ मसीहा था, बल्कि उन्होंने मानवता को प्रेम, त्याग और दया के माध्यम से परमेश्वर के राज्य का मार्ग दिखाया। उनके अनुयायियों का जीवन उनकी शिक्षाओं को प्रकट करने वाला होना चाहिए, न कि किसी प्रदर्शन या बाहरी आडंबर का। यीशु के राज्य का आधार आत्मिक गहराई और सत्य है, जो हर हृदय को शांति और प्रकाश प्रदान करता है।

मसीह की कृपा और हमारी जिम्मेदारी

चरित्र की सुंदरता और आत्मा का फल

सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ कलाकृतियां भी उस सुंदरता की तुलना नहीं कर सकतीं, जो पवित्र आत्मा के कार्य से आत्मा में उत्पन्न होती है। यह चरित्र की अनमोल सुंदरता है, जिसे परमेश्वर ने मसीह के माध्यम से हमें प्रदान किया है।

जब परमेश्वर ने अपने पुत्र को संसार में भेजा, तो उन्होंने मानवता को ऐसा खजाना दिया, जिसकी तुलना में इस पृथ्वी की सभी संपत्तियां नगण्य हैं। मसीह अपने साथ अनंत प्रेम का भंडार लेकर आए, और यह वही खजाना है जिसे हमें उनके साथ संबंध स्थापित करके प्राप्त करना, जीना और दूसरों तक पहुंचाना है।


मसीह की कृपा और हमारे कार्य

सेवा का अर्थ

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मसीह की कृपा जीवन बदलने की शक्ति रखती है। लेकिन यह शक्ति तब ही प्रकट होती है, जब कार्यकर्ता अपनी पूरी निष्ठा और समर्पण से परमेश्वर की योजना में अपना योगदान देता है।
“परमेश्वर किसी के धन, विद्या, या वाक्पटुता को नहीं देखता। वह देखता है कि क्या वे विनम्रता से चलते हैं और उसकी योजना को अपनाने के लिए तैयार हैं।”

परमेश्वर हमें अपनी आत्मा के माध्यम से उपयोग करते हैं। उनके अनुयायियों का काम उनके अनमोल सिद्धांतों को दर्शाना है और उनके प्रेम का प्रतिबिंब बनना है।

यीशु: हर माँ और बच्चे के साथ

मसीह की दयालुता और चंगाई

जब यीशु शहरों और गलियों में सेवा कर रहे थे, तो बीमार बच्चों को गोद में लिए माताएँ उनके पास पहुंचने के लिए भीड़ में संघर्ष करती थीं। उनका सहानुभूतिपूर्ण स्वभाव उन्हें इन माताओं और बच्चों के करीब ले आता। उन्होंने बीमार बच्चों को चंगा किया और थकी हुई माताओं को सांत्वना दी।

मसीह का संदेश स्पष्ट था:
“बच्चों को मेरे पास आने दो, और उन्हें मना मत करो, क्योंकि परमेश्वर का राज्य ऐसों का ही है।” (मरकुस 10:14)

पाँच रोटियों और दो मछलियों का चमत्कार

सादगी में शिक्षा

जब यीशु ने पाँच हजार लोगों को जौ की रोटियों और मछलियों से खिलाया, उन्होंने सादगी और विश्वास का पाठ सिखाया। यह चमत्कार यह दिखाता है कि कैसे ईश्वर की कृपा से साधारण चीज़ें महान उद्देश्य पूरे कर सकती हैं।
“छोटी-छोटी रोटियों का आशीर्वाद और उनकी वृद्धि सिखाती है कि हमारी सीमित संपत्ति, जब मसीह को अर्पित की जाती है, तो बड़ी आशीषों का कारण बन सकती है।”

मसीह के अनुयायी: सेवा के माध्यम

मानवता की आवश्यकताओं को पहचानें

हमारे पास सीमित साधन हो सकते हैं, लेकिन मसीह के प्रति समर्पण के साथ, हम बड़े कार्य कर सकते हैं। मसीह हमसे कहते हैं:
“जो तुम्हारे पास है, उसे मेरे पास लाओ। मैं उसे गुणा करूंगा।”

जो कुछ हमारे पास है—चाहे वह धन, समय, या प्रतिभा हो—उसे उनके हाथों में सौंप दें। उनकी आशीर्वादित शक्ति हमारी सीमितता को अनंत संभावनाओं में बदल सकती है।

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माता-पिता की जिम्मेदारी

बच्चों में विश्वास का बीज बोएं

मसीह ने बच्चों को विशेष महत्व दिया। उन्होंने बच्चों के सरल हृदय को अपनी शिक्षा के लिए आदर्श माना।

  • माता-पिता को अपने बच्चों को मसीह के पास लाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
  • बच्चों को यह सिखाना चाहिए कि मसीह के प्रेम में उनके जीवन का सबसे बड़ा आनंद निहित है।

“जैसे मसीह ने अपने समय में बच्चों को आशीर्वाद दिया, वह आज भी हमारे बच्चों के लिए समान प्रेम और ध्यान देता है।”

निष्कर्ष

मसीह का जीवन और उनके कार्य प्रेम, दया और सादगी का आदर्श हैं। उन्होंने हमें सिखाया कि सेवा और विश्वास के माध्यम से कैसे एक बेहतर संसार की रचना की जा सकती है।

उनकी शिक्षा आज भी हमें प्रेरित करती है कि हम अपनी सीमाओं के बावजूद ईश्वर पर भरोसा करें और अपने कार्यों से उनके राज्य को प्रकट करें।
“जो कुछ हमारे पास है, उसे मसीह को अर्पित करें, और देखें कि वह उसे कैसे आशीर्वादित करता है।”

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https://youtu.be/JLKsGHa1x8o

परमेश्वर के राज्य के द्वारा प्रभुत्व। (Dominion through the kingdom of God) 

यीशु मसीह की सेवकाई के दिन और चंगाई व आशीषों की बहुतायत। (Yeeshu Masih Ki Sevkayi Aur Changaayi Ki Aashishen) 
यीशु मसीह की सेवकाई के दिन और चंगाई व आशीषों की बहुतायत। (Yeeshu Masih Ki Sevkayi Aur Changaayi Ki Aashishen) 

यीशु मसीह की सेवकाई के दिन और चंगाई व आशीषों की बहुतायत। (Yeeshu Masih Ki Sevkayi Aur Changaayi Ki Aashishen), यीशु मसीह की सेवकाई: चंगाई और आशीषों का संदेश 

Harshit Brave

I am a Health Care Advisor, Guide, Teacher, and Trainer. I am also a Life Counselling Coach. I have served in the healthcare field for over three decades. My work has focused on patient care, counselling, teaching, and guiding young professionals. This journey has given me profound insight into health, human behaviour, emotional resilience, and achieving a balanced life. I created Optimal Health to share practical knowledge gained through real experience. My goal is to help you build a healthy body, cultivate a calm mind, develop financial awareness, make informed decisions, and achieve spiritual peace. I believe true health means complete well-being. When your body, mind, purpose, and spirit work together, life becomes meaningful. Through my articles, videos, and guidance, I support you in: • Managing health challenges • Building positive habits • Strengthening mental resilience • Finding life direction • Growing in wisdom and spirituality I walk this path with you, not ahead of you. My role is to guide, teach, and support your journey toward a balanced and fulfilling life. Welcome to Optimal Health.